
लाहौर मेरे प्रिय शहरों में से एक है, ऐसा प्रिय कि जिससे मिलना अब तक न हो पाया है. ज़ाहिर है कि मेरा यह ग़ाइबाना लगाव किताबों और दोस्तों की ज़बानी सुने क़िस्सों से पैदा हुआ है. ऐसे में राजिन्दर अरोरा की किताब ‘यार मेरा हज करा दे’ के बारे में कहीं पढ़ा तो इसे मंगाने के लिए दफ़्तर को कह दिया. वे किताब ऑर्डर करते, इसके पहले ही तोहफ़े की शक़्ल में किताब मेरे पास आ गई. मज़मून तो एक बैठकी में पढ़ने लायक़ है, मगर जगह-जगह इस क़दर भावुक करता है कि इसे दो बार में पढ़ा जा सका.