अपने-अपने इष्ट

घड़ी के हिसाब से भी दिन कभी का निकल चुका है सुबह हो चुकी है पर पिछ्ले 25 दिन की तरह सूर्य देवता आज भी नादारद हैं। दिन कब निकला था ये बताने वाले मुर्गे अब दूर-दूर तक बांग नहीं देते। अलार्म लगाना मना  है। घर के आस पास कोई मसीत या गुरुद्वारा भी नहीं है, एक साईं मंदिर है जहाँ कोई घंटाल नहीं बजाता और ना भजन ही गाता है। नगर कीर्तन तो या सम्राट अशोक के समय में होता था या लाहौर में। इतना गहरा कोहरा है कि मैं गली के दूसरे छोर को भी नहीं देख सकता। गली और मौसम दोनों उदास हैं। ऐसे उदास मौसम में अख़्तरी बाई और उनकी गाई ठुमरियां बहुत सताती हैं। ‘ऐ सर्द हवाओ उन्हें ले आओ’

घर के गेट के बाहर खड़ा मैं सोच रहा हूँ किधर को निकलूं। तभी एक मरियल सी काले-सफ़ेद चक्कतों वाली गाय का सर सफ़ेद धुंए को सूतता दीखता है। उसकी तो मजबूरी ठहरी पर वो गाय मुझे देख के हैरान होगी कि इस ठंड और कोहरे में मैं बाहर क्या कर रहा हूँ। सूखी नाली के साथ साथ चलते वो खाने की तलाश में इधर उधर सूंघ रही है। गली के तीन आवारा कुत्ते मेहरा साहेब के गेट से सट्टे जाड़े से अपने आप को बचा रहे हैं। पुराना सा स्कूटर चलाते एक बुज़ुर्ग गली से धीरे धीरे निकल जाते हैं। मंकी कैप (बन्दर टोपी) के ऊपर पहनी हेलमेट की वजह से मैं पहचान नहीं पाता कि वो कौन हैं। मुझे क्या पड़ी कोई आये या जाये बस सूरज निकल आये तो बात बने। सर्दी में तो कीड़े मकौड़े भी नहीं दिखते। स्थाई के बाद ठुमरी का पहला अंतरा ही याद नहीं आ रहा।

सन 2024 की फ़रवरी आ गयी है पर धुंध कहो या कोहरा कम होने का नाम ही नहीं ले रहा। दो दिन हलकी बरसात भी हो चुकी फिर भी ये सफेदी बरकरार है। अब तक तो बसंत का पीला दिखना चाहिए था। असल में ये कोहरा भी मिलावटी है, इसमें बादल कम प्रदूषण ज़्यादा है। कहते हैं राम राज्य आ गया है शायद कोहरे के चलते दिख नहीं रहा।

भीगे पंखों में दुबके कबूतर बिजली की तारों पे बुत बने बैठे हैं न गर्दन हिल्ला रहे हैं ना आँखें, कहीं सर्दी में जम तो नहीं गए। देसी तीतरों का छोटा झुण्ड रोता और कराहता हुआ ऊपर से कहीं निकल जाता है जिसे मैं गर्दन टेढ़ी कर के भी देख नहीं पाता। सामने वालों के घर के बाहर लगे चीड़ के पेड़ की नुकीली सूईयों में कोहरे के टुकड़े अटक कर फंस गए हैं, ऊपर का पेड़ सफ़ेद और नीचे का हरा दिख रहा है। घरों की चारदीवारियों पे लगे पथरों से बूँद बूँद ओस टपक रही है जिसकी कोई आवाज़ नहीं आती। मामू होते तो कहते बिलकुल फैज़ाबाद जैसा लग रहा है। फिर फ़ैज़ाबादी !

किसी के घर में काम करने वाली एक बाई सामने की तरफ से तेज़ी-तेज़ी चल कर जा रही है। उसने अपने चेहरे को शॉल से ढक रखा है और अंदर कहीं चिपके मोबाइल से वो ज़ोर ज़ोर से किसी से बांग्ला में बाते कर रही है।  वो मुझे देखती भी नहीं और कुत्तों से बचती हुई तेज़ी से आगे बढ़ जाती है क्या पता नींद में ही चल रही हो, पापी पेट के लिए। इंसानी जिस्म के कई हिस्से पापी ही होते हैं या पाप करने के लिए ही बनाये गए थे। ‘कैसे कटें दिन रतियाँ ’।

