भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर राजनीति ने जितनी कहानियाँ लिखी हैं, उनसे कहीं अधिक कहानियाँ आम लोगों की स्मृतियों में सुरक्षित हैं। वे कहानियाँ बताती हैं कि सरहदें नक्शों पर खिंचती हैं, दिलों पर नहीं। राजिन्दर अरोरा की ‘यार मेरा हज करा दे’ ऐसी ही एक सच्ची कहानी है, जिसमें बहुचर्चित फिल्म ‘ मैं वापस आऊंगा’ के बुजुर्ग की तरह एक बूढ़े पिता की लाहौर लौटने की इच्छा, विभाजन की त्रासदी, साझा संस्कृति और मनुष्यता के गहरे रिश्तों का मार्मिक आख्यान बन जाती है। भले हीं यहां लौटने की इच्छा का सबब फिल्म की तरह प्रेम और उसकी स्मृतियां न हो। अपने बचपन के शहर की ओर लौटना ऐसी ही एक यात्रा है, जिसमें रास्ते से ज़्यादा स्मृतियाँ साथ चलती हैं। यह किताब स्मृति, विस्थापन और मनुष्यता की उस साझा विरासत की खोज है, जिसे कोई सरहद बाँट नहीं सकता।
If there is one street, one bazaar in our city that epitomizes shared heritage and secular values, it is Chandni Chowk in Purani Delhi (पुरानी दिल्ली). Look at this beautiful sight: the golden dome of Shree Sis Ganj Gurdwara Sahib as seen from inside the Sunehri Masjid right next to it. The Masjid is being repaired – special niches were added to enhance the view – and look at the कंगूरे (Crenellations) on top of the wall, the decorative element of a mosque’s outer wall. Ah, something to behold in Purani Delhi: a living example of साझा संस्कृति का सफर for nearly 400 years now. In less than a 700-meter stretch, people of different faiths celebrate their religious beliefs and ideologies in brotherhood, while respecting each other’s space. Starting at the eastern corner of Chandni Chowk we see the Digambar Jain Lal Mandir, which touches the Gauri Shankar temple. Walk 150 meters diagonally and we find the Central Baptist Church. Diagonally across another 100 meters is the Gurudwara Sis Ganj Sahib which shares a common wall with the Sunehri Masjid. Lastly, walk another five hundred meters to face the beautiful Fatehpuri masjid, built in 1650 by Fatehpuri Begum, the emperor’s wife. In my book पुरानी दिल्ली: साझा संस्कृति का सफर you will find this and many other stories of Purani Delhi. Available from Leftword.com and also on Amazon.
Delighted to share that Dasa Mahavidya: Gesture, Form, and the Divine Feminine, designed by Rajinder Arora/Ishtihaar and published by Ojas Art, has been Longlisted for the 4th Oxford Bookstore Art Book Prize among the other fifteen.
Dasa Mahavidya reflects on the visual, philosophical and symbolic dimensions of the Ten Wisdom Goddesses through the lens of contemporary artistic practice. The Dasa Mahavidyas, or Ten Wisdom Goddesses, are prominent figures in Hinduism, especially within Tantric traditions, representing diverse aspects of the Divine Feminine and encompassing ultimate wisdom. They are: Kali, Tara, Tripura Sundari (or Shodashi), Bhuvaneshvari, Bhairavi, Chhinnamasta, Dhumavati, Bagalamukhi, Matangi, and Kamala. These goddesses are believed to be manifestations of Goddess Parvati and are invoked for spiritual growth, empowerment, and the realization of the Supreme through practices like meditation, mantra chanting, and devotional acts.
The Oxford Bookstore Art Book Prize is India’s only award dedicated to recognising excellence across art publications and their contribution to the larger discourse on art and culture. At Ishtihaar we are honoured to see our work recognised among this year’s selected titles.
Best wishes to Anubhav Nath and Ojas Art, who have another art book “Ram Singh Urveti: Another Master”in the Longlist. The final winners will be announced later this year.
