सपनों में दुश्मन हमबिस्तर हो जाता है। 

सपनों में
कोई भी चला आता है 
जाना अनजाना 
दोस्त दुश्मन 
चोर साध 
कभी बेखटक
कभी छुप कर  
बिन बुलाये 
बिन बताये 
सपनो का अँधेरा 
सब सोख लेता है 
डर धोखा छल । 

सपनों में
धुंधला जाते हैं चेहरे     
जैसे शीशे पे फिसलती 
पानी की बूंदों के परे    
मायावी छलावी बिम्ब। 
नामालूम, अपने पराये।  
अधखुली आँखों से 
पहचान नही पाते हम  
दुश्मन का कपट रूप। 

सपनों में
हम समझ नहीं पाते 
दुश्मन का  
सम्मोहन मंत्र 
कमज़ोर और निर्बल
हम देख नहीं पाते 
उसका वशीकरण जाल 
निर्जीव निद्रा में   
वो करता है हठ संभोग। 

सपनों में
ढाल के परे 
हम देख नहीं पाते
दुश्मन के भाव 
उसके पैंतरे 
और अस्र शस्त्र। 

सपनों में
दुश्मन 
छुपा लेता है अपने 
नुकीले खंजर और 
झूमती कुचलती चाल।  

सपनों में 
हम बेबस हो जाते हैं 

सपनों में 
हम लड़ नहीं पाते 
दुश्मन से 

सपनों में 
वो हमसे 
चालाकी कर 
प्यार जताने लगता है 

सपनों में दुश्मन 
हमबिस्तर हो जाता है। 

दुश्मन सरीख़े 
सपने क्यूँ नहीं आते 
दिन के उजाले में 
खुली आँखों के सामने 

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