in the shutdown mode
life discovered an unsaved version
of a lusty dream.
This, that, and all between.
Whatever I thought was a verse
in the shutdown mode
life discovered an unsaved version
of a lusty dream.
पांचवें दिन गिर जाती हैं
गुलाब की पंखुड़ियां
सातवें दिन, गुलाबी प्रेम .
बस रंगीनियों और रंगों में कुछ फ़र्क़ होता है – वैसे
बसंत और संत (वलनतीन) एक जैसा ही लगता है
A poem is born of a peapod
pierced by a nail. The shell secretes tears.
An eye grows on crooked thumb
seeds go asunder slipping through fingers
a slimy worm wriggles in mind
a caterpillar is born of the pen
powdery syllables settle on wings
a butterfly mates with o’s and a’s
impregnating a rhyme.
1 June 2020
पीछे के बरामदे में बैठी पड़ोसन कपड़े मल रही है
पड़ोसन है या धोबन, कुछ पक्का नहीं
मल रही है या मसल रही है, ये भी कहना मुश्किल है
उसके बाजुओं की थिरकन और चेहरे से
कुछ अंदाज़ा भी तो नहीं होता, ख़ैर
उसे नहीं मालूम रसोई की खिड़की से उसे कोई देख रहा है
इधर चाय उबल रही है उधर उसकी मुठियों का कहर।
देवर की रंगीन कमीज़ का कालर सब झेल रहा है।
वो नीले साबुन की सफ़ेद झाग, देख रहे हो
उसके गोरे हाथों से रपट रहे वो बुलबुले
हिम्मत नहीं कर पाते गुलाबी गालों को चूमने की,
सब्र कर लेते हैं लाल सलवार से ढकी जांघो पर
कुछ सीने की गर्मी से खिंचे पिघल जाते हैं छातियों पर
और वो जो शोख छोटे कमबख्त हैं, देवर से
लाल कर देते हैं आंखों को, बिन सोई रातों सा।
अपने कंधे से भीगे चेहरे को पोंछती, वो झटक देती है
आंखों के सामने बार बार गिरती काली लट को
गुस्से में गर्दन झटकती पटक देती है पांव जब
काला चींटा सरक आता है अंगूठे में चमकते बिछुए पर
पसीने की धार पीठ को चीर देती है सनसनाती तलवार सी
पड़ोसन ही है, उसे एहसास है कोई देख रहा है
सहम जाती है दीवार पे बैठी चिड़िया सी।
खसम का कुर्ता पजामा, ससुर की पगड़ी और अंगोछा,
देवर की पेंट कमीज़, सास की साडी ब्लाउज और उधड़ा पेटीकोट
अपनी सलवार और दहेज की चुन्नी, रसोई के परने, और वो
रात की दागदार चादर, सब धुल चुके हैं।
जिस्म टूट चुका है
मन हल्का हो गया है
दीदे सूख चुके हैं
नल शायद रो रहा है
जिसे वी अपनी उंगलियों से सहला देती है
कपड़ों से भरी बाल्टी में उसकी मां का चेहरा मुझे भी दीख रहा है
पर सवाल बाबुल से है
क्या तूने इक धोबन ब्याही थी बापू ?
‘A Wounded Civilization’ walks past each day,
discarding dreams, abandoning a chimera
rejecting the city, its riches and the glitz,
sacrificing lives and livelihoods.
Stalked by fear, scared of the virus
starved skeletals walk unfazed
in quickening panic, slipping away
to die or survive, hunger or betrayal
on their land, among their own, their home.
From my terrace I watch
My own homelessness.
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