Sun God and Mother Earth

A new artwork that we recently acquired is titled “Sun God and Mother Earth”. It is done by eminent Gond tribal artist Mr Veerendra Kumar Dhurvey, based in Bhopal, Madhya Pradesh. The story behind the artwork is mentioned below as given by the artist. The details are: Acrylic paints on canvas, 2024. Size 36 x 48 inch.

There was only water in this world, there was no earth, at that time Mother of the world is sitting on a lotus, on her the form of a deer has been given, Mother Earth is Mother Earth, on which Gond farmers are plowing and tribal villages are celebrating the festival of greenery. Women and men are dancing and celebrating festivals.
And there is a man on the tail of a deer, he is plowing, he is sowing seeds there and there is the Sun God who is coming on his chariot with seven horses and the trees are the whole world. Just as the whole world looks beautiful in the light of the Sun God, I have given the form of the world on my body on the basis of that.

​​पृथ्वी नहीं इस संसार में जल ही जल था वह समय जगत जननी मा कमल पे बैठी है उसके ऊपर हिरण का रूप जो दिया है माता पृथ्वी धरती मां है जिसके ऊपर गोंड किसान हल चल रहा है और हरियाली के त्यौहार मनाते हुए आदिवासी गांव ​की महिलाएं और पुरुष नाचते और त्यौहार मना रहे हैं। और जो ये हिरण की पूंछ पर एक आदमी है ​वह हल चल रहा है वहां पर वे बीज डालते जा रहे हैं और सूर्य देवता हैं जो अपने सात घोड़ों वाले रथ पर चले आ रहे हैं और पेड़ जो हैं वो सारा संसार ​हैं। ​जैसे सारा संसार सुंदर लगता है सूर्य देवता के प्रकाश में उसके आधार पर ही संसार का रूप ही मैं देह पर दिया हूं।

​Prithvi nahin is sansar mein jal hi jal tha use samay Ma Jagat-Janani hai jo Kamal per baithi Hain uske upar Hiran ka roop Jo Diya hun Mata Prithvi Dharti Ma hai jiske upar Gond Kisan hal chala raha hai aur hariyali ke tyohar manate hue aadivasi gond mahilayen aur purush naachte aur tyohar Mana rahe hain aur jo yah Hiran ke Poonch per ek aadami hai Kisan hal chala raha hai vahan per vah bij dalte ja raha hai aur Surya Devta Hain Jo Apne sath ghode Wale Rath per chal rahe hain aur ped jo hai vah sansar hai Jaise Sara sansar Sundar lagta hai Surya ke Prakash mein uske Aadhar per hi sansar ka roop main is ped per Diya hun

