​सहस्तर का फूल

​सहस्रताल टिहरी गढ़वाल की भीलांगना घाटी के विकराल पर्वतों पर स्थित एक भीषण ताल है जो कि बहुत दुर्गम है। स्थानीय ग्रामीण जन सहस्रताल को “सहस्तर” पुकारते हैं और कहते हैं – ‘जर्मन की लड़ाई’, सहस्तर की चढ़ाई । सहस्रताल की यात्रा से लौटने पर एक दिन मैंने यह कामना की:

काश में सहस्तर का फूल होती। कोई हृदयहीन हाथ मुझे तोड़ता तो मेरी डाल के असंख्य महीन कांटे उसमें विषैले डंक मारते। … मेरा पवित्र एकान्त भंग करने वहाँ बेहया भीड़ न होती। कोई इक्का-दुक्का दर्शक वहाँ आता भी तो भीषण डांगरों को पार कर प्रचन्ड वन से गुज़रता एक एक चट्टान पर पैर जमाता, भूख प्यास सहता, अथक श्रम और साहस से हाँफता यहाँ तक पहुंचता और उन ऊँचाइयों पर मुझे खिला पाकर किसी अज्ञात भाव में डूब कर मुझे देखता।

काश में सहस्तर का फूल होती। मैं बिकती नहीं सजती नहीं, मैं किसी फूलदान में कैद न होती, अर्थियों पर न होती, मैं बगीचे में न होती, मैं किसी जूड़े का गहना न होती, मैं किसी के प्रेम का प्रतीक न होती, मैं किसी मन्दिर में न होती।

मैं सहस्तर के भयावह दुरुह तट पर खड़ी ऐन अपनी जड़ों पर होती।

​​ज्योत्स्ना शर्मा​, ​सहस्तर का फूल 

Coming down from Sahastratal after two most stunning but grueling days of the trek. With mashals in hand this an amazing picture where Rastogi ji, Puran Jangpangi can be recognized.

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