मैं अभी भी खड़ा सोच ही रहा हूँ। हाथ जैकेट की जेब से बाहर निकाल में मुठियाँ घुमा कर कसरत का ढ़ोंग कर रहा हूँ। सामने सिर्फ गली के तीन-चार माकन दिख रहे हैं आलस में पस्त। पड़ोसियों के पेड़ पे दो गिलहरियाँ  पकड़म-पकड़ाई खेल रही हैं और उनकी कुतिया, जिसका नाम बिजली है, उन्हें झपटने की नाकाम कोशिश करती ज़ोर ज़ोर से भौंक रही है। बिजली के मुँह से भाप नुमा बादल निकल रहे हैं। गिलहरियों के मज़े हैं मैं  सोचता हूँ, इनकी खाल ही ऐसी है कि इन्हे कोट पहनने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती। ‘ऐ सर्द हवाओ’ – बेग़म  अख़्तर बुला रहीं हैं।

दो और काम करने वाली औरतें आती दिख रहीं है। हमारे पड़ोस के सभी घरों में सब लोग सो रहे होंगे मैं सोचता हूँ , किसी घर में भी तो बत्ती नहीं जल रही, ये औरतें शायद दूसरी लाइन में जा रहीं हैं। आख़िर मैं बाएँ हाथ को मुड़ कर चल देता हूँ। कोहरे में अपने कुत्ते को सैर कराते सामने से बंसल साहेब नमूदार होते हैं। कीचड़ और गली में रुके हुए पानी के जोहड़ों से बचता हुआ बंसल जी को दुआ-सलाम कर में आगे बढ़ जाता हूँ। पता नहीं क्यूँ ज़्यादा दूर जाने का और चलने का मन नहीं हो रहा पर करूँ भी क्या अभी आठ भी नहीं बजे, चाय बनने और पीने में तो अभी आधा घंटा है। ऊपर देखता हूँ , बादल घिरे हुए हैं शायद फिर बरसेगा। पर अभी बरसने के कोई आसार नहीं हैं। ‘तबियत इन दिनों बेगाना-ऐ-गम होती जाती है’

पार्क तक पहुँच गया हूँ – अंदर कोई नहीं है। सैर करने और चलने वाले ट्रैक पर जगह-जगह पानी जमा है, मैं बाहर ही सड़क पर टहलता आगे निकल जाता हूँ। दूर पार्क के कोने पे कोई है। धुंध में अंदाज़ नहीं हो रहा के कौन है। मैं अपनी चाल धीमी कर देता हूँ। वो पीपल का घना पेड़ है जो V 9 गली के मोड़ पे है उसकी कुछ शाखाएं नीचे को झुक आयीं हैं। उसी पेड़ के पीछे ही है कोई। पास में ही किसी ने दो साल पहले एक चौकर चबूतरा बनवा दिया था उस पर लोग पंछियों के लिए दाना छोड़ जाते हैं। अच्छी बात है पर कबूतर बहुत गंद फैलते हैं। इस सब चक्कर में बेगम से ध्यान हट रहा है।

एक महिला अचानक पीपल के चौड़े तने के पीछे से प्रकट होती हैं उनके हाथ में एक थैला है। उस थैले में से वो मिट्टी की रंग-बिरंगी मूर्तियां एक-एक कर के निकलती हैं और चबूतरे पे प्यार से सजा देती हैं। एक मूर्ति लुढ़क जाती है जिसे वो उठा कर तने के सहारे खड़ा कर देतीं हैं। मैं देख नहीं पा रहा हूँ कि मूर्तियां किन की हैं। फिर वो प्लास्टिक की थैली से दाना निकाल चबूतरे पे फ़ैला देती है। उनसे आँखे बचाता मैं सड़क के दूसरी तरफ टहल लेता हूँ। बड़ी कोशिश करता हूँ उधर न देखूं और कहीं मेरी आँख महिला से न मिल जाये। नहीं नहीं ये बेग़म अख़्तर कैसे हो सकतीं हैं। 