Prithvi Nahi Jal hi Jal Tha. Veerendra Kumar Dhurvey

निंदिया के उड़न खटोले में

​नींद भी क्या नेमत है जिसके लिए दुनिया में करोड़ों लोग तरसते हैं, लाखों लोग इलाज करवा दवाइयाँ खाते हैं और जाने कितने हज़ारों रात रात भर बिस्तर पर सर पटकते थक जाते हैं पर सो नहीं पाते। और फिर मिथकों में कुम्भकरण जैसे भी हैं जो ब्रह्मा के श्राप से छह महीनों तक गहरी नीदं में रहते थे। या फिर यूरोपीय मिथक में सम्राट स्टेफेन और रानी लिआ: की बेटी अरोरा, जो स्लीपिंग ब्यूटी नामक कहानी से जानी जाती है, उन्हें भी श्राप था की वो सौ बरस तक सोती ही रहेंगी। ऐसा क्यों है के जहाँ कुछ लोग बिलकुल सो नहीं पाते वहाँ कुछ लोग लम्बी तान के दिनों-दिन सो सकते हैं। कौन हैं ऐसे नसीबवर जिन्हे निंदिया के उड़न खटोले का अपार आनंद मिलता है।
माँ को ये उड़न खटोला और निंदिया का ख़जाना मिल गया है। माँ अब ज्यादा समय सोती है, दिन हो या रात। कोई ख़ुमारी नहीं, ना ही तबियत में कोई बदलाव है पर फिर भी नींद उन्हें घेरे रहती है। आँखें भारी, गला रुँधा, आवाज़ दबी, बीच बीच में उबासी और निद्राग्रस्त आलस । वज़ह शायद मौसम हो सकता है, जो बदल रहा है। बाहर हवा ठंडी हो चली है, दिन छोटे हो गए हैं, अँधेरा जल्दी हो जाता है पर इस सब का माँ की नींद से क्या रिश्ता है मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। पहले तो दिन के वक़्त कभी किताब पढ़ लेती थीं, कभी भजन गुनगुना लेती थीं या फिर अपने भाई या बहनों से फ़ोन पे बात कर लेती थीं पर अब वो भी नहीं होता। यहां तक ​​कि जब शाम के वक़्त टीवी चालू भी होता है तब भी वो ऊँघ रही होती हैं, जब कि हम एक ही कमरे में बैठे होते हैं तब भी वह आंखें बंद कर लेती है और सो जाती है। डॉक्टर बताते हैं कि इसका कारण कोई बिमारी या दवाइयाँ तो नहीं है क्यूंकि उनकी सेहत अब पहले से कहीं बेहतर है।
क्यूंकि माँ बिना मदद के चल नहीं पाती और सीढ़ियां नहीं चढ़-उतर पाती तो उनका घर के बाहर आना जाना भी काफी आरसे से मुमकिन नहीं हुआ। बीच बीच में हम लोगो उन्हें जबरदस्ती से बाहर आँगन में ला कर धूप में बिठला देते हैं पर जैसे ही सूर्य महाशय जगह बदलते हैं और गर्माहट कम होती है तो माँ भी वहां से खिसक लेती हैं। पिछले बरस तक धूप में बैठ कर मूली, मूंगफली, बेर और गुड़ मज़े से खाती थीं अब उस सब का शौक़ भी नहीं रहा। दोपहर को बस खाना खाने के लिए उठती भर हैं और फिर से बिस्तर। वो दुबला शरीर रज़ाई का वज़न भी कैसे सहता होगा ?
सर्दियाँ शुरू हो गई हैं इसलिए वह सुबह देर तक बिस्तर पर रहती है, देर से उठती है और 9.30 बजे तक ही चाय पीने को कमरे से बाहर आती हैं। जिसके बाद वह फिर से बिस्तर पर लेट, रज़ाई लपेट और आंखें बंद करके सो जाती है। मैं सोचता हूँ इतनी देर कोई कैसे सो सकता है पर शायद इस उम्र में ऐसे ही होता होगा। दो-एक घंटे बाद नहाने के लिए तभी जाती है अगर उनका मन होता है। ज्यादातर वो अलसाई सी रहती हैं। पिछले हफ्ते वह पांच दिन बाद नहाई थी। इसके बाद स्वेटर पहना कर उन्हें शॉल ओढ़ा दी जाती है। अभी टोपी नहीं निकली है तो शाल से ही सर को ढक लेती हैं। नहाने के बाद चाय का एक दौर ऐसा चलता है जिसमे चाय पीते पीते वो झपकी ले रही होती हैं और हमे डर लगता है कि चाय की कटोरी समेत झुक कर वो मेज़ से ना टकरा जाएँ।
​मां की बिगड़ती सेहत के चलते एक अरसे से घर की हर छोटी बड़ी बात उनके चारों ओर घूमती है, वो धुर्री हैं हम सब फ़िरकी। मसलन सुबह की चाय तब बनेगी जब माँ उठेंगी, नाश्ता तब बनेगा या परोस जाएगा जब माँ हाथ-मुंह धो कर ताजा तैयार हो जाएँगी, दोपहर का खाना तब टेबल पर लगेगा जब उनका मन होगा, जो कि कभी-कभी शाम चार बजे तक टल जाता है। शाम की चाय, टीवी का चैनल, दरवाज़ा बंद रहेगा या खुला, पंखा धीमे या तेज़, परदे खुले रहेंगे या ढके, कब कोई बाहर जा सकता है और कहाँ, वग़ैरह वग़ैरह सब माँ के हिसाब से चलता है। अगर वो सो रही हों तो आजकल उनके कमरे के अंदर और बाहर डाइनिंग रूम में साफ सफाई नहीं की जाती, रसोई में बर्तन धोने के लिए दरवाजा बंद कर दिए जाते हैं – मिक्सर ग्राइंडर नहीं चलाया जाता, किसी भी तरह से कोई शोर नहीं हो सकता या तेज आवाज में बोला नहीं जाता, सिर्फ इसलिए कि कहीं माँ की नींद में ख़लल ना पड़े।
