तुम क्यों रोते हो ?

तुम क्यों रोते हो बाबू ?
तुम्हारा कौन मरा ?
किसका सोग कैसा दुःख 
तुम्हारा तो कोई है ही नहीं
तो फिर ये प्रपंच क्यूँ ?

और फिर यहाँ क्यूँ ?
ये तुम्हारी ही नगरी है यमावतार  
भूल गए, ये क़ाशी है मरुथल नहीं 
यहाँ नहीं बुलाई जाती रुडलियाँ 
यहाँ आँसू नहीं बिकते

और फिर तुम? तुम क्यों रोते हो?
तुम तो धृष्ट अहंकारी हो 
अपराधी, गुनहग़ार, क़ातिल हो
हत्यारे पश्चाताप करते हैं 
माफ़ी मांगते हैं सज़ा काटते हैं
हत्यारे रोते नहीं। 

तुम छोड़ो ये नाटक
देश तो रो ही रहा है 

– रा 

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