ये मंगलू है
बंगाली मार्किट का मंगलू
बंगाली मिष्ठान के बाहर दौड़ दौड़ कर
सलीके से गाडियां लगवाता मंगलू
मिंटो रोड की बड़ी लाइन के नीचे
नाले के साथ खड्ड में मंगलू की झुग्गी है
मंगलू जानता है आज दीवाली है
बड़ी दीवाली, छोटी दीवाली कल थी
कल वो दिन भर रोया था
मंगलू की मां गांव में रो रही होगी
मंगलू के बापू को याद कर
मंगलू कुम्हार का बाप मिट्टी के दिए बनाता था
हर दीवाली को,
इस दीवाली मंगलू बस देख रहा है
दिए, मोमबत्ती, बिजली की लड़ियां
फूलों के हार, पान के पत्ते, बंधनवार
मिठाइयां, केक, पेस्ट्री, फल, मेवे
पटाखे, फुलझडियां, फिरकी, अन्नार, हवाई
लक्ष्मी, गणेश, साईं बाबा, राम सिया
मंगलू जानता है आज पूजा होगी
पेट पूजा, सब जानता है मंगलू
कुछ नया नहीं है ‘तेरह दीवाली देखी हैं’
ये भी जानता है मंगलू इस दीवाली
बख्शीश, कमाई और गुलख की बचत सब घर भेजनी है
गांव भेजनी है, मां को
मां जो अब अकेली है, विधवा है
बापू मर गए ‘इस साल किसी बीमारी से’
मंगलू सब जानता है
मंगलू ये भी जानता है कि उसका नाम
स्कूल के रजिस्टर में चढ़ा है
पर मंगलू ये नहीं जानता
उसके नाम से आई स्कूल की फीस
और सरकारी मदद के पैसे से बैंक मैनेजर
आज रात जुआ खेलेगा।
आज दीवाली है ना!