हम उनके कमरे का दरवाजा बंद नहीं कर सकते, इससे वो नाराज़ हो जाती हैं। अगर दरवाज़ा सरका कर आप अंदर झाँक लें और वो जाग रही हों तो पूछ लेती हैं, “क्या चाहिए?” उनके कमरे के बाहर कुछ हलचल हो तो वो पूछती हैं, “कौन है?”। आजकल ये दो हर्फ़ उनका तकिया कलाम हैं। ‘कौन है’ का उन्हें पूरा और साफ जवाब चाहिए होता है, कुछ भी कह कर आप उन्हें टाल नहीं सकते। वो शख़्स कौन है, उसका नाम क्या है वो बाहर क्या कर रहा है, घर में क्यों आया है – ये सब उन्हें तफ़सील से जानना होता है। फ़िर उसके बाद वो ही, उनकी प्यारी निंदिया का उड़न खटोला निकल पड़ता है।
कुछ दिन पहले देर रात अपने बिस्तर के दूसरी तरफ इशारा करते हुए माँ ने पूछा, “यहां किस ने सोना है?” रजनी ने जवाब में पूछ लिया “पर क्यों?” अब उनका जवाब सुनिए, “पता होना चाहिए ना कि यहां कौन सो रहा है, ताकि उस हिसाब से हम अपना मूड बनाएं।” इसका क्या जवाब देगा कोई। कल उनकी बड़ी बहन सरला का फ़ोन आया सो मैंने मासी को बताया कि माँ सो रही हैं, फिर भी मैंने माँ को उठा दिया और कहा कि वो बात कर लें । अब अपनी बड़ी बहन से उनका जो वार्तालाप हुआ आप ही सुन लीजिये।
“अगर सोऊँ नहीं तो और मैं क्या करूं?
क्यूँ दिन भर बैठूं?
मैंने किसी का कोई कर्ज देना है क्या?
क्यूँ राम-राम बोलूं, वो राम क्या देगा मुझे?
उसके बिना भी अच्छी मौत आएगी मुझे, हाँ ।
नहीं, मुझे नहीं पढ़ना कुछ, होर की। रामायण, भागवत सब पढ़ लिया है, कई बार, कुझ खास नहीं मिला मुझे उनमे ।”
दूसरी तरफ से क्या सवाल हो रहे होंगे इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं। आराम-तलबी हो तो ऐसी हो जो सब से बेपरवाह हो, भाई, बहन, बेटा, बहु या फिर किताबों के भगवान ही क्यों न हों । मुझे याद आ रहा है: किस किस को याद कीजिये किस किस को रोइये, आराम बड़ी चीज़ है मुँह ढक के सोईये
वैसे आराम-तलबी से बढ़िया हो भी क्या सकता है। तनाव को ख़ारिज करने की सबसे बढ़िया दवा है आराम। बीच बीच में उनकी नींद के बारे में सोच मुझे रश्क़ भी होता है, क़ाश मैं भी इतनी मस्ती में सो सकता, दिन भर नहीं तो दो चार घंटे ही सही। ये कमबख़्त काम कोई और कर ले, मुझे छुटी मिले, में भी पहाड़ पे जा किसी बुगियाल की नरम घास पे वो गुलज़ार साहेब वाली “पीली धूप” में सो सकूँ, शायद मुझे भी उसके छपाक से गिरने की आवाज़ सुनाई दे जाए।
माँ अध-सोइ अध-जगी आँखों से बातें भी कर लेती हैं, सपने भी देख लेती हैं और बवक़्त लाहौर में अपने बचपन के घर भी घूम आती हैं। दोस्तों से मिल आती हैं, “कोकिला छपाकि जुम्मे रात आई जे” खेल आती हैं, अपनी नानी से झंग जा कर मिल भी आती हैं। पिछले दिनों अपनी छोटी बहन रानी से नींद में बाते करतें कह रहीं थी “आजकल मैं लाहौर आयी हुई हूँ।” ये सुनकर मैं तो कुर्सी से गिरने वाला था। लेटे हुए अगर उनकी गर्दन दाईं तरफ़ घूमी हो तो अपने कमरे के बाहर आने-जाने वाले दो बाशिंदो पे नज़र रखे होती हैं और अगर वो ही गर्दन बायीं तरफ़ हो तो सामने लगी सुब्रोतो मंडल की पेंटिंग से सीक्रेट गुफ्तगू कर रही होती हैं।
सुब्रोतो मंडल की वो पेंटिंग एक जवां शख्स का पोर्ट्रेट है, कुछ कुछ चरवाहा, भैंस चराने वाला, ग्वाला, घुमक्कड़ सा, साँवला, गबरू। उसके बायें हाथ में लम्बी सी बांसुरी है और उसी हाथ की कलाई में ताम्बे का कंगन झूल रहा है। रंगीन सा दिखने वाले जंगल में वो एक पेड़ के साथ सटा खड़ा है, उसके सर पे सावे रंग का साफ़ा बंधा है जिस से काले, घुंघराले बालों की दो लटें सांप सी बल खा रही हैं, कन्धों से लटका हल्दी से पीले रंग का अंगोछा उसके सामने झूल रहा है। डिबिया नुमा एक तावीज़ उसके गले में लटका है और दूसरा उसके दाहिने बाजू पे बंधा है। उसके माथे पे छोटा सा काला टीका है लगता है उसकी माँ ने सुबह ही उसकी नज़र उतारी होगी। उसका बदन नीला है और गज़ब नशीली आँखें हैं। आर्टिस्ट ने उस पेंटिंग का टाइटल “कृष्ण” दिया था। मैंने जब उसे पहली बार देखा था तो मुझे उसमे सिर्फ और सिर्फ राँझा दिखा था। वारिस शाह का राँझा, तख़्त हज़ारे का राँझा। पेंटिंग के उस नज़ारे को देख कुछ ऐसा महसूस हुआ था की वहीँ कहीं पेड़ों के झुरमट के परे चनाब दरया का किनारा होगा जिसके परे रांझे की हीर मिट्टी का घड़ा पकडे उसे मिलने का इंतज़ार कर रही होगी।
