मास्टरानी आजकल रज़ाई में लेटे लेटे ही क्लास लेती हैं। पढ़ने और समझने में ये बड़ी बड़ी किताबें तो ब्लैक्बोर्ड से भी बढ़िया काम करती हैं, क्योंकि इन्हें माँ बिना चश्मे के पढ़ लेती हैं और इनमें बनी तस्वीरों में वो गहराई होती हैं, जो किसी आम कहानी में नहीं मिलती। अंतर्ध्यान हो और आँखें बंद रख कर ही पूरा पाठ का व्याख्यान कर दिया जाता है, जैसे माँ किसी अनकही दुनिया में चली गई हों। और अगर उनकी पसंदीदा एक्लेवय की किताबें हों तो कविताएं और जंगल से जुड़ी लोक कथाएं भी साथ में सुनने को मिल जाती हैं। उनके अपने बचपन से जुड़े कुछ किस्से इतने मजेदार होते हैं कि सब आँखें बंद कर खुद उस कहानी का हिस्सा बन जाते हैं। मुश्किल तो बस क्लास में आए मेरे या रजनी जैसे नए बच्चों की है जिन्हें बिना गलती किए भी एक ही पाठ को बार बार दोहराना पड़ता है और माँ इस सब का मज़ा लेती हैं। इस बार आई किताबों में ‘हाथी के बच्चे’ को माँ ने ‘गोल्डन बुक अवॉर्ड’ से नवाज़ा है। माँ पुरानी मास्टरानी रही हैं, जो अच्छी किताबों और शरारती शागिर्दों को दूर से पहचान लेती हैं । @Eklavya


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