तुम जाओ, लौट जाओ

एवेरेस्ट से वापसी पर नामचे से फकडिंग को नीचे उतरते हुए जब आखरी बार एमा डबलम को देखा था तो पहेली आठ लाइन लिखी थी। तब से एक बरस तक इसे पूरा नहीं कर पाया। शायद तारिख 4 या 5  मई 2016 थी।  आज फिर से वही कुछ याद आ गया सो पूरी कर दी।

तुम जाओ,
लौट जाओ
में नहीं आऊँगी।
न तुम्हारे साथ
ना पीछे,
तुम लौट जाओ
शहर को
अपनों के पास।
तुम्हारा प्रेम
बस पहाड़ों से है
तुम्हारी लालसा
उचाईयों की है
तुम्हे
कुछ पाना है
देखना है
छूना है
लिखना है
और
लौट जाना है।
तुम नहीं जानते
महसूस करना,
किसी का होना
और
किसी का हो कर
बस, रह जाना .
टिक जाना
रुक जाना
हो जाना विलीन
दुसरे में।
मेरा अपना
कोई नहीं है
न है कोई अस्तित्व।
मुझमे एक दो नहीं
अनगिनित आत्मा हैं
इस ब्रह्माण्ड सी
आकाश गंगा सी
और उस से भी परे की
अथाह ऊर्जा की।
में बर्फानी हवा हूँ
नहीं रह पाऊँगी
ऊंचाइयों से
बर्फ से
पहाड़ों से
परे या दूर।
मैं उड़ती हूँ
वादियों में
बहती हूँ
झरने और नालों में।
नदी सी
पूरक नहीं हूँ मैं।
न ही जाती हूँ
समंदर से मिलने
तुम जाओ,
लौट जाओ
में नहीं आऊँगी।
में बादलों में घुली
फुहार हूँ
उनका आकर हूँ
आसमां का वंश हूँ
हिम हूँ
भाप हूँ
कल्पना हूँ।
सागर से दूर
फ़िज़ां में घुला
हर औरत का
दिवास्वप्न हूँ।
तुम जाओ,
लौट जाओ
में नहीं आऊँगी।
रास्ते की
सबसे छोटी
कंकरी हूँ मैं ।
गिरी
पिसी
रुंधाई।
चमकती
स्फटिक हूँ
जो चुभेगी तुम्हे
पैर में
आँख में
दिन में – रात में।
तुम जाओ,
लौट जाओ
में नहीं आऊँगी।
में बूटी हूँ, जड़ हूँ
चट्टानी दरारों में।
महक हूँ
सूखे चटक में।
बिन बीजा
दोष हूँ।
झूठे अमरत्व सी
दवा हूँ।
तुम क्या, मुझे
सब चाहते हैं
तो ?
मैं कँहा हो सकती हूँ
सब की !!!
तुम्हारी  !!!
तुम जाओ,
लौट जाओ
में नहीं आऊँगी।
न तुम्हारे साथ
ना पीछे।

 

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