रुद्रपुर जाती एक राकेट नुमा बस ने उस रोज़ हमारा काम तमाम कर दिया होता। भला हो उस रिक्शा वाले का जिसने अपने साथ हमें खींच कर बचा लिया वरना बरेली वालों को फूल ख़रीदने के पैसे और खर्च करने पड़ते । खैर, गलती थोड़ी हमारी भी थी हम जो आसमान की और देखते हुए इस “स्काईवॉक” नामक अजूबे को निहारने में मशगूल थे और ये सोच रहे थे कि इसके ऊपर पहुंचने का रास्ता कहां है। लगता है रुद्रपुर वाली बस के ड्राइवर ने उस दिन सूर्य पुत्र यम की ड्यूटी पर थे और उन्होंने कुछ ग़लत सुन लिया। आख़िर ऊपर पहुंच कर समझ आया कि तफ़रीह की जगह है। लगता है इसका नामकरण “स्काईवॉक” कुछ जल्दी में हो गया और शीशे की प्लेट लगवाने का बजट पास नहीं हुआ तो बस लोहा-लंगड़ और लकड़ी-वकड़ी से ही ठोक पीट के खुश कर दिया चौराहा अयूब खां को। प्रभात भाई (@Prabhat Singh) ने ठीक फ़रमाया स्मार्टसिटी का लोहा मनवाना था। पैर के नीचे ना सही आस-पास तो देख ही सकते हैं। कुछ भी कहो शहरियों की नज़र से दूर जवान लोग इसका खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। वैसे चौराहे पर पटेल कुछ अकेले पड़ गए हैं। <सिर्फ़ बरेली वालों के लिए>

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