ख़रीदने के बाद मेरे लिए वो पेंटिंग रांझा हो गयी थी और मैं उसे देख वारिस शाह को याद करता, उस प्रेम कहानी को दोहरा भैरवी में हीर के कुछ टुकड़े गुनगुना लेता था। इस बात पर माँ और मैं कई बार बहस कर चुके हैं पर उन्हें उसमे अपना बांसुरी वाला कृष्ण-कन्हैया ही दिखता है चाहे उसके सर पे मोर पंख हो या न हो । शायद नींद में माँ अपने कृष्ण की बांसुरी भी सुन लेती हों तभी मंत्र मुग्ध हो सोती रहती हैं।
माँ के कृष्ण माखन चोर बाल गोपाल से ले कर वृन्दावन के कुंज विहारी और गोपियों के रास रचैया तक आ कर रुक जाते हैं। इसके बाद के कृष्ण से माँ का कोई वास्ता नहीं है। महाभारत के कृष्ण जो ‘यदा यदा ही धर्मस्या’ का उपदेश देते हैं वो माँ के लिए कभी नहीं थे, वो युद्ध, वो मार काट और कृष्ण का पक्षपात माँ के मिथक का हिस्सा नहीं हैं। माँ ने धर्म की बहुत सी लड़ाइयां देखी हैं, धर्म को उन्मादियों के हाथ जीतते और धर्म को इंसान के हाथ हारते हुए भी देखा है। धर्म के नाम पर दंगे, आगज़नी, हिंसा, मार-काट और बटवारें उनके बचपन से माँ के साथ रहे हैं। तक़सीम की उन यादों और भयावय तस्वीरों से निजात पा लेना उनके लिए नामुमकिन था। इसी कारण हँसते-खेलते, रास करते, बांसुरी बजाते कृष्ण ही उनके इष्ट रहे।
पहले माँ मुँह ढक के सोती थीं, रज़ाई या चादर पूरे चेहरे को अंदर समेटे, जाने सांस कैसे लेती थीं। पर अब, अब ऐसा नहीं करती सर्दी में भी रज़ाई ठुड्डी से नीचे ही रहती है। बाजु अंदर, होंठ हल्के से खुले, पीछे को खींचे सिमटे बाल, कंधे समतल और वो बिलकुल सीधी लेटती। मेरी तरह दायें, बाएं, या पेट के बल नहीं। रात भर हिलती भी नहीं हैं। हर रोज़ नहीं पर कभी कभी खर्राटे भी लेती हैं, ज़ोर से । उनके कमरे में लगा कैमरा बताता है की रात में एक दो बार उठती हैं और अपनी नन्हीं सी प्लास्टिक की बोतल से पानी पी कर फिर सो जाती हैं।
पहले उनकी नींद बहुत कच्ची थी ‘ज़रा से आहट’ वाली, चौकन्नी। मैंने कई बार सोचा ऐसे कैसे पूरी होती होगी इनकी नींद। सुबह भी छह बजे उठ खड़ी होती थीं, हाँ पिछले दस बारह सालों में दोपहर को झपकी ले लेती थीं, “खाना-खाने के बाद मुझे अक़्सर नींद आ जाती है”, ऐसा कह वो अपनी झेंप छुपा लेती हैं।
कच्ची रही हो या पक्की दिन की हो या रात की, माँ को नींद तो प्यारी थी, हमेशा। हमारी तरह वो देर रात तक जाग नहीं सकती थीं, ना अब ना पहले। हमारे बचपन में भी सोये बिना उनका गुज़र नहीं था। घर भर का सार काम, बच्चों की देख भाल और उनके लफड़े, बिरादरी और रिश्तेदारों से निपटना और तंगहाली में घर चलाने आदि से माँ थक तो जाती ही होंगी।और फिर वो ज़िन्दगी ही क्या कि इंसान चैन से सो भी ना सके। साइंसदाँ बताते हैं कि जब हम सो रहे होते हैं और गहरी नींद में होते हैं तब हॉर्मोन हमारे शरीर को दुरुस्त करते हैं और हमारे जिस्म में नई ऊर्जा भर देते हैं जिसके बाद उठने पर हमे ताज़गी और ख़ुशी महसूस होती है। दिमाग़ी कश-मक़श से परे नींद तनाव को सोख लेती है।
इस खोज का लुब्ब-ए-लुबाब ये है कि एक रात की नींद पूरी कर लेने पर इंसान सुबह खा पी कर फिर से सोने की तैयारी कर सकता है। “मैं सोती हूँ तो इसमें हर्ज़ा क्या है, हैं?” माँ पूछती है।
“तुम लोग परेशान क्यूँ होते हो?” कहते कहते फिर से वो निंदिया के उड़न खटोले में परवाज़ ले लेती है। मुझे कुंदन लाल सहगल की गाई लोरी याद आती है ‘सो जा राजकुमारी सो……जा’

