इनमें से एक मुहम्मदी है, एक ओल्गा है और एक है मेरी माँ। ये तस्वीर पटना की है, साल रहा होगा 1950 जब माँ BNR Training College, गुलज़ार बाग, पटना से टीचर्स ट्रेनिंग कर रही थीं । ये 6 लड़कियां माँ की दोस्त और क्लास वाली थी जबकि इनके पीछे चश्मा पहने इनकी टीचर खड़ी है। ये सब हॉस्टल में रहती थीं। माँ के सिवा अब कौन कहां है कोई पता नहीं । माँ दाहिने से तीसरे नंबर पर हैं।
माँ (यानि कृष्णा ग्रोवर अरोरा) बताती हैं कि ये तस्वीर १५ अगस्त या उसके आस पास की है। उस दिन कॉलेज में कुछ प्रोग्राम हुआ था कोई अंग्रेज़ ट्रेनर आए थे। ये लड़कियां आये हुए मेहमान के लिए कुछ गा रहीं है, मेहमान सामने शामियाने के नीचे बैठे होंगे। टेंट की रस्सियाँ साफ़ दिख रही हैं। सोचिए ये प्रिंट ७३ साल पुराना है और अब भी ताज़ा सा ही लगता है और इन सब में माँ तो गज़ब दिख रही हैं
माँ अब इस तस्वीर में से किसी को नहीं पहचान पाती, बावक्त अपने आप को भी नहीं। कॉलेज की अपनी इन दो दोस्तों के नाम के सिवा मां को कभी-कभी उस वक्त के कुछ और नाम भी दस्तक देते हैं जैसे “वॉयलेट” और मिस दासगुप्ता। “वॉयलेट सच मुच का नाम है” वो दोहराती हैं और कहती हैं “वो मेरी पक्की सहेली थी”। वॉयलेट के साथ गप लगाना और एंब्रॉयडरी करना उन्हें याद भर है।
“आपकी साड़ी का रंग या प्रिंट क्या रहा होगा ?” मैंने पूछा। “बॉर्डर लाल, हरा या नीला हो सकता था पर कॉलेज के दौरान साड़ी सिर्फ और सिर्फ सफ़ेद ही पहन सकते थे, हां छुटी के दिन या जब कॉलेज से बाहर जाते थे तो अपने पंजाबी सूट पहन कर और दो गुत्त (braids) बना कर जाते थे। फंक्शन वाले दिन तो टीचर बताती थी के क्या पहनना है।”
लाहौर जैसे फैशन परस्त और खाने-पीने वाले शहर से आई बीस साल की अल्हड़ के लिए कैसा रहा होगा 1950 का पाटलीपुत्र बनाम पटना। कैसे रहे होंगे पटना के जवां लोग, स्कूल और टीचर, बाज़ार, दुकानें वहां के सिनेमाघर, रेस्टोरेंट या मस्ती की दूसरी जगह, आज़ादी के बाद का वहां का माहौल। कैसी होगी वहां की राजनीति जब बाबू राजेंदर प्रसाद राष्ट्रपति बन दिल्ली आ चुके थे और कृष्ण सिंह सिन्हा बिहार के मुख्य मंत्री थे, वो जिन्होंने प्रदेश से जमींदारी खत्म कर ज़मीन काश्तकारों के हाथों में दे दी ।
कॉलेज में बिताए दो साल में हुई कुछ ही चीज़ें माँ को याद हैं ।
वो लोग जो अपने माजी को भूल सकते हैं बहुत खुशकिस्मत होते हैं, वो अपने दिलो दिमाग पे बोझ ले कर नहीं जीते।
पटना कॉलेज में ये लोग हॉस्टल में रहते थे। लड़कियों के हॉस्टल की कहानियां हम बेटों से कभी साझा नहीं की गईं , बेटी को कुछ का पता है जो भाइयों को बतलाई नहीं जा सकती। उन दिनों की शरारत और बदमाशियों का जिक्र भी कभी कभी बातों में आ जाता है जिसमे ज्यादातर बिना इजाज़त लिए फिल्म देखना सबसे ऊपर है । कुछ वाक्यों में किसी ख़ास शख़्स को दोस्त बनाना, परदे वाले रेस्टोरेंट में चाय के लिए जाना या फिर ख़त लिखना और मिलना शामिल है।
इन सब ने टीचर्स ट्रेनिंग के बाद अपने अपने घरों को रूखसती की और अलग अलग सूबों में मास्टरनी की नौकरी कर शादी के लिए तैयारी शुरू कर दी। बटवारे में बेघर हुई पंजाबी कौम अगले तीन चार साल बाद भी अभी अपने पैर नही जमा पाई थी, मिडिल क्लास लड़कों के पास अच्छी नौकरियां नहीं थीं या उनका अपना कारोबार पूरी तरह सेट नही हुआ था जिसके चलते पढ़ी-लिखी और नौकरी कर कमाऊ लड़कियों के लिए लड़कों की कमी थी ।