जैसा हाल देस का, वैसा घर का हाल. आजकल घर में एस.आई.आर. चल रहा है. जी हाँ, स्पेशल इन्सेंटिव रिवीज़न—कोने-कोने में झांक कर तफ़्तीश हो रही है. आप कहेंगे, ये क्या मज़ाक है, घर में कुल चार जन हैं, वहाँ कौन देसी, कौन बिदेसी. घर में कहाँ घुस आएंगे कोई. अरे, एक तो आप समझते नहीं हैं. ये कोई अपने वाले, दूसरे वाले, बंगाली, रोहिंग्या, नेपाली, धर्म, जात या हाज़िर, नाज़िर का इंसानों वाला एस.आई.आर. नहीं है, ये है किताबों का एस.आई.आर.—एक-एक किताब गिनी जा रही है, कौन हिन्दी, अँग्रेज़ी, उर्दू, अवधी, पंजाबी, बांग्ला, तमिल आदि-आदि. कौन कहाँ से आई, किस शेल्फ़ में है, क्या विषय है, वगैरह-वगैरह. कहानियाँ और नॉवेल एक तरफ़, कविता दूसरी तरफ़, इतिहास और यात्राएं अलग, गीता, बाइबल, क़ुरआन शरीफ़, गुरु ग्रंथ साहब, ज़ेंड अवेस्ता सब इकट्ठी हैं या नहीं. एक प्यारे से लड़के ने घर की हर किताब को कटलॉग और इंडेक्स करने का ज़िम्मा उठाया है सो सब का नाम, लेखक का नाम, विषय, प्रकाशक, छपने का साल, आईएसबीएन और बाकी सब एक ऐप में दर्ज किया जा रहा.
इस सब के चलते एक बड़ी समस्या आन खड़ी हुई, बिल्कुल एस.आई.आर. जैसी. घुसपैठिया तो नहीं कहूँगा पर एक ऐसी किताब मिली है, जिसका कोई नाम-पता नहीं है, यक़ीन मानिए, किताब का कोई नाम नहीं, लेखक का नाम नहीं, दाम नहीं, छपने का साल, प्रकाशक आदि कोई कुछ पता ही नहीँ है. इस बेचारी किताब को अब क्वारंटाइन कर दिया गया है.
आप मेरी व्यथा नहीं समझ रहे, बहुत दुखदाई है किसी किताब के बारे में ये न समझ आना कि वो है कौन.
जैसे ही हम किसी नई किताब को हाथ में लेते हैं तो जल्द ही हमें उसके बारे में कुछ न कुछ मालूम हो ही जाता है. उस किताब का नाम, उसे लिखने वाले का नाम और अगर आगे-पीछे छपे ब्लर्ब पढ़ लिए हों तो उसकी कहानी या विषय के बारे में कुछ अंदाज़ हो ही जाता है. पर अब आप अपनी या मेरी उस स्थिति के बारे में सोचें जब हम किसी किताब से फाड़ा गया, जुदा हुआ, वो पन्ना पढ़ रहे हों जिसके बने लिफ़ाफ़े से हमने अभी-अभी चना ज़ोर गरम या भुनी मूंगफली खाई है. छोटा-सा लिफ़ाफ़ा जिसको खोल कर सीधा करते हुए उसका पेज नंबर और ऊपर या नीचे लिखा किताब का नाम फट गया है – कहानी का वो मोड़, जो उस पन्ने पर छपा है, बहुत रोचक है और आप ये जानने को बेताब हैं कि कहानी के किरदार, उन दो आशिक़ो का इश्क़ परवान चढ़ा कि नहीं— बस अब आप सिर के बाल नोच रहे हैं कि वो ही किताब कैसे ढूँढी जाए, कैसे ख़रीदी जाए और जल्द से जल्द कैसे पढ़ी जाए.
और अब ये दूसरा आलम भी सोचिए, सड़क के पार खड़ा एक पागल इंसान एक-एक कर के किसी किताब के पन्ने फाड़ कर उन पन्नों को तेज़ हवा में ऐसे रसीद कर रहा है जैसे वो हवा का रुख़ देख रहा हो. जब तक ट्रैफ़िक थमे और आप या मैं सड़क पार कर दूसरी तरफ पहुँचें, वो पागल बची हुई किताब को हवा में उछाल कर भाग लेता है. वैसे चाहे आप किताब देख भर कर ही नाक सिकोड़ लेते हों पर उस बिना जिल्द या आगा-पीछा लिए किताब को अब आप दो गुना ज्यादा कशिश से पढ़ना चाहेंगे. उस जर्जर, उधड़ी, बे-जिल्द किताब को आप घर ले जा कर अपने शेल्फ़ पर ख़ास जगह देंगे, अगले पंद्रह दिन तक दोस्तों को किताब बचा लेने के अपने वीरता भरे कारनामे के बारे में बताएंगे, उस वाक़ये के बारे में फ़ेसबुक पर उसकी कहानी लिखेंगे. ये भी हो सकता है कि वो फटेहाल किताब आप को अपनी दसवीं जमात की ट्रिगनोमेट्री की किताब और गणित के उस खड़ूस मास्साब की भी याद दिला दे और अब उस फटी किताब की दर्दनाक हालत को देखकर आपके दिल को बहुत सुकून मिले, ‘ये ले ट्रिगनोमेट्री, मेरा बदला पूरा हुआ’.
