THE WORLD OF HINDI CINEMA
और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाक़त लिखना
रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना
- हबीब जालिब
अगर आप शिराज़ हुसैन उस्मानी की कला, उनकी खताती (कैलिग्राफी), उनके स्टूडियो ‘ख्वाब तनहा’ और उनकी शख्सियत से वाकिफ नहीं हैं तो आप बहुत कुछ मिस कर रहे हैं। अपनी क्रीऐटिवटी और अपने हुनर से कल शाम शिराज़ साहब ने महफ़िल लूट ली। मौका और नुमाइश (‘दुनिया परछियों की’) तो हिन्दी सिनेमा के फिल्म पोस्टर, गीत पुस्तिकाएं, लॉबी कार्ड और बड़े छोटे परदे पर चलती तस्वीरों की थी पर शिराज़ हुसैन के बनाए परदों पे थिरकते हर्फों नें देखने वालों पर ना सिर्फ जादू कर दिया पर वो आज के माहौल पर एक तबसरा भी हैं ।
जाने माने फिल्म इतिहासकार और कला क्यूरेटर आशीष राजाध्यक्ष ने इस प्रदर्शनी को पुराने फिल्मी पोस्टरों, लॉबी कार्ड, थिएटर के अंदर का माहौल बना कर मल्टी-मीडिया के इस्तेमाल सिनेमा के प्रेमियों के लिए खास तरीके से पेश किया है। यह प्रदर्शनी रोजमर्रा की भारतीय जिंदगी में सिनेमा की अमूर्त उपस्थिति को उजागर करती है।
अर्थशिला दिल्ली में लगी “दुनिया परछाइयों की” प्रदर्शनी “भारतीय सिनेमा के सच्चे सिनेप्रेमियों के लिए है। हिन्दी सिनेमा 21वीं सदी के भारत में सबसे बड़े सांस्कृतिक प्रभावों में से एक रहा है। प्रदर्शित पोस्टर 70, 80 और 90 के दशक की सिनेमाई स्मृति को याद करते हैं।”
प्रदर्शनी 27 सितंबर 2025 से 4 जनवरी 2026 तक रहेगी। बेहतरीन, ज़रूर देखिए। बाकि जानकारी @arthshila_delhi


