माँ को ताश खेलने की लत है
मेरे बचपन से ही, या यूँ कहिये
जब से मैंने देखा है, तब से,
अब भी है। पर तब से थोड़ी कम।
15 नहीं तो 10 बाज़ियाँ बांटी जाती हैं
पत्ते फैंट कर – स्वीप, रम्मी या पप्लू।
कोई साथ न खेले तो नाराज़ और गुस्सा
जैसे अमली को मिली न हो
उस दोपहर की अफ़ीम।
ये लत नाना को भी थी
मासी और मामा लोगों को भी
यानी पूरे ननिहाल को।
सब खेलते थे पत्ते –
12 महीने, हर रोज़, बस
मातमी दिनों को छोड़।
नानी नहीं खेलती थी
उसे शायद आता ही नहीं था
ताश खेलना या पत्ते बांटना भी
उससे कोई पूछता भी नहीं था।
गोरी, चिट्टी, मेम सी गुलाबी नानी।
उसे वक़्त कहाँ था ताश खेलने का
उसे तो और बहुत काम थे
11 बच्चे और एक थानेदार
जो पालना था ।
घर के कुल 13 जन
ताश की गड्डी का
एक पूरा रंग, जाने कौन सा –
हुकम, चिड़ी, ईंट या पान ?
नानी ताउम्र रसोई में ही रही
और फ़ारिग ही न हुई
चूल्हे से अंगीठी से अंगार से
आखिर खो गई उसी आग में ।
बच रहे, 11 जमा 1
खो गई पान की बेग़म
क्वीन ऑफ़ हार्ट्स, ग्रैनी लॉस्ट।
नानी चल बसी
फिर भी बाज़ियाँ रुकी नहीं
अभी-अभी माँ की आवाज़ आई –
“फ़ेंक पत्ता” ।