12 दिसंबर 2024

Ma in her bed, in her room with attendant Rashmi
Ma, as the winter of 2024 approaches

Sitaram Yechury

Sitaram Yechury passed away this morning (12 September 2024) around 11.30 at AIIMS. He had been unwell with a lung infection for the past three weeks admitted in the hospital. Our last meeting was at Sahmat, probably on 18 August. All of us had lunch together and then he stepped out for a smoke with Sohail and NK Sharma. His right hand was not steady and it trembled as he took a drag on his stick. He coughed non-stop. Something in me said, he must stop smoking. We had a good time together on Seema’s birthday sometime in Jan this year, again at Sahmat. I have some pictures of them cutting cake and offering it to each other. I recall how unsure or hesitant he was to sign a copy of his book for me for which I had designed the cover. All he wrote was “Greetings”. It was a compilation of his speeches as a Rajya Sabha MP. On 14th Sept his body was brought on a carriage to AKG Bhavan, the Party office, for friends and Comrades to pay their last respects. Sitaram had donated his body to All India Institute of Medical Sciences for research. So Long Comrade. 

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आपका दिल किस पारो पे लुटा था ?

शरत चंद्र चटोपाध्याय के लिखे बांग्ला उपन्यास “देबदास” (1917) में पारो के क़िरदार का असली नाम पार्वती है। ये वो पार्वती है जिसका प्यार परवान न चढ़ सका, उन चंद लम्हों के लिए भी नही जब देवदास उसके घर के बाहर आख़िरी साँसे गिन रहा था। प्रेम और विरह के दर्द की अद्भुत कहानी तीन किरदारों की है – देवदास, उसके बचपन की दोस्त पारो यानि पार्वती और पेशे से तवायफ चंद्रमुखी की। देवदास के अज़ीम किरदार और इस कहानी पर तीन बार हिंदी फिल्म चुकी हैं। हालांकि पार्वती या पारो और चंद्रमुखी के क़िरदार भी कुछ कम नहीं हैं फिर भी फ़िल्म बनाने वालों ने हर बार पुरुष प्रधान फिल्म ही बनाई। इसके बावज़ूद फिल्म देख कर जब आप थिएटर से बाहर आतें हैं तो चंद्रमुखी या पारो के बारे में ही बात करते हैं, देवदास हर पल अपने को मौत की तरफ़ धकेलता है और मर चुका होता है । “कौन कम्बख़्त है जो बर्दाश्त करने के लिए पीता है , मैं तो पीता हूँ के बस साँस ले सकूँ “। फिल्म पहली बार 1936 में कुंदन लाल सहगल के साथ, दूसरी बार 1955 में दिलीप कुमार वाली और 2002 में शाह रुख़ ख़ान के साथ बनी । उपन्यास को आये 107 साल और आख़िरी देवदास फिल्म को आये 22 साल हो चुके हैं फिर भी कुछ ऐसा है इस कहानी में कि हम इसे भूलना नहीं चाहते। इश्क़ की टीस और इस बुझते अलाव में चिंगारियों को ज़िंदा रखना चाहते हैं। तीनों फिल्मों के मुख्य पुरुष अभिनेता या फ़नकार ट्रेजेडी किंग माने जाते हैं फिर भी पार्वती या पारो की ट्रेजेडी फिल्म की ट्रेजेडी है। 

आपका दिल किस पारो पे लुटा था ? 

एक पारो और है। इस पारो की ट्रेजेडी भी शरत चंद्र की पारो  से कम नही। अदब या साहित्य की दूसरी पारो। नमिता गोखले के अंग्रेज़ी नॉवेल ‘पारो’ वाली पारो। नमिता जी ने अपनी पारो के क़िरदार को पार्वती की लाग लपेट से दूर रखा। ये पारो 80 के दशक की दिल्ली से है, शरत चंद्र के भद्र लोक से दूर। इस पारो को अवतरित हुए भी 40 बरस हो चुके हैं। पहली बार ये क़िताब 1984 में छपी थी और तब से लगातार बिक रही है । इस पारो को मैं कल दोबारा मिला। 

21वीं  सदी के माहौल में पारो ने एक और उत्तेजक अंगड़ाई ले कर ढ़ीली चड्डी वाले दिल्ली के मर्दों की फिर से आज़माइश करने की ठानी है। कहीं रूमानी, कहीं आशिक़ाना और कहीं कामुकता के हर परदे को उठाती पारो ऊपरी सतह पर तैरती समाज की हर असलियत और कमज़ोरी को बीच बीच में सामने लाती है। हर औरत के अंदर एक पारो छुपी है, ज़रूरी नहीं के उसके सपने लालसा और वासना से भरे होते हैं पर वो भी अमीरों और पहुंचे हुए तबके की दुनिया को देखना चाहती है, छूना चाहती है उसका ज़ायका लेना चाहती है। वो जानना चाहती है कि देखते ही देखते दूसरी औरत कैसे मध्यम वर्ग से उच्च वर्ग में अपनी पहचान बना लेती है और ये समाज कितनी आसानी से सब देख कर भी अनदेखा कर देता है, मक्खी निगल लेता है। पारो की कहानी प्रिया बताती है, दिल्ली और बम्बई  समाज की जिसमे कोई देवदास नहीं होते हुए भी प्रेम दुखद ट्रेजेडी ही रहता है।     

‘पारो’ के नए संस्करण और किताब के 40 साल के सफ़र पर नमिता गोखले जी से अम्ब्रीश सात्विक की रोचक बातचीत कल शाम (24 अगस्त) दिल्ली के हैबिटैट सेंटर में हुई, जिस से लेख़क और क़िताब के बारे में कुछ नई बातों का पता चला। इसी साल, 2024 में, पेंगुइन ने इसे अपनी क्लासिक श्रंखला में छाप कर “पारो” को गौरव ग्रन्थ या आला दर्जे का क़रार दिया है। यक़ीनन पारो एक क्लासिक है। आप ज़रूर पढ़ें। 

An Orthopedist or a Carpenter (Hindi)

