ये तस्वीर होली के दिन की है । एक रात पहले उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। उस सुबह भी वो देर से ही उठीं । दोपहर हो चली थी और वक़्त निकला जा रहा था। हम तय नहीं कर पा रहे थे कि उन्हें जगायें या नहीं, रंग लगाएं या नहीं इतने में उनकी पोती चाँदनी ने आ कर माथे पर टीका सा लगा दिया। उन्हें उठा कर बिठाया गया तो भी आँखें बंद कर और सर को पीछे झुका कर माँ कुछ इस तरह से मग्न थीं जैसे शायद कभी अमीर खुसरो रहे होंगे, अपने पीर-ओ-मुरशिद हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया को याद करते हुए या फिर खुसरो समा मे रहे होंगे जब उन्होंने “आज रंग है ऐ माँ रंग है री” कव्वाली पहली बार अपने मुरशद के सामने गुनगुनाई होगी। उस रोज़ खुसरो ने खुद को और दुनिया को उस रूहानी रंग में रंगा हुआ देखा होगा जैसे तब मैं देख रहा था। माँ भी समा में ही थीं – दुनिया-जहान से बेसुध, बेखबर – ऐसी बेखबर कि उन्हें मेरी आवाज़ “आज रंग है री” भी नहीं सुनाई दी ।
“मैं पीर पायो निजामुद्दीन औलिया”, अमीर खुसरो ने रूहानी रंग से भरी ये कव्वाली भी अपने पीर को मिलने की खुशी में लिखी थी, इस होली को मैंने भी समझा कि शायद माँ भी उसे सुन कर खुश हो जाएँ सो मैंने भी गा दी। सूफी परंपराओं ये कवालियाँ निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर आज भी गाई जाती है। गुड़गाँव, होली, 4 मार्च 2026