मैं सर झटकता हूँ वो महिला फिर थैले मैं हाथ डालती है और इस बार लाल रंग की एक चुन्नी निकलती है। मैं जानता हूँ सुनहरी गोटे के बॉर्डर वाली ये चुनरी देवी को पहनाई जाती है। महिला पेड़ की छल का मुआयना करती है और एक मुनासिब जगह देख चुन्नी को उस पर लटका देती है। फिर उसे हाथ लगा उसका आशीर्वाद लेती है।  इतनी देर नीचे झुकने से उसकी पीठ दर्द हो रही होगी वो अपनी पीठ को दोनों हाथों से पकड़ अब चुन्नी को निहार रही है। सामने पड़ी सब मूर्तियां अब मैं साफ़ साफ़ देख सकता हूँ। मैं आँखें नीची कर पेड़ को पार कर लेता हूँ पर जनता हूँ कि महिला मुझे देख रही है। मन ही मन मूर्तियों की गिनती कर मैं उन सब देवताओं के नाम दोहरा रहा हूँ। शिव, पार्वती, गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती, राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान। कौन नहीं जानता इन सब को। मन ही मन नमस्कार भी करता हूँ और अचानक मायूस महसूस करता हूँ। कुछ दिन पहले तक इनकी पूजा अर्चना होती होगी। अब शायद नई मूर्तियां आ गयीं होंगी या फिलहाल कोई त्यौहार नहीं होगा जब इन्हे पूजा जाना हो। हर काम वक़्त-ज़रुरत से ही तो होता है फिर वो चाहे भगवान का ही क्यों न हों।  

वो महिला उन सब को चबूतरे पे छोड़ कोहरे में कहीं गुम हो चुकी हैं। मैं पलट कर वापिस घर का रास्ता लेता हूँ इस बार हर मूर्ती को गौर से देखता हूँ । चटकीले रंगों में बनी और सलमा सितारों से सजी ये मूर्तियां बच्चों के खिलौनों जैसे ही लगती हैं। अनायास गुनगुनाता हूँ ‘वो जो हम में तुम में करार था’। उफ़्फ़, ठंडी सांस लेने से कुछ न होगा न ही इस बारे में सोचने से।

दाना खाने कोई पक्षी आया नहीं है। पेड़ की जड़ पे किसी ने सिन्दूर भी लगाया है। चूहे या गिलहरी का कुतरा बर्फी का एक टुकड़ा पत्ते के नीचे से झांक रहा है। आखिर हर मूर्ती, हर देव, हर भगवान् को इसी बैठक मैं आना होता है, यहीं पीपल के नीचे इन सब का जमघट्टा होता है। यहीं मिल जाता है भोजन और जल। यहीं भक्त भी आ कर मिल जाते हैं और फिर यहीं बन जाता हैं एक नया शिवालय। घर के पास, ‘अब दूर वाले मंदिर जाना नहीं पड़ेगा’

आखिर सब यहाँ पहुँच जाते हैं या पहुंचा दिए जाते हैं। वो ईश्वर जो की सब कुछ देख रहा है उसी के डर से इंसान, जो इन मूर्तियाँ को फेंक भी नहीं सकता, इन्हे यहाँ ले आता है या ले जाता है किसी नदी और तालाब में बहाने को । पीपल, नदियां, समंदर शायद सब भगवानों का कलेक्टिव घर हैं। यकीन मानिये – न पीपल को न ही यहाँ विराजमान किसी प्रतिमा और भगवान को कोई आपत्ति होगी अगर आप बुद्ध, तीर्थांकर या बाबा नानक की तस्वीर, सलीब पे चढ़े इसु, अल्लाह का कोई फरिश्ता या यहूदी बाबा को यहां छोड़ जाते हैं । ये सब, बिना एक दूसरे को परेशान किये, यही इकठ्ठे रहेंगे बिना किसी नफरत या झगड़े के, दोस्तों जैसे। ‘हमरी अटरिया पे आजा ओ साँवरिया’, हम सब की तरफ से बेग़म इन्हे फ़रियाद कर रही हैं। 

बाज़ रोज़ कोहरा या धुंध बहुत कुछ छुपा लेता है हमेशा के लिए और सर्दी तो बहुत ज़ालिमाना तरीके से बदला लेती है ख़ासकर दिल के मरीजों से । घर पहुँचते ही बुरी ख़बर मिलती है। एक और दोस्त चल बसा। कोहली साहेब नहीं रहे। 1 फरवरी सुबह 4  बजे दिल के दौरे से गुज़र गए। ‘मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे’, अख़्तरी बाई को ख़बर पहले ही पहुँच चुकी थी कि उनका चाहने वाला रुख़सत हो चुका है।

अगर हम लोग अपने दोस्तों की यादों को, उनकी तस्वीरों को अपने दिल से लगा के रख सकते हैं तो ये लोग अपने इष्ट को क्यों पीपल के नीचे क्यूँ छोड़ आते हैं ?

Finally they all congregate under a peepul tree

Love the rains

On a wet rainy morning the terrace gets a lively layer of sheen which doesn’t show even after the best of wash and the reflections appear far more enticing than the furniture. The bird-bath, these days lies upside down; who wants a bath in these cold foggy days. Sparrows, mynahs, parrots, pigeons, and crows are smarter. (1 February 2024)

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