हड्डियों के डॉक्टर और तरख़ान

मेरा नंबर चौथा था। मेरे पहले दो औरतें और एक जवान लड़का कमरे के अंदर बैठे डॉक्टर की नज़र भर का इंतजार कर रहे थे। पहली महिला को पीठ का कोई मर्ज़ रहा होगा उसने कमर पर बेल्ट कस रखी थी, दूसरी महिला बुज़ुर्ग थीं, उनकी तो उम्र ही दर्द रही होगी और लड़के की टांग पे पलस्तर चढ़ा था जिस पर  शायरी के सिवा किसी ने हरे रंग के स्केच पेन से प्रेम पत्र लिखने की शुरुआत भी कर दी थी जिसके अंत में एक मायूस से फूल के साथ बड़ी सी स्माइली के अंदर कुछ गुप्त सन्देश भी था।

जिस तरीक़े से डॉक्टर साहब मरीजों की हड्डियों का मुआयना कर रहे थे उन्हें देख कमरे के बाहर बैठा मैं दर्शन सिंह तरखान को याद कर रहा था। हड्डियों के डॉक्टर प्रेम चोपड़ा और दर्शन सिंह तरखान में मुझे कोई ज्यादा फर्क नहीं लगा। आदम जोड़ों और अंगों को जिस तरह घुमा कर, मोड़ कर और ऊपर नीचे चला कर डॉक्टर प्रेम देख रहे थे ठीक उसी तरह सरदार दर्शन सिंह लकड़ी के बड़े छोटे टुकड़ों को इक्कठे ठोक कर और हिला-डुला देखा करता था। गज़ब हुनर था दर्शन सिंह तरखान के हाथों में, आड़ी तिरछी लकड़ी से भी वो सुन्दर सामान बना देता था।

मेरे घुटने की सोज़िश और एक्सरे को देखने के बाद डॉक्टर बोले एक्सरसाइज नहीं कर रहे हैं? अरे, रोज़ करता हूं जी, मैं नाराज़ हो कर बोला । नहीं जी, ठीक तरह नहीं कर रहे हैं। चलिए आपको फिज़िओथेरेपी करानी होगी । घुटने की मरमत के साथ-साथ उसी दिन से शुरू हो गई गिनती करने की प्रैक्टिस, हिंदी और अंग्रेजी दोनों में । One, two, three, four, five… Relax  … वन, टू, थ्री, फोर, फाइव। ..

टांग और घुटने की कसरत के आठ तरीके बताए गए और हमे कसरत कराने वाले जूनियर डाक्टर के पास भेज दिए गया।  । जूनियर का नाम था सुफ़ियान।  सुफ़ियान शायद 23 या 24 साल के  रहे होंगे।  गोरा चिटा और हसमुख।

एक लंबे हॉल में स्टील के संकरे स्ट्रेचर नुमा बिस्तरों को तीन तरफ पर्दों से ढक कर छोटे कैबिन बना दिए गए थे जिनके आर पार देखा तो नही जा सकता था पर बातचीत आसानी से सुनी जा सकती थी और दूसरे मरीजों की आहें भी। चौथी तरफ थी ठंडी सफ़ेद दीवार। ऐसे ही एक केबिन की तरफ इशारा कर सुफ़ियान ने दूसरी तरफ से पर्दा खीँच दिया। अब सुफ़ियान और हम अकेले थे। मेरा घुटना अब उनके सुपुर्द था।

तीन तरफ़ से परदे में ढके उस केबिन ने जाने क्यों और कहाँ से मुझे अपनी जवानी के दिनों के उस रेस्टोरेंट की याद दिला दी जिसके घुप अँधेरे में हमने आशिक़ी का एक दौर बिताया था। कमला नगर का अजंता रेस्तरां जवान जोड़ों के लिए ही बनाया गया था और माशूक़ भी वहां जाने से कतराया नहीं करती थीं । मधुर धीमा  संगीत और हलकी लाल रौशनी में भी हम वो घुप्प काले केबिन ढूंढ लिया करते थे। हर केबिन के बाहर काले कपड़े का पर्दा रहता था जिसे अंदर लटकी डोरी  से बंद किया जा सकता था। जब तक अंदर लगी घंटी ना बजाई जाये तब तक कोई वेटर भी डिस्टर्ब नहीं  करता था। एक घंटे के 30 रुपये में वो केबिन उस ज़माने के हिसाब से भी ख़ासा महंगा था।

ऐसा ख़्याल जितनी तेज़ी से आया उतनी हे तेज़ी से तब निकल भागा जब सुफियान साहेब ने हमारे घुटने ज़ोर से दबा दिया। मेरी चीख़ से साथ वाले केबिन में लेटी महिला और उनकी नर्स ने जाने क्या क्या सोचा होगा। केबिन में दीवार के सहारे लगी लोहे की टेबल पर एक मशीन पड़ी थी जिस से 8 – 10 रंग बिरंगी तारें टेबल के नीचे तक फ़ैलीं थीं। पट्टियों के कुछ गोले, मरहम की ट्यूब और बाकि सामन के साथ टेबल भरी पड़ी थी।

