तुम क्यों रोते हो ?

तुम क्यों रोते हो बाबू ?
तुम्हारा कौन मरा ?
किसका सोग कैसा दुःख 
तुम्हारा तो कोई है ही नहीं
तो फिर ये प्रपंच क्यूँ ?

और फिर यहाँ क्यूँ ?
ये तुम्हारी ही नगरी है यमावतार  
भूल गए, ये क़ाशी है मरुथल नहीं 
यहाँ नहीं बुलाई जाती रुडलियाँ 
यहाँ आँसू नहीं बिकते

और फिर तुम? तुम क्यों रोते हो?
तुम तो धृष्ट अहंकारी हो 
अपराधी, गुनहग़ार, क़ातिल हो
हत्यारे पश्चाताप करते हैं 
माफ़ी मांगते हैं सज़ा काटते हैं
हत्यारे रोते नहीं। 

तुम छोड़ो ये नाटक
देश तो रो ही रहा है 

– रा 

एक रात डोज़ी के साथ 

Reading Muddupalani at night is not good for your sex life. Let us leave her out for another night (day?) and have some fun with the flame in vogue, Dozzee.   

एक रात डोज़ी के साथ 

“डोज़ी” नाम है एक मशीन का 
जैसे होता है “रोज़ी” किसी लड़की का 

सुना है इश्क़ हो जाए तो रातों की नींद उड़ जाती है 
लगता है “डोज़ी” उन्हीं आशिकों के लिए बनी है 
ये बताने को कि उनका इश्क़ मीटर कितना तेज़ चल रहा है 
उनका इश्क़ सच्चा, पाक और पक्का है कि नहीं   

“डोज़ी” को रात अपने बिस्तर पे ले जाने होता है 
जोरू प्रेमिका या माशूक़ा कि तरह 
ये सोच कर भी कितना सुकून मिलता है   

‘डियर डोज़ी कम टु बेड’ 

उसे बिस्तर पे सजाना होता है, अपने नीचे,     
बस इसके आगे कुछ नहीं सोचना, उफ़ 
“डोज़ी” को फिर लिटाना होता है     
बस, और कुछ नहीं सोचना
अंग जुड़े रहने चाहियें “डोज़ी” के संग
बस, और कुछ नहीं। 

रात भर आप रहते हैं “डोज़ी” के आगोश में 
बिलकुल जैसे सलीम और अनारकली थे मुग़ले-ऐ-आज़म में 
सुबह होते ही अनारकली, नहीं नहीं “डोज़ी” 
खोल देती है रात के राज़

नींद आई कि नहीं, कितनी देर सोये 
नींद कच्ची थी कि गहरी,
पुतलियां चल रहीं थीं क्या ?
सपने आये? नहीं नहीं शुक्र है अभी ये नहीं बताती 
सपने में किस-किस को देखा।

“डोज़ी” कमाल की महबूबा है 
कोविड के माहौल में वो अकेली है जो सोती है आप के साथ 
कितना ख़याल रखती है ना “डोज़ी”
और फिर कितनी जुड़ी है कितना प्रेम है आप के साथ
सुबह सवेरे एक पैगाम भेजती है, वो भी फ़ोन पर,
एक बार कह दो तो ईमेल भी कर देगी
हर रोज़ बेनाग़ा       

प्रिय, रात तुम चैन से सोये
तुम्हारी प्राणवायु ऑक्सीजन 97 रही
तुम्हारा रक्तचाप रहा 72
तुम तो ख़र्राटे भी नहीं लेते
कोई तनाव भी नहीं था तुम्हें
न थकान न ही दिल पे कोई बोझ       
नब्ज़ कुछ धीमी थी पर वो तो मेरी वजह से थी
मैंने हाथ जो थाम रखा था तुम्हारा, पर
तुम्हारी गर्म साँस, दिल की धड़कन बिलकुल मस्त थी

गज़ब हो तुम प्रिये,
तुम्हे स्वप्न भी मेरा ही आया ! क्यों न आए
इस डेट पे अठारह हज़ार जो खर्च हो गए
अब “डोज़ी” का हाथ थामा है
महँगा इश्क़ पाला है तो इतना—

इश्क़ हक़ीक़ी और इश्क़ मज़ाज़ी के बाद 
इश्क़ मशीनी भी हो चला है
“डोज़ी” नाम है एक मशीन का।

पर्दा

खिड़की पे तेरी गुलों का पर्दा क्यूँ 

बहार को भी चिलमन बना लिया तुमने ?

पहरा था गुलों का, पर्दा बहार का

खिड़की में तेरा अक्स हम ढूंढते रहे

मौन

अपने दिल का खालीपन मैं कमरे में छोड़ आता हूँ 

अब कमरा खालीपन से भर गया है

जैसे पहाड़ में गढे मौन से भरे होते हैं।