भीगा हुआ जाड़ा

“मेरा बस चले तो बादलों में फाये टाँक दूँ या इन्हें रफ़ू कर दूँ…” याद भी है ये किसने कहा था? तुम ने, हाँ तुम ही ने । ऐसा ही दिन था, बिलकुल आज सा मौसम। रात भर बरसा था और फिर वो जनवरी की ठण्ड। इतनी ही सर्दी थी या शायद इस से ज़्यादा थी। उस रोज़ तो हलकी हवा भी चल रही थी। कोहरे में छिपी सीली सर्दी और बारिश का भीगा जाड़ा तुम्हे कत्तई अच्छा नहीं लगता था। और फिर तुम्हे सर्दी भी तो जल्दी पकड़ लेती थी, छींके, आँख से पानी और खाँसी। बिना किसी बात के चेहरा रुआंसा हो जाता था। बार बार पोंछने से तुम्हारी नाक भी लाल हो जाती थी। पर कुछ भी कहो ठण्ड का मौसम मस्त होता था वर्ना कब तुम चिपक के बैठती थी। कोहरा, जाड़ा, तुम और बाइक राइड 

<इन यादों से हम वक़्त की सिलवटें उतार रहें हैं पर ये तस्वीर बारिश रुकने के बाद सड़क पे जमा हुए पानी में आसमान, धुंधले सूरज और पेड़ के अक्स की है>

जाड़े की बारिश में भीगने का भी उतना ही मज़ा है जितना सावन में तर होने का बस सर्दी  का पानी थोड़ा रूखा होता है । और अगर बीमार पड़ने का डर ना हो तो मेरे जैसा सैर से वापिस ही न लौटे। 

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