हज़रत अमीर ख़ुसरो के उर्स पे हाज़री लगाने लाहौर से आये दोस्त अली उस्मान बाजवा से कल दोपहर मुलाक़ात हुई। यूँ तो उस्मान को मैं बरसों से जानता हूँ पर कल उनसे पहली बार रूबरू हुए। (रूहों के ये रिश्ते बड़े कमाल के होते हैं) मिलना भी क्या था बस दो घंटों में रावी दरया और उनके प्यार को सोखना भर था। कल रात ही उन्हें वापिस सरहद पार घर लौटना था। उस्मान जाने माने अदीब हैं, रेडियो और टीवी पे कई प्रोग्राम करते हैं “वेख पंजाब” और “पंजाबी संगत” संस्थाओं से जुड़े हैं। पंजाबी ज़ुबान को उर्दू के बराबर का दर्ज़ा दिलवाने में दिलो-जान से जुड़े हैं पर सबसे पहले और सबसे ऊपर एक हसीन इंसान हैं जिनके पास दोस्ती और प्यार की हज़ारों कहानियां हैं । उन्हें मिलने आये एक और दोस्त भी इसी तस्वीर में हैं @सतनाम सिंह जिनसे मैं पहली बार मिला। सतनाम जी जाने माने गायक हैं जो पंजाबी लोकगीत के साथ साथ दिल हिला देने वाली नात भी पढ़ते हैं । हमारी दोस्तियां ही कुछ ऐसी हैं हम जहाँ जाते हैं एक क़िताब ले आते हैं या एक क़िताब दे आते हैं। कुलवंत कौर संधू जी द्वारा संकलित इस किताब में करीब दो सौ पंजाबी लोक गीत हैं जिनमे गीतों के साथ टप्पे, घोड़ियाँ, सुहाग, सेहरे, गिद्धे, बोलियाँ और भाई-बहिन के प्यार के गीत भी हैं। ये क्या कम है की कनॉट प्लेस के कॉरिडोर में सतनाम ने हमे पंजाबी गाना सुनाया।
