​ख़ुदा का घर 

रात हो चुकी थी, वैसे भी मैं वहाँ देर से पहुँच था।  खुदा का घर बंद हो चुका था और ताला ‘अंदर’ से लगा था। साथ सटे बंगले में मौज मस्ती का प्रोग्राम था। मैं बस बाहर से ही नमस्ते कर आगे बढ़ने ही लगा था कि उस घर के रास्ते ने मुझे सोचने पर और ये तस्वीर लेने पर मजबूर दिया। उस तक पहुँचने के लिए इस सँकरे रास्ते नें मुझे बांध लिया था। असेंबली ऑफ गॉड चर्च बरेली के रामपुर गार्डन इलाके में है। ये गिरिजघर अंदर से कैसा है ये तो मैं नही देख पाया पर हाँ, इसके साथ सटे इंसानों के घर यकीनन बहुत खूबसूरत थे। उस रोज से ये तस्वीर मेरे लिए एक पैगाम बन गई । हिंदुस्तान में और दुनिया के भर में मैंने एक सौ से अधिक कथीड्रल, चर्च, चैपल, बसेलिका, ऐबी, पेरिश और कई ईसाई मठ देखे हैं पर किसी तक पहुँचने का रास्ता इतना संकरा कभी नहीं पाया। बस पाताल भैरव और वैष्णो देवी की गुफा का रास्ता ही शायद इतना या इस से छोटा होगा। खैर। 

​ख़ुदा का घर हो या किसी इंसान का दिल कहते हैं की इन दोनों तक पहुँचने का रास्ता बहुत संकरा ही होता है । ​ख़ुदा के घर से मतलब ईश्वर, अल्लाह, गॉड, वाहेगुरु और वो सब नाम हैं जिनमें आदमी एक सहारा ढूँढता है। सब्र, धीरज और उम्मीद का दामन जब छूटने लगता है तो इंसान बार-बार सुकून या मदद के लिए इसी संकरी गली से होकर अपने अपने ​ख़ुदा के घर खुद जाता है, यानी हर मुश्किल में भगवान को याद करता है 

दुनियाबी और इंसानी फ़लसफ़ा भी यही है – ज्ञान प्राप्त करने का रास्ता भी अक्सर संकरा, मुश्किल, अकेलेपन और उजाड़ से हो कर ही जाता है, भीड़भाड़ वाले रास्ते से नहीं, बल्कि प्यार, आत्म-चिंतन और अंदरूनी हिजरत के जरिए ही मिल पाता है, वो सब जो हमें बाहरी दुनिया के शोर और उसकी चकाचौंध से दूर ले जाता है।  

प्रेम गली अति साँकरी तामें दुई नया समाही – कबीर रास्ता भी जानते थे, उसकी मुश्किलें भी जानते थे और वो ये भी जानते थे कि उस संकरे रास्ते पर ‘दो’ चल ही नही सकते, अंदर बसे उस ‘दूसरे’ को पीछे छोड़ के ही जाना पड़ता है, अपने आप को खो कर ही ‘वो’ मिलता है। अमृता प्रीतम की कविता में समंदर के तूफान और संकरी गलियों का जिक्र आता है, जो मुश्किलों के बावजूद सच की खोज को अहम बताता है । 

आज बड़े रोज, ईसा को, उनके जन्म को याद करते हुए हम उसके घर तक पहुचने वाले ‘दूसरे’ रास्तों के बारे में भी सोचें और इंसान के बनाए उन सँकरे रास्तों के बारे में भी सोचें जिन रास्तों ने हमारे दिलों में एक दूसरे के लिए इतनी नफरत भर दी है कि हम मज़हब के नाम पर एक दूसरे को मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं । 

मजहबी घरों में जाने से पहले हम एक दूसरे के घर आ जा कर मिल बैठें और अगर प्यार बाटें तो यकीनन आपके, आपके और आप सब के घर का रास्ता ऊपर वाला खुद ही ढूंढ लेगा। उस प्रेम गली में रास्ते खुले होंगे जहां हम सब इकट्ठे चल सकेंगे । आप सब को Merry Christmas कहते हुए मेरी ये दिली कामना है की आने वाला साल आप सब के लिए प्यार के रास्ते बलन्द करे । 

राजेन्द्र, 24 दिसम्बर 2025 

Assembly of God Church, Rampur Garden, Bareilly
oplus_1048608