दर्द बत्तीसी – Tooth-hurty

सहना मुश्किल, कहना मुश्किल
बैठना मुश्किल, सोना मुश्किल
खाना-पीना और भी मुश्किल
टिक कर बैठे रहना मुश्किल
दाँत का दर्द बड़ा जालिम है
रोना भी होता है मुश्किल।
 
सारी रात मैं सो न पाया
रोया, तड़पा और चिल्लाया
बर्फ की पट्टी गाल पे रखी
माँ ने लोंग का तेल लगाया
सुबह हुई डॉक्टर को भगा
जा कर अपना हाल सुनाया।
 
न  कुर्सी, न स्ट्रेचर था वो
जिस पर उसने मुझे बिठाया
पलंग नहीं, न सोफ़ा था वो
आँखों से अपनी धमकाया
आयरन-मैन सा दैत्य खींच कर
रोबोट का फिर बल्ब जलाया।
‘हिलना मत, मुँह खोले रखना’
टीचर सा उसने चिलाया।
 
   स्टार-वॉर के रॉकेट जैसा, लगता उसका कमरा था
   एस्ट्रोनॉट सा कुर्सी पर मैं, ना बैठा, ना लेटा था।
 
खोला मुँह, बंद आँखे कर लीं
गले में अटकी, थूक गटक ली
गर्दन पीछे को लटका ली
‘हाय री माँ ‘ आवाज़ निकाली।
 
पर उसको तो रहम न आया
‘क्यूँ आया था?’ मैं पछताया ।
चमच मुँह में डाल एक अंदर
ज़ोर से उसने गाल दबाया।
 
मोलर मोलर बोल रही थी
जबड़ा पूरा खोल रही थी
अंदर कुछ खो गया हो जैसे
मुँह ऐसे टटोल रही थी ।
 
    मंजन, दातुन जानते हो क्या?
    टूथ-पेस्ट पहचानते हो क्या ?
    ब्रश क्या कभी नहीं करते हो?
    मुँह का ध्यान नहीं रखते हो?
    ऐसे क्या लेज़ी हो तुम जो
    दाँत भी साफ़ नहीं करते हो ?
 
    इन्फेक्शन है, पस भी होगा
    कट तो एक लगाना होगा
    ऑपरेशन तो छोटा है पर
    ड्रिल भी इसमें करना होगा।
 
    कैविटी है इसे भरना होगा
    पहले खाली करना होगा
    इसका रुट कनाल भी होगा
    कैप लगेगी, एक्सरे होगा।
    थोड़ा दर्द तो होगा लेकिन
    इतना सब तो सहना होगा।
 
 
ठोक के पूरे दो इंजेक्शन,
लूज़ कर दिए सभी कनेक्शन
दिन में दीखन लागे तारे,
फेल हुए सब अपने एक्शन।
 
   सब कुछ जैसे फूल गया था
   तालू, जीभ को भूल गया था
   लार तो जैसे सूख गयी थी
   होंठ को हिलना भूल गया था
   गाल बन गए थे गुब्बारे
   सुकड़ मसूड़े सो गए सारे।
 
 
लम्बे से  कुछ यन्त्र वो ले कर
शुरू हो गयी मुँह के अन्दर
 
   पुच-पुच मारे थी पिचकारी
   और चलाये मुँह में आरी
   खुरच-खुरच बेहाल कर दिया
   जबड़ा मेरा लाल कर दिया
   लहू-लुहान दांतों की टोली
   मुँह में खेल रही थी होली।
 
हथियारों से लैस थी पूरी
काली देवी, डॉक्टर सूरी ।
 
   मीठा है दाँतो का बेरी
   इससे होती गहरी केरी
नहीं रखोगे साफ़ जो इनको, सभी दाँत गिर जायेंगे
कैसे फिर खाना खाओगे, कैसे तुम मुस्काओगे।

नानी के घर जाना है कल

नानी के घर जाना है कल
नानी के घर जाना है
दिन भर कल मस्ती करनी है
और फुलटू मज़ा उड़ाना है।
नानी के घर जाना है कल
नानी के घर जाना है।

