उर्दू बाज़ार खत्म होते ही कबाड़ी बाज़ार शुरू हो जाता है जहां जामा मस्जिद में आने जाने वालों की अपनी रौनक बाज़ार की भीड़ को और बढ़ा देती है। बाज़ार में बैठने वाले छोटे-बड़े कबाड़ी सड़क पे ही अपना सामान और औज़ार फैलाये ठोका-पीटी करते दिखते हैं। उनके इस शोर के साथ होता है आने जाने वाले टेम्पो, लारियाँ के हॉर्न, झल्ली वालों की ‘हटियो भाई’ ओर रिक्शा वालों की ‘ओए, बच के’ का अपना शोर जो किसी शाही क्लासिकल ऑर्केस्ट्रा से कम नहीं। ज़िंदगी की अपनी जद्दोजहद, इंसानी जरूरतों और सड़क की अहतियातों के रहते भी ज़ुहर की नमाज़ कानों पे सावन की फुहार का काम करती है। हजारों बार देखने के बावजूद मस्जिद-ए-जहाँ-नुमा हर बार नई दिखती है, अपना एक नया चेहरा लिए। दो गुंबदों के बीच खड़ी ये मीनार उस मासूम और हठी बच्चे सी लगती है जो अपनी नई धारीधार कमीज़ दिखाने के लिए सामने आ खड़ा होता है। मटिया महल वाले जाने क्यूँ मस्जिद पे अपना हक़ जमाना चाहते हैं! अरे भाई, इमाम साहब को किताबों से भी उतना लगाव है जितना कोरमे से।






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