डाक्टरों के “कुछ रोज़” भी कितने कम होते हैं ना!

“Anoop is gone.”  टेबल के दूसरी तरफ से अपने लैपटॉप की स्क्रीन से उचक कर देखते हुआ रजनी ने मझे बताया। वो दुखी थी, मैं कुछ लिख रहा था। डायरी और पेन को एक तरफ सरका मैं अनूप नायर का चेहरा याद करने लगा। आठ रोज़ पहले ही हम उसे देखने उसके घर गए थे। कल सुबह उनकी पत्नी राजी का मैसेज आया था ‘अनूप ठीक नहीं लग रहे उन्होंने काली उलटी की है और उनकी सांस भी उखड रही है”। कल से आज तक अनूप ने अपनी ज़िन्दगी एक दिन और बढ़ा ली जो और कई  साल लम्बी होनी चाहिए थी। अनूप शायद 70-71 के रहे होंगे वो पिछले एक साल से कैंसर से जूझ रहे थे। 

अनूप मेरे दोस्त नहीं थे। मैं उन्हें बस जानता भर था।  कुल दस बारह बार मिला था। हमारे बच्चे एक ही स्कूल में पढ़े थे। बच्चों ने स्कूल के करीब 10 साल इकट्ठे गुज़ारे जिस नाते बच्चों का काफी मिला जुलना था। स्कूल के बाद अगले 15 साल में उनकी दोस्ती में कई नए जुड़ाव आये – नाटक, संगीत, गाना, लिखना और अभिनय जिस से दोस्त और नज़दीक आ गए। रजनी और राजी की दोस्ती भी बच्चों पर नज़र रखने वाली माओं सी थी। अनूप और राजी एक दो बार हमारे घर भी आये थे। 

अनूप हसमुख थे। आम भाषा में कहा जाए तो अनूप आम आदमी थे, “हैप्पी गो लकी”। मेरे जैसे, हमारे जैसे, दुनिया के आम बाशिंदो जैसे जिनमे कोई लाग-लपेट नहीं होती। मैं जितना भी उन्हें जानता था मेरी समझ से वो अच्छे और सुलझे हुए इंसान थे। कोई नेता, अभिनेता, उद्योगपति, ज़मींदार या भाव खाने वाले रईस नहीं थे। प्यार से और धीमा बोलने वाले प्यारे से इंसान थे। कोई उन्हें मिल कर ये नहीं कह सकता था कि वो केरल से थे मुझे वो आधे पंजाबी लगते थे, उनकी बोली में मलयालम के सुर न थे। पेशे से वो टूर एंड ट्रेवल एजेंट थे। पर वो वैसे टिकट बनाने वाले ट्रेवल एजेंट नहीं थे। 

अनूप घुमक्कड़ किस्म के इंसान थे सो उन्होंने नए देश, पुरानी संस्कृतियां और नए नज़ारे देखने को ही अपना पेशा बना लिया। अनूप की कंपनी के साथ कई विदेशी विश्वविद्यालय जुड़े थे जहाँ के छात्र खास तौर पर शोध या रिसर्च करने वाले छात्र हिंदुस्तान को जानने और समझने के लिए आते थे। उन स्कॉलर्स या छात्रों के लिए ताजमहल और लालकिले से परे वाला हिंदुस्तान भी अहम था इसलिए अनूप उन्हें दूर दराज़ के गांव और छोटे शहरों में रहने वाला हिंदुस्तानी और उनका इतिहास समझने और दिखाने ले जाते थे। हिंदुस्तान आने वाले उन छात्रों को अनूप वहां की संस्कृति, तहज़ीब, पहनावा, खान-पान, सभ्यता, सक़ाफ़त और सच्ची विरासत नज़दीक से दिखाना चाहते थे। अनूप जब बात करते थे तो अपनी दुनिया में चले जाते थे – गुडगाँव, दिल्ली, बम्बई और कोच्ची से परे। उनकी दुनिया बर्फ से ढके सफ़ेद पहाड़ो और हिमालय की वादियों सी शांत और सुन्दर थी। उस दुनिया के पास कहीं अथाह समुन्दर की गहराइयाँ थी और कहीं रेगिस्तान के रेतीले टीलों से दिखने वाले सूरज की लालिमा। उन्हें जंगल भी पसंद थे और ऊँची इमारतों वाले शहर भी। ले दे के अनूप मस्त मौला इंसान थे।   

अनूप और राजी दो बार हमारे दफ्तर भी आये। उन्होंने अपनी एजेंसी का रंगीन कैटेलॉग बनाने का ज़िम्मा मुझ पर सौंपा था। बस उन्हीं दिनों में मैंने अनूप को नज़दीक से देखा और जाना। आखिरी बार 28 अक्टूबर को जब मैं उनसे उनके घर पर मिला तो बहुत ही धीमी आवाज़ में उन्होंने ने मुझ से पूछा “अभी भी पहाड़ पे जाते हो ?” इस सवाल पर हम दोनों की आँखें मिली और जवाब में मैंने हाँ कहते हुए उनका हाथ अपने हाथ से सहलाया । उनके हाथ में अब वो गर्म जोशी नहीं थी। उनका स्याह पड़ता चेहरा मुरझाया हुआ था। शरीर का वजन शायद आधा रह गया था, अपने-आप बिस्तर से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे। दर्द उनके चेहरे पे लिखा था पर फिर भी अपनी भीनी-भीनी मुस्कान से वो मुझे बिस्तर पर पकड़ के बैठे थे। बड़ी व्यथा थी। मैं उनसे बात भी करना चाहता था पर ये नहीं चाहता था की ज़्यादा बोल कर वो थक जाएँ। डॉक्टर लोग हमे पहले ही बता चुके थे कि बात अब कुछ रोज़ की ही है। डाक्टरों के “कुछ रोज़” भी कितने कम होते हैं ना ?

और फिर अनूप चल बसे। जी हाँ गुज़र गए।  इस ‘जाने” को कैसे कैसे शब्दों में कहा जाता है, लिखा जाता है, व्यक्त किया जाता हैं। जाना या गुज़रना दोनों शब्द यात्रा से भी जुड़े हैं – देशाटन से, सफ़र से, दौरे से, भ्रमण से, रास्तों से प्रकृति से, घुमकड़ी से, सैर-सपाटे से   – बाहरी और अंदरूनी ख़ोज से। ‘गुज़र गए’ से ऐसे लगता जैसे कोई अभी सामने वाले रास्ते से गुज़ारा है और घूम कर पीछे वाले रास्ते से आ जायेगा या ऐसे की वो अब नए घर को चला गया है या फिर यूँ कि वो आये थे अपना काम पूरा कर वो दूसरे काम को निकल गए, एक नई यात्रा को एक नए दौरे पर। 

अनूप यात्राओं के बिज़नेस से जुड़े थे। ता उम्र वो खुद भी घूमे और हज़ारो साथियों और यात्रियों को भी घुमाया, मेरा मानना है वो इस बार किसी लम्बी यात्रा में निकल गए हैं। फिर मिलेंगे दोस्त, किसी नए रास्ते पे नए मुकाम पे। तब तक के लिए प्यार भरा सलाम। 

5 November 2024

At the memorial for Anoop Nair On 8th November 2024, Zorba the Buddha, Delhi

Leave a comment