बच्चों के लिए कुछ कहने का, कुछ लिखने का और फिर उन्हें सुनाने का मज़ा वो है जैसे आप अपने बचपन में लौटे हों। कोई मीटर, कोई स्टाइल, कोई ग्रैमर किसी की कोई पाबन्दी नहीं होती। बस सच्चा सपाट प्रसंग, रोज़ देखी या आप बीती घटना, अक्सर सुना संयोग – जिसमे कोई लाग-लपेट न हो, कविता या कवि होने का कोई छलावा न हो। सिनेमा जैसी चलती तस्वीर हो जिसमे बच्चे अपना खुद का दिया संगीत जोड़ सकें, ढोल मंजीरा सुन सकें, अपनी तुक लगा सकें, सुरों को पीछे छोड़ वो अपना पाक शफ़ाफ़ राग गा सकें जिस से मियां तानसेन भी सर नवां दें । बस हो तो शब्दों से जुड़े शब्दों की तुक जिसमे बच्चे अपने शब्द, अपनी तुक जोड़ सकें बिना किसी हील-हुज़्ज़त के। लिखो तो बच्चे हो जाओ, तुक ऐसी मिलाओ के दिल खुश हो जाये और आनंद बख़्शी भी हार मान लें।
ख़ैर, नानी की बत्तीसी तो अगली सुबह मिल गई थी पर ये तुकबंदी खो गई थी। अब मिल गई है तो मज़े लीजिये।
– रा
बच्चों की पत्रिका वाले खूसटों ने इसे वापिस भेज दिया था।