वो नाकाम कोशिशों का दिन था

वो नाकाम कोशिशों का दिन था। 
उस हाड़ जामऊ सर्दी और 
अंधे कोहरे वाले दिन 
ये दो कौवे 
इसी पेड़ की 
इन दो शाखों पर 
एक दूसरे से मुँह फेरे 
परली सुबह से 
गुमसुम बैठे थे। 

एक गिलहरी दो बार 
उनके पास जा 
उन्हें उकसा आयी 
सुझा आई
‘बात कर के ख़त्म करो’  
फिर भी उन्हें चुप देख 
बेचारी ख़ामोश लौट आई  
वो नाकाम कोशिशों का दिन था

उस हाड़ जामऊ सर्दी के दिन
बरामदे में खड़ा मेरा शरीर 
जिसे अकड़ जाना था 
ओस सा रिस रहा था 
यक़ीनन 
वो नाकाम कोशिशों का दिन ही था। 

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