ये आवाजें
तुम्हारे रास्तों की
मोहताज़ नहीं,
बंद करके जिन्हें,
महफूज़ कर लिए हैं
तुमने अपने मक़ा।
शहर की हर
गली से, नाके से
लोह-बंद मोर्चों से टकराकर
हवा में गूंजती
तूफ़ान सी बिखर जाएँगी
कहर ढायेंगी, तुम्हारे डेरों पे ।
सुन लो इन्हें !!!
ये जो कहती हैं !!!
हैं तुम्हारे भी घर पर
बहन – बेटियाँ .