सुफियान ने मुझे लेटने को कहा और मैं लेट गया। इस बार उसने मेरी दायीं टांग को बड़े नरम से हाथों से छुआ और घुटने को धीरे धीरे दबाया।  इस सब के बीच उसने मेरे चेहरे की तरफ देखना नहीं छोड़ा। वो ये जानना चाह रहा था कि मुझे दर्द कहाँ और कितना हो रहा है। ख़ैर, दीवार के साथ रखी मशीन के तीन तारों को उसने मेरे घुटने पे लगाया जिस से मेरी टांग में बिजली के करंट सी धीमी सुरसुरी बहने लगी, घुटने के ऊपर उसने एक गरम तौलिया डाल दिया और मुस्कुराते हुए मेरे सामने रखे स्टूल पे बैठ कर अपना मोबाइल देखने लग गया। 15 मिनट की झनझनाहट के बाद सुफ़ियान ने टांग को सीधा छत की तरफ उठा दिया और गिनती गिनना शुरू किया।

One, two, three, four, five, six seven eight nine ten… relax

वन, टू, थ्री, फोर, फाइव, सिक्स, सेवेन, एट, नाइन, टेन – रिलैक्स – लेग उप अगेन – एक, दो, तीन, चार, पांच, छै, सात, आठ, नौ, और दस – रिलैक्स। थक गए ? दर्द तो नहीं हो रहा ? मैंने भी ना में सर हिला दिया। मैंने नोटिस किया एक से दस तक पहुँचते गिनती की रफ़्तार तेज़ होती जाती है जैसे बस ख़त्म करने की जल्दी हो।  

हरे रंग की पाजामे नुमा पतलून और आधी बाजू की हरी कमीज पहने साढ़े पांच फुट लम्बा शख्स मुझे लेटी हुई पोजीशन से   बहुत ही लम्बोतरा दिख रहा था उसका सर कमरे की छत तक पहुँचता हुआ।  जैसे ही मैं टांग छत की तरफ पूरी ऊपर उठाता हूँ तो मुझे अटारी-वाघा  बॉर्डर पर हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी बॉर्डर पुलिस के जवानों की याद आ जाती है जो पूरे ज़ोर से अपनी टाँगे सर से भी ऊपर उठा कर पैर ज़मीन पे पटकते हैं। मेरा दिल वो ज़ोर लगाने की इज्ज़ाज़त नहीं देता। मुझे मालूम है उतने ज़ोर से अगर में पावं पटकूंगा तो टांग की या पैर की हड्डी तो गयी। मैं धीरे धीरे टांग को नीचे कर सावलिया नज़रों से सुफ़ियान साहेब को इस उम्मीद से देखता हूँ कि मैंने सब ठीक किया या नहीं। उनकी मुस्कराहट से दिल को बड़ी तसली हुई और अब मैं उस छोटे बच्चे जैसा महसूस कर रहा था जो  हर काम ठीक करने पर अपनी माँ या टीचर की तरफ देख उनके अप्रूवल और शबाशी का मुंतज़र होता है।  या फिर अच्छा बच्चा बने रहने पर एक चॉकलेट का हकदार।

अपनी ऑंखें मैं पैर से हटा कर छत पर लगे स्मोक अलार्म की डिबिया की तरफ करता हूँ।  उसके ऊपर एक नंबर लिखा है SA – 343, उसके छेद में धूल जमी है। डिबिया ठीक मेरे सर के ऊपर है और उससे एक फुट दूर है पानी के फ़वारे जैसा नल । अगर किसी वज़ह से अभी कहीं से धुआँ उठे तो पानी का फ़व्वारा सीधे मेरे माथे पे फूटेगा ये सोचते ही मैं अपने शरीर को दायीं और सरकाने  की कोशिश करता हूँ पर डॉक्टर मेरा बाज़ू पकड़ मुझे वापिस खींच लेता है और झिझकारते हुआ बोलता है “अरे, गिर जाओगे, मत सरको, ये बेड इतना चौड़ा नहीं है”, मैं संभल के नीचे की और झांकता हूँ और अपने शरीर को वापिस अंदर खींच लेता हूँ। अब भी नज़र ऊपर लगे फायर अलार्म से नहीं हटती। उस तक आने वाली बिजली तार की पट्टी टेढ़ी लगी है। मुझे फिर दर्शन सिंह तरखान याद आतें हैं, वो होते तो ये पट्टी बिलकुल सीधी लगी होती। पट्टी के साथ साथ चलती मेरी नज़र छत के कोने तक चली जाती है जहाँ किसी बच्चा मकड़ी ने नया और छोटा सा जाला बुना है जिसके अंदर अभी तक कोई मच्छर या मखी नहीं फ़सा।

वो जाला महीन सफ़ेद धागे जैसा है। दर्शन सिंह हमेशा कुर्ते नुमा लम्बी सफ़ेद क़मीज़ पहनते थे बिलकुल डॉक्टर के लम्बे सफ़ेद कोट की तरह। उनके दाएं कान में पेंसिल लगी रहती थी इनके गले में स्टेथोस्कोप। दर्शन सिंह ढीले हुए या कमज़ोर पड़े जोड़ को चूल लगा पक्का जाम कर देते थे ये डॉक्टर साहेब भी कुछ ऐसा ही करते हैं। मैं सोचता हूँ  पर जब मकड़ी की टांग टूटती होगी तो उसे कौन ठीक करता होगा ?

