पिशौरी ते लाहोरी
पिशौरियों और लाहौरीयों की मुहब्बत के कई किस्से मशहूर हैं; हाय हाय, ऐसे हैं के सुनाये नहीं बनते। ऐसी मुहब्बत के मौका मिले तो ये दोनों तो एक दूसरे को घर तक छोड़ कर आते हैं; काटने या कूटने से भी नहीं बख़्शते ये। मुक़ाबले भी ख़ूब करते हैं — महीन और सूफियानी चमड़ी वाले लाहौरीयों नें कसूर में ऊँटनी (डाची) की नर्म खाल से ज़नाना जुतियाँ बनाई तो पिशौरियों ने मोटी जिल्द वाले जनावरों और ट्रक टायर से मर्दाना सैंडल बना दिये। एक पुश्तैनी लाहोरी ने जब पिशौरी सैंडल पहनने की गुस्ताखी की तो शाम तक उसके पैरों का हाल आप देख सकते हैं। ‘ये जख्म थोड़े ही हैं ये तो प्यार के थपेड़े हैं’। लो भाई लो, ले लो वापिस, इतना प्यार नहीं चाहिए मुझे। कोहलापुरी ठीक है। वैसे ये कोई हल्दी रसम नहीं हो रही है और जब से मैंने फोटो खींची है पिशौरन तो मुँह फुलाए बैठी है।
महाभारत के कौरवों वाले कुरु वंश की राजमाता गांधारी इसी इलाक़े से बताई जाती हैं। पिशौर के गांधार मैदानों में ही पली बढ़ी होंगी। खैबर दर्रे को जाने वाली वादी में बसा पेशावर शहर गांधार के महकते मैदानी इलाके के लिए जाना जाता है। तीन तरफ़ पहाड़ों से घिरे गांधार के मैदानों और पहाड़ियों में कभी हजारों बौद्ध भिक्षु गुफाओं और मठों में रहते थे। सिकंदर के फ़ौजियों की एक टुकड़ी रास्ता भटक यहीं आ गई थी जिन्होंने भिक्षुओं को बुद्ध की मूर्तियाँ तराशना सिखाया। उधर दूसरी तरफ उत्तर पूर्व वाले लाहौर से एक सड़क (मुग़ल रोड) मरी और रावलपिंडी होते हुए हिमालय की काराकोरम और पीर पंजाल शृंखला तक ले जाती है। मरी की पहड़ियाँ भी गांधार सी हसीन हैं जो अपने यहाँ बनी शराब से पेशावर को टल्ली कर देती हैं। एक तरफ भक्ति रस तो दूसरी तरफ सोमरस।