मम्मी मेरे साथ चलेंगी
नानू लेने आएंगे
कार में अपने साथ बिठा कर
पूरी सैर कराएँगे।
म्यूजिक सुनते, हॉर्न बजाते
हम सब तो थक जायेंगे,
चीकू जी पर सारा रस्ता
भों भों करते जायेंगे।
लाल किले पर रुक कर हम सब
चाट पकोड़ी खायेंगे,
कनाट प्लेस से नानू मुझको
कपडे नए दिलाएंगे।
घर पहुंचेंगे देर से जब हम
नानी आँख दिखाएगी
झूठ-मूठ का गुस्सा कर वो
मुझेको खूब सताएगी
आप ही रो देगी वो पहले
और फिर मुझे रुलायेगी।
गोदी में लेकर फिर मुझको
अपने गले लगाएगी
जल्दी से खाना ला कर वो
प्यार से मुझे खिलाएगी।
गुड़िया से लगती है नानी
सुन्दर, प्यारी और सायानी
‘चाँद कटोरा’ मुझे बुलाये
और ‘कहे परियों की रानी’.
मौसी मेरी बड़ी कूल है
नाम है रोज़ी, ब्यूटीफुल है
सिनेमा मुझको ले जाती है
शॉपिंग भी करवा देती है
शाम को जब वो मूड में आती
गोलगप्पे और चाट खिलाती
नए नए वो जोक सुनाती
गाडी में है खूब घुमाती।
रूबी मासी चुप रहती है
आँखों से बातें करती है
हल्की-हल्की मुस्काती तो
हिंदी की टीचर लगती है।
धीरे-धीरे चलती है वो
मीठे सुर में गाती है
थक जाती हूँ खेल के जब में
प्यार से मुझे सुलाती है।
छोटा मामू बड़ा मस्त है
बड़का रहता बड़ा व्यस्त है
इक नानू इक नानी जैसा
मुझको तो दोनों प्यारे हैं
बड़का मामू बिज़ी बहुत है
बिजनेस उसका बड़ा बहुत है
सारा दिन वो दौड़ता फिरता
थोड़ा भी आराम न करता
फुरसत उसको ज़रा नहीं है
सब कुछ है पर ‘टाइम नहीं है’
गुस्सा उसको जल्दी आता
गाड़ी है वो तेज़ चलता
खुद से रहता है बतियाता।
घर वो रात देर से आता
बैग में भर के पैसे लाता
छोटे छोटे कागज पर वो
जाने क्या-क्या लिखता जाता।
घर पे बैंक और बैंक में घर है
पैसे तो वो खूब कमाता।
छोटा मामू सोचता रहता
जाने क्या वो खोजता रहता।
मन ही मन वो कुछ बिनता है
ऊँगली पर जिसको गिनता है
आँखों से नापे दीवारें ,
खिड़की से बातें करता है।
गोल-गोल कागज़ के डंडे
जिन पर लिखता अपने फंडे।
कान में पेंसिल, हाथ में कागज
बीच बीच में सर खुजलाता
नाक पे चश्मा सीधा रखके
हवा में फिर तस्वीर बनाता।
ड्राइंग बोर्ड पर बैठ के दिन भर
नक़्शे घर के खूब बनाता।
नानी का घर बहुत बड़ा है
लॉन में जिसके पेड़ खड़ा है
पेड़ के नीचे बड़ा सा झूला
गद्दा जिसपे एक पड़ा है
आस पास फूलों की क्यारी
उड़ती जिन पर तितली प्यारी
एक डाल पर बैठा तोता
दूजी पर कौआ है सोता
गिलहरी का बीच में बिल है
नीचे चिड़ियों की महफ़िल है।
बागीचे के ठीक सामने
ड्राइंग रूम है बड़े महल सा
चार हैं सोफे छह मेजें है
बैठक में दीवान लगे हैं।
बड़ा है आँगन, बड़ी सी छत है
बड़े हैं कमरे, बड़े ग़ुस्ल हैं
बड़ी रसोई, बड़ी मेज़ पर
खाने के पकवान लगे हैं।
नानी के घर जाउंगी
कल नानी के घर जाउंगी
दिल भर कल मस्ती कर लुंगी
फुलटू मज़ा उड़ाऊंगी।