मेरे दायीं तरफ वाले केबिन में कोई गुनगुना रहा है। शायद कोई फ़िल्मी धुन है पर मुझे गाना याद नहीं आ रहा। में सोचता हूँ गुनगुनाने वाला डॉक्टर ही होगा किसी मरीज़ की इतनी ज़ुर्रत कहाँ जो यहाँ अस्पताल में गाये। मुझे अब दोनों बातों से कोफ़्त हो रही है। पहली कि गाने वाला कौन है और दूसरी की वो गाना मुझे याद क्यों नहीं आ रहा। उफ़। इस बीच डॉक्टर सुफियान ने चौथे तरीके की कसरत करनी शुरू कर दी है और में पहले की तीन भूल चूका हूँ।  इस वाली कसरत में घुटने को नीचे की ओर दबाते हुए पंजे को अपनी तरफ खींचना है।  इस से दर्द भी होता है पर फिर भी मैं इसे पांच बार कर ही लेता हूँ। डॉक्टर सुफियान खुश हैं, ‘अच्छी प्रोग्रेस है’ ये कह कर वो मुस्कुराते हैं। वो गाना फिर भी मुझे याद नहीं आ रहा।

बड़े डॉक्टर प्रेम चोपड़ा साहेब किसी मरीज़ को देखने ‘राउंड’ पे हैं मुझे उनकी आवाज़ आ रही है। सब जूनियर डॉक्टर सतर्क हैं और बड़ी मुस्तैदी से मरीजों को समझा रहे हैं। मुझे अब थकान हो रही है और अब मैं  ऊब रहा हूँ। मुझे ऐसे लग रहा के की बस अब पहली मंजिल पे चल कर अस्पताल के कैफेटेरिया में बढ़िया कॉफ़ी पी  जाए और अगर आस पास में कोई जान पहचान वाला न हो तो लगे हाथ एक गरम समोसा भी झीम लिया जाए। अब इन मॉडर्न अस्पतालों को पूरे आराम के लिए ही तो बनाया गया है। मरीज़ को मिलने और हाल पूछने आये सभी दोस्त और रिश्तेदार लोगों का भी तो ध्यान रखना भी तो अस्पताल की ड्यूटी है और फिर शाम चार से पांच अगर मिलने का समय है तो वो चाय का भी तो समय है। वैसे भी अस्पताल में पार्किंग और हल्दीराम भी तो कमाई का एक बड़ा ज़रिया हैं।

इस से पहले  कि मैं कुछ कहता सुफ़ियान साहेब ही बोल पड़े ‘अब घर जा कर शाम को ये सब एक्सरसाइज ज़रूर कीजियेगा’ । एक बड़ी सी स्माइल के साथ मैंने भी ऊपर पड़ी चादर को धकेला और अपने जूते ढूंढने लगा।

साथ वाले केबिन से फिर वही गाने की धुन बजी, इस बार हलकी सीटी के साथ। यकायक मेरे मुँह से निकला ‘ये पकड़ा’ तभी डॉक्टर प्रेम चोपड़ा पर्दा सरका अंदर आ गए और जूनियर सुफियान हैरान हो गए। मैंने कहा ‘कुछ नहीं’ और झेंप गया। डॉक्टर चोपड़ा ने कहा अरे झिझकिये मत बताइए। Sir, don’t you think that an orthopaedist and a carpenter do very similar work? डॉक्टर चोपड़ा घबराये और सकपका गए, शायद उन्हें कुछ जवाब नहीं सूझा। बिना कुछ कहे उन्होंने सर हिलाया और तेज़ी से बाहर निकल गए। शायद जवाब अगली बार देंगे ये सोच मैंने तसल्ली कर ली।  इतने मसरूफ डॉक्टर हैं उन्हें कहाँ ऐसी फलसफे वाली बातों के लिए वक़्त होगा।  उफ्फ्फ छोड़ो।

अचानक  डॉक्टर चोपड़ा वापिस लौट आये।  मुझसे मुखातिब हो उन्होंने कहा “आप ज़्यादा घबराइये और सोचिये मत। आप जल्द ठीक हो जायेंगे। थोड़ी बोन्स और लिगमेंट्स की सेट्टिंग करनी है, बस! वो जैसे फर्नीचर ढीला हो जाने से चूं चूं  करता है ना , कुछ वैसे ही है आपका घुटना। चूल जैसी एक दो लिगमेंट बनने से ठीक हो जाएगा।” मैं खुले मुँह से उन्हने तकता रहा, हक्का-बक्का।  बिलकुल दर्शन सिंह तरखान का कहा और किया।  वो भी किसी झूलते दरवाज़े को, अलमारी के पल्ले को या फिर चूं चूं  करती चारपाई को दो चार चूल लगा दुरुस्त कर दिया करता था। अब मुझे यकीन हो गया था अगर में दर्शन सिंह तरखान को बुला लेता तो वो भी घुटने को ठीक कर देता।

इतनी देर में  जूते के फीते बांधते बांधते मुझे गाने का मुखड़ा तो याद आ गया पर अंतरा फिर गच्चा दे गया। कम्बख़्त, वो क्या था यार? ‘आसमां पे है ख़ुदा और ज़मी पे हम’ … ता तरा तरा तरा ता तरा तरम।

राजिंदर अरोड़ा
दिल्ली