नीचे बयान किया क़िस्सा ऐसी ही बिना जिल्द की किताब का क़िस्सा है. वो बिना जिल्द की किताब जो मुझे मेरे ही घर में मिली.
लेख, निबंध और दूसरी हिन्दी रचनाओं की इस किताब की जिल्द नहीं है, या यूं कहिए कि खो गई है. वैसे तो खोई जैकिट कोई ज़्यादा बड़ा मसला नहीं बनती पर यहाँ पेच कुछ गहरा है. ताज्जुब की बात ये है कि इस किताब के नाम वाला अन्दरूनी पेज भी ग़ायब है. इस किताब का पहला सफ़ा 21 नम्बर से शुरू होता है वो भी अधूरे वाक्य “प्रभाव पड़ने लगा था” से. पहले 20 पेज किताब में हैं ही नहीं. न कोई टाइटल पेज है, न कोई विषय सूची. किताब की जिल्द तो ठीक-ठाक ही है जिसे देख ये तो नहीं लगता कि किसी ने पहले 20 पन्ने फाड़ लिए हैं या वो खुल कर गिर गए हैं. इस बेचारी किताब के साथ क्या हुआ होगा ये कहना मुश्किल है पर ले-दे कर मामला अजीब-ओ-ग़रीब है.
अमूमन किताब के अंदर वाले पन्नों पर, नीचे या ऊपर की तरफ, पेज नंबर के साथ भी किताब का नाम होता है, इस किताब मे वो भी नहीं है. अलबत्ता हर चैप्टर का नाम ज़रूर दिया गया है पर उस से भी मैं ये नहीँ पता चला पाया कि इस किताब का नाम या इसके लेखक का नाम क्या है. इसमें कोई कॉपीराइट पेज भी नहीं है जो इसके प्रकाशक का नाम, छपने का साल आदि के बारे में बता सके. कुछ लेख पढ़ने के बाद भी ऐसा कुछ नहीं मिलता जिसकी मदद से चचा गूगल से ही पता लगाया जा सके. बहुत सी किताबों की तरह इसके आख़िरी पन्ने पर “लेखक के बारे में” या “इस लेखक की दूसरी किताबें” भी नहीं बताई गईं. चूंकि किताब पुरानी है सो न कोई आईएसबीएन है, न कोई बार कोड.
किरोसीन में मिली स्याही की बची-खुची महक, कागज के पीलेपन से और उस पर चढ़े कपड़े की रंगाई से किताब करीब 50 साल पुरानी लगती है. छपाई लेटर प्रेस की घिसे हुए कांसे के टाइप की है. बाइन्डिंग ख़ासी पक्की है, सिलाई का धागा मोटा है, पुरानी चढ़ी लेई के सूख चुके दाने भी मोटे हैं. इसके अलावा किताब की उम्र बताने वाला और कुछ नहीं है. मेरा अंदाज़ है कि ये सत्तर की दहाई की है.
ताज्जुब की बात ये भी है कि यह किताब मेरे पास आई कैसे. मुझे तो याद नहीं कि मैंने इसे ख़रीदा हो या किसी ने मुझे ये भेंट दी हो. और फिर मैंने इसे आज तक खोल कर देखा क्यूँ नहीं, पढ़ा क्यूँ नहीं. क्यूँ ये छिपती रही और अलमारी में जगह घेर कर बैठी रही. कुछ तो राज़ है. पिछले पचास बरस में ख़रीदी तक़रीबन हर किताब का हिसाब है मेरे पास, ये कैसे छूट गई. ऐसा तो नहीं कि कोई इसके ज़रिए मुझे कोई खुफ़िया संदेश भेजा जा रहा है या फिर इसके पन्नों में हिंद महासागर के किसी टापू पर गड़े खजाने का कोई नक्शा छिपा है.
बड़ी दुविधा है, कैसे पता लगाया जाए, कोई तरीका सुझाएं? कोशिश करने पर भी इस किताब का नाम अगर न पता चला तो क्या इस किताब को मैं कोई और नाम दे सकता हूँ? अब सोचिए, कितनी देर आदमी एक ही मसले से उलझ सकता है.
इंसानी जिल्द यानि आदमी की चमड़ी पर गुदे टैटू और किताब की जिल्द पर छपा टाइटल दोनों को गुमनाम होने से बचा लेते हैं. आमिर ख़ान की फ़िल्म ‘गज़नी’ याद है जिसमें वो अपनी याददाश्त खो देते हैं और कुछ भी याद रखने के लिए उसे अपने शरीर पर चीजें लिखते हैं. .
