<Early in the Pratahkal> सुबह-सुबह किलोल या इश्कबाज़ी करने वाले ख़ासे रंगीन मिज़ाज़ी होते होंगे या फिर शायद उन्हें वक़्त ही वही मिलता होगा (बकौल फैज़ साहेब के ‘कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया’ सरीके) . सुबह की सैर के बाद हाथ पैर हिला कर कसरत नुमा कुछ कर रहा था। सामने की तरफ, पेड़ों के झुरमुट से परे बंगले के बाहर लॉन में एक माली और उससे करीब दस फुट दूर ड्राइंग रूम में डस्टिंग करती बाई के बीच कनखियों और मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान और आँख मटका चल रहा था। तिरछी नज़रों से दोनों अगल-बग़ल भी झाँक रहे थे। तुकबंदी में प्रेम संवाद कुछ ऐसा रहा होगा
माली : सजनी, हम भँवरा तुम फ़ूल
बाई : सजना, तुम झाड़न हम धूल