झरोखों से निकली रौशनी की तरह गुज़रे वक़्त की महीन यादें माँ के दिल की दीवार पे सिनेमा सी चलती होंगी तभी तो उनके बात करने के लहजे से लगता है जैसे कहीं बीच में वायलिन का एक तार खींचा गया और कहीं धप सी मृदंग की थाप आई। आजकल सुबह माँ की आँख खुलते ही ज़िन्दगी का एक गुज़रा मंज़र उनके सामने आता है। पुरानी यादों से भरा पर ऐसा तरो-ताज़ा कि रात को किसी ने बचपन और जवानी की यादों पे पड़ी धूल को एक हिस्से से साफ़ कर दिया हो और उस हिस्से की यादें ज़ुबान पे रपटती तेज़ी से बहार आने को बेचैन हों। सुबह की पहली चाय के साथ उन यादों को ऐसे बयान करती हैं जैसे वो ‘रात-बीती’ ही हों।
आज सुबह दो बार कोशिश करने पर भी कंधे पे शॉल नहीं डाल सकीं सो रजनी ने ओढ़ा दी। अपने दायें कंधे की तरफ ऊँगली करते हुए कहती हैं, “मेरा कन्धा बहुत दर्द कर रहा है। रात जेनेट ज़ोर से लिपट गई और देर तक उसने मुझे भींचे रखा। अस्मा ने उसे मना भी किया पर वो फिर भी सीने से लगी रही। शायद रो रही थी।” एक मिनट के लिए रुकीं, फर्श पे कुछ देखा फिर बेड की तरफ़ और फिर बोलीं ‘जेनेट रात यहीं थी, सुबह ही गयी होगी’। सवालिया निगहाओं से बिस्तर को भी कुछ पूछ रहीं थी जैसे वो ही इस सब का ज़िम्मेवार हो।
हम दोनों, रजनी और मैं, भौंचके खड़े माँ को देखते रहे। ‘जेनेट’ और ‘अस्मा’ हमारे लिए दो नए नाम थे। अब ये दो कौन हैं और कहाँ से आ गईं? रोज़ बरोज़ नए किरदार जुड़ते जा रहे हैं। चाय के दूसरे कप के साथ बात आगे बढ़ी। लो अब और दो नाम यादाश्त से फिसल कर बाहर आये। बानो और मोहंती। ये दो भी क्लास में साथ पढ़ने वाली सहेलियां थीं। उपनाम मोहंती वाली लड़की का पहला नाम याद नहीं आया। “हॉस्टल की रसोई जेनेट की निगरानी में थी वो ही रोज़ की सब्ज़ी-दाल तय करती थी। चावल तो दोनो वक़्त बनते थे पर रोटी एक ही वक्त। जेनेट हम सब से भी रसोई का काम कराती थी, मेरी जिम्मेवारी खासकर टमाटर काटने की थी। बहुत टमाटर कटवाएं हैं उसने मुझसे। मुझे रसोई का काम करना बिलकुल अच्छा नहीं लगता था।”
मुँह सा बना कर हाथ में पकड़ा चाय का मग माँ मेज़ पर रख देती हैं और कुछ सोचने लगती हैं। पूरी ज़िन्दगी उन्हें खाना बनाना या रसोई का काम बिलकुल अच्छा नहीं लगा, कभी नहीं । बड़े फ़ख्र से ख़ुद ही बताती हैं ‘शादी के पहले दो साल हम सिर्फ बाहर ही खाते थे।’
मुझे नहीं याद हमारे घर में कभी भी ‘पकवान’ बने हों। सादा खाना जो काम से कम मेहनत से और जल्द से जल्द तैयार हो सके ताकि रसोई से वो निपट जाएँ उनकी कमज़ोरी थी। मुझे और मेरी बड़ी बहन को चाय-काफी बनाना, आटा गूँधना, सब्ज़ी (ख़ासकर प्याज़) काटना, दाल धोना, बैंगन भूनना, अंडा उबालना, ब्रेड सेकना उस पर मक्ख़न या जैम लगाना, दही मथना आदि-आदि कच्ची उम्र में ही सीखा पढ़ा दिया गया था। उनकी पसंद की सब्ज़ियों का दायरा भी बड़ा नहीं था – आलू, आलू-गोभी, आलू-बड़ी, आलू-टमाटर, आलू-मटर, आलू-प्याज़, छोटे-आलू – और कभी दिल किया तो बैंगन का भुर्ता।
सिर्फ खाना बनाना ही क्या माँ को घर का कोई काम करना कत्तई पसंद नहीं था। उनके लिए ये मजबूरी थी अपने घरवाले और बच्चों को पालने-पोसने के लिए। माँ का बस चलता और अगर उनके पास पैसा होता तो वो घर का कोई काम कभी न करतीं। झाड़ू-पोछा, बर्तन-भांडे, कपडे धोना और इस्त्री करना, डस्टिंग, साफ़ सफाई सब ‘किसी और’ के काम थे, उनके नहीं। छोटी उम्र में ही मैंने कपडे धोना सीख लिया था। माली हालत कैसे भी रहे हों कपडे प्रेस करने वाले भैया का साथ हमारे बचपन से रहा है।