मैं ये सोच रहा था कि क्या ये मुमकिन है कि किताब की तरह अगर आदमी की जिल्द, यानि शख़्सियत, कभी खो जाए तो उसका वजूद क्या रहेगा ? यहाँ जिल्द से ताल्लुक आदम-चमड़ी का नहीं उसके किरदार से है, स्वभाव से है, उसका रुतबा, हस्ती, मिज़ाज और रूह से है. जैसे किताब जिल्द से पहचानी जाती जी, वैसे ही आदमी भी तो अपने मिज़ाज से ही जाना जाता है.
वैसे सोचा जाए तो एक बात जो अक्सर देखी जाती है वो ये है कि किसी आदमी और किताब—दोनों को उनकी बाहरी दिखावट के बजाय उनके अपने स्वभाव के ज़रिए गहराई से आंका और समझा जा सकता है. इसके अलावा भी इंसान और किताब में और भी बहुत कुछ एक जैसा है.
किताब और ज़िंदगी दोनों एक कहानी ही तो हैं. हर इंसान की ज़िंदगी की अपनी एक कहानी होती है, जो उसके तजुर्बों, उम्मीदों और बीती जद्दोजहद से बनती है. इसी तरह हर किताब में एक अफ़साना, लेख या कहानी होती है, जिसे हर पढ़ने वाला अपने अनूठे नज़रिये से समझता है.
जिस तरह हमारे द्वारा चुनी गई किताबें हमारे स्वभाव, किरदार और शख़्सियत का आईना होती हैं, उसी तरह किसी किताब का मज़मून या विषय और प्रसंग उसके लेखक के स्वभाव और लिखने के इरादे को ज़ाहिर करते हैं.
दोस्तों की तरह का मामला है ये. एक अच्छी किताब और एक अच्छा दोस्त दोनों ही उम्र भर साथ निभा सकते हैं. दोनों ही दोस्ती और साथ का हासिल हो सकते हैं. एक तरफ़ आदमी के दोस्त होते हैं तो दूसरी तरफ़ एक अच्छी किताब को अच्छे और ख़ुश मिज़ाज साथी की तरह जाना जाता है जो मुश्किल में भी अपने पाठक का साथ नहीं छोड़ती.
इंसान और किताब दोनों ही तरक़्क़ी और इल्म और सूझ बूझ के बाइस हैं. इंसान अपने निजी अनुभवों से समाज और विरसे को आगे बढ़ता है, जबकि एक किताब हमें इल्म और ज्ञान देती है, अलग-अलग विषयों पर हमारी जानकारी बढ़ा कर हमारी सोच और कल्पनाशीलता को बढ़ाती है.
अक्सर लोग किसी इंसान की शख़्सियत को जानने से पहले उसके चेहरे, हाव-भाव और बाहरी रंग-रूप को देखकर उसके किरदार का अंदाज़ लगाते हैं, जो कि बहुत बार सही नहीं उतरता. ऐसे ही बहुत से लोग किसी किताब के कवर पर लिखे कुछ शब्दों या उसके लेखक के नाम से ही उसके बारे में अपनी राय बना लेते हैं, वह भी ग़लत है. “किसी किताब को उसकी जिल्द से मत आँकिए”, यह कहावत भी इंसान की फ़ितरत बताती है.
पर ‘मेरे दुख की दवा करे कोई’, इस बिना जिल्द की किताब का नाम कैसे पता लगेगा.
एक प्यारे दोस्त जिन से मैंने इस व्यथा के बारे में बताया वो बोले, ‘अरे भाई उसे मुझे दे दो, मैं उसके आगे और पीछे की कहानी को पूरा कर उस पर अपने नाम की जिल्द चढ़ा लूँगा. वो मेरी रानी है है न, जिस से अपना टांका फिट है, उसकी बड़ी चाहत है कि मैं कोई किताब लिखूँ. अपनी तो बात बन जाएगी यार, “बस, ये किताब मुझे दे दे ठाकुर.”’
With his hand on my head we walked together three steps closer to the chair he was to occupy. I couldn’t lift my neck to watch that roohani face and dreamt of rubbing my nose against his. Reading my mind, he smiled. At the edge of the table he picked up a packet and unwrapped the book showing it to the audience in the packed IHC hall. My head was still bent when he came and handed me ‘that copy’ of the Tibet House book which had been designed by me – and printed at #ishtihaar His Holiness The Dalai Lama smiled while looking at me and patted my shoulder on the way back as we walked the aisle together – a dozen Rimpoche’s alongside. Thanks Your Holiness, may you live forever and see a peaceful world. Years earlier I was blessed to get a private audience with him at McLeodganj. He is charming and his face glows. More images on our website.
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