अच्छा लगता है पहाड़ में जब
बादल, कोहरा या नीहार
कमरे और घर-आँगन में चले आते हैं
अपना घर समझ कर ।
शहर में बादल
घर के ऊपर से गुज़र जाता है
अनजान मुसाफिर सा
या फिर निःशब्द घूरता है दूर से
और कोहरा खड़ा रहता है घर के बाहर
नाराज़ बड़े भाई सा
शहर में ओस पत्तों से टपकती है
पहाड़ उसे दरारों में संजो लेते है ।
शहर बिसरा बैठे है
बादल, कोहरे और ओस से दोस्ती
चलो पहाड़ चलें
महीन धुंध वहाँ मुझे ढूंढ रही है .