पांच फुट दस इंच के उस इंसान को मैंने कभी दो रोटी से ज्यादा खाते नहीं देखा था, पतली, छोटे साइज की नर्म और गोल रोटी उन्हें पसंद थी, न की घी से लबालब परांठे। पर आज उनके लिए ये बड़े और मोटे-मोटे दाल में गुथे हुए आटे के गोले और दो किलो देसी घी पेश किया जाता देख मैं दुखी था। उसे से भी बड़े दुःख का एक और कारण भी था और वो ये के न ही वो इसे पसंद करेगा और न ही वो इंसान अब इन्हे खा ही पायेगा।
उन से मेरी पहचान करीब 35 साल पहले हुई थी। उन दिनों मैं एक एक्सपोर्ट हाउस में काम करता था, दफ्तर करोल बाग़ की संकरी गली में था। मैनेजर था सो अपना ठीक ठाक सा केबिन भी था। केबिन के बहार सिले हुए कपड़ों के गठर, कोरे कपड़ों के थान, डिब्बों में बंद तैयार पोशाकों की शिपमेंट और जाने क्या क्या चारों तरफ ऐसे बिखरा सा पड़ा रहता था जैसे उस सब का कोई मालिक न हो । क्योंकि कपडे ऊपरी मंज़िलों में सिले जाते थे सो धागे, कपास के रुएँ, कतरने, बटन ज़मीन पर बिखरे रहते थे हालाँकि हमारे यह अक्सर फिरंगी खरीदारों की टीम आया करती थी फिर भी साफ़ सफाई पर ज़ोर नहीं था।
ऐसे ही एक दिन मेरे केबिन के बहार बैठे चपरासी ने आ कर बताया के कोई रमेश साहेब मिलने आये हैं। उन दिनों रमेश नाम का कोई न तो अपना दोस्त था न ही जानकार। मैंने सोचा कोई फैब्रीकेटर होगा सो कह दिया इंतज़ार कराओ। ये भी नहीं सोचा के बाहर तो इंतज़ार करने की कोई जगह ही नहीं है। करीब आधे घंटे के बाद जब फ्री हुआ तो बहार झाँका – एक पतला दुबला कंधे तक लम्बे बालों वाला जवान छाती पर हाथ बांधे परेशां सा टहल रहा था। उन्हें अंदर बुला कर उनके आने का सबब पूछा तो पता चला कि साथ वाली गली में उनका छापाखाना यानि के प्रिंटिंग प्रेस है और वो काम लेने के सिलसिले में आएं हैं। मैंने कहा मैं परचेज नहीं देखता और उन्हें स्टोर मैनेजर के पास जाने को कहा। इतने में उन्होंने बात पलटते हुए अंग्रेजी में पूछा कँहा पढ़े हो, रहते कँहा हो यंहा कितने सालों से हो वगैरह-वगैरह। मुझे लगा दोस्ती बढ़ाने की कोशिश की जा रही है सो जल्दी से जवाब दे कर उन्हें चलता किया।
उन दिनों एक लड़की से अपना इश्क़ ज़ोरों पे था। दो दिन बाद ये पता चला कि रमेश जी वो शख्स थे जिन्हे मेरे होने वाले ससुराल की तरफ से तहकीकात करने के लिए दफ्तर भेजा था। खैर, अच्छी बात ये हुई के रमेश बाबू ने हमें पास कर दिया। उस दिन की मुलाकात के बाद रमेश बाबू हमेशा के लिए अपने प्यारे मित्र बन गए। हसमुख, जिन्दा दिल, आर्टिस्टिक, जहीन और खाने पीने वाले यार बाज़ निकले रमेश बाबू। दोस्ती पक्की होती चली गयी और उन्हों ने ही छपाई के काम को समझने की पहली सीढ़ी चढ़ा दी। कॉलेज ऑफ़ आर्ट के पढ़े रमेश बाबू खासे हमनवां यानि लाइक-माइंडेड थे। नाटक, संगीत, मौसीक़ी की महफिलें, फिल्मे, कला के पारखी, फोटोग्राफर, हर मौके पे शेर कहने वाले और घुम्मकड़ होने के नाते रमेश जी से अपनी खूब निभी। हम प्याला भी बन गए और ससुराल की तरफ से रिश्तेदार भी।
पर आज वो शवासन मुद्रा में सामने की दहलीज पर सफ़ेद चादर में लिपटे थे। कई बार मन किया के काँधे पकड़ कर झंझोड़ दूँ कहूं इस मौके का भी एक शेर तो सुनाते जाओ शायद हमारा रास्ता भी आसान हो जाये। चारो तरफ बिरादरी और दोस्तों के बावजूद एक सनाटा था – ऐसे भी कोई जाता है क्या ? एक हफ्ता अस्पताल और बस। मंत्र पढ़ते हुए पंडित ने जब मोटे-मोटे दाल में गुथे हुए आटे के गोले रमेश जी के मुँह के पास रखे, सूखे काले होंठों पे गंगा जल और शहद का चमच लगाया और देसी घी उनके पार्थिव शरीर पर डाला तो मैंने बरबस पूछ ही लिए, ये क्यूँ? ये उन्हें बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा।
जवाब मिला, ये उनकी रास्ते की रोटी है।
(For dear Ramesh Khurana who passed away on 9th May 2018)