सिर्फ घर के काम ही नहीं, यकीन मानिये (मैंने ये पढ़ कर उन्हें सुना भी दिया है) अपने कपड़ों, जी हाँ उनके अपने पहने कपड़ों, खासकर साड़ी को तह कर अलमारी में रखना उन्हें बिलकुल नहीं भाता था। ये काम पिता जी का था। तब भी उन्हें पसंद नहीं था, आज तो ख़ैर 90 साल की उम्र में बिलकुल भी नहीं, आजकल साड़ी, शाल वग़ैरह हम ही तह कर देते हैं या वो उसे गोल मोल कर अलमारी में लुढ़का देती हैं।
अमूमन स्कूल-कॉलेज से जुड़ी यादें कम ही भूलती हैं पर माँ ने बहुत कुछ शायद जान बूझ कर भुला दिया था या दिमाग के किसी अँधेरे कोने में धकेल दिया जो अब रिस रहा है । “पार्टीशन की मार-काट उसका दर्द और अपना घर आंगन बचपन में ही लुट जाने का बड़ा मलाल है मैं बीते वक्त के बारे में नहीं सोचना चाहती।” ऐसे ही कुछ शब्द माँ ने लाहौर में भी कहे थे जब हम उनका और पिता जी का घर ढूंढने पाकिस्तान गए थे।
हमारे नाना, जो लाहौर में थानेदार थे, बटवारे के बाद परिवार को हिंदोस्तान में छोड़ खुद काम के लिए काबुल, अफगानिस्तान चले गए। वहां कारोबार जमा नहीं तो सिंध से बीकानेर होते हुए वापिस दिल्ली आ गए। हमारे नाना-नानी के दस बच्चे थे, पांच बेटियां और पांच बेटे, मां का नंबर उपर से चौथा है। दस में से अब कुल चार ही बचे हैं, तीन बहने और एक भाई ।
हमारी माँ की सबसे बड़ी बहन, जो माँ से करीब 12 साल बड़ी थीं, रोहतक में ब्याही थीं, वहां के आर्य स्कूल में सीनियर टीचर थीं सो मां पटना से सीधे रोहतक उनके पास चली आईं । वहां आ कर पहले एक लोकल ट्रेनिंग कॉलेज में लड़कियों को टीचर बनने में ट्रेन करने लगीं और फिर एक प्राइवेट स्कूल में टीचर की नौकरी करने लगीं ।
रोहतक में ही माँ की शादी उस परिवार में तय कर दी गई जिन्हें नाना लाहौर से जानते थे । इन दोनो की शादी का न्यौता सरकारी पोस्टकार्ड के पीछे पिता जी की बहन ने छपवाया था जिन्होंने उनका ब्याह पक्का किया था। एक अकेली बहन के सिवा पिता जी का और कोई नहीं था। उनकी मां और पिता दोनों बटवारे से पहले ही गुज़र गए थे, एक भाई था जो शायद दंगों में मारा गया। बहन का लाडले होने की वजह से पिता जी बिगड़ैल थे। इधर ज़माने से आगे चलने वाली, तेज तर्रार, हॉस्टल में रही, नौकरी से लैस टीचर को बिगड़े नवाब को सीधा करने में कोई वक्त नहीं लगा ।
रोहतक में शादी बना ये जोड़ा दिल्ली के करोल बाग़ इलाके में आ बसा। हमारी बुआ का कोई बच्चा नहीं था। ये अकेला छोट भाई था जो उन्हें जान से भी प्यारा था। बुआ और फूफा ने बड़े प्यार से पाल पास कर बड़ा किया था सो शादी के बाद उसे आसानी से अपने से अलग भी नहीं पाए। पर नई बहु (हमारी माँ) को शायद अपनी आज़ादी और प्राइवेसी दोनों ही पसंद थे। नए ख़यालात नया रेहन-सहन और आने वाली औलादों के लिए तालीम पे ज़ोर देने वाली ने घर जल्द ही अलग कर लिया हालांकि खाना बनाने की सलाहियत न होने की वजह से कुछ महीने रसोई बुआ के यहाँ से ही चलती रही। घर पास पास ही थे सो वैसे भी सुबह शाम मिलना चलता रहा।
अपना मायका भी दूर था, दो बड़ी बहने और दो भाई शहर से बाहर। हमारी नानी भी सेहत से कोई ज़्यादा अच्छी नहीं रहती थी और उनके पास तो अपने ही कई मसले थे। इन्हे फिल्म देखने का शौक़ ऐसा था कि घर लिबर्टी सिनेमा के ठीक सामने रोहतक रोड पे ले लिया। बस फिर क्या था, बच्चों को सुलाओ बाहर से ताला लगाओ सड़क पार करो और नाईट शो के लिए घुस जाओ।


Touched ❤️
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