गुज़रा वक़्त और माँ की किताबें
कमरे बुहारने और अलमारी के शेल्फ़ दराज़ साफ करने से खोई हुई चीज़ तो शायद मिल जाए पर गुज़रा वक़्त और पूरी हो चुकी माँ कहां मिलती है – कितना भी खोज लो – वो जो एक बार गई सो गई – ढूंढते रहो, बुलाते रहो फिर – अब ना आने वली वो ।
सूने, खाली कमरे में अपनी ही आवाज गूँज कर वापस लौट आती है और फिर नज़र आती है मुस्कुराती हुई तस्वीर जो दीवार से पूरे घर का मुआयना कर रही है। घबराहट में मैं इधर-उधर देखने लगता हूँ आंखें मलते हुए नीची कर लेता हूँ और फिर एक और ठंडी सांस ले रोज़मरा के फ़िज़ूल कामों में लग जाता हूँ। माँ के पलंग के साथ वाली दो साइड टेबल के नीचे माँ की अपनी किताबों का ज़खीरा बाहर निकाला गया। ये वो किताबें हैं जिन्हें माँ हफ्ते-दस-दिन में पढ़ती और दोहराती रहती – बाकी किताबें पढ़ने के बाद उनकी लाइब्रेरी के शेल्फ में बेसमेंट में चली जाती है। ये सब किताबें उनके हाथ की पहुंच में रहने से उन्हें एक तसल्ली रहती थी।
माँ को गुजरे चार महीने हो चले हैं । इन सब किताबों को झाड़ कर कल साफ किया गया। वैसे तो सब बेहतरीन किताबें हैं पर इनमें दो ज़रूरी किताबें हैं – एक है गुरुमुखी लिपि, यानि पंजाबी, की गीता और दूसरी कबीर रचनावली। आप देख सकते हैं कि गीता की जिल्द पूरी तरह से खुलने लगी है जिसे कल मैंने अपने हाथों से दुरुस्त कर दिया (हाँ, मुझे जिल्दसाज़ी आती है) दूसरी वाली के भी पन्ने खुल कर बिखर रहे थे तो वो भी धीरज से एक एक पन्ना इकट्ठा कर ठीक की गई।
इनमें से पंजाबी की गीता ज्यादा जरूरी है, इस के लिए नहीं कि वो “गीता” है, इसलिए कि वो किताब मेरी नानी चंद्रावती ग्रोवर ने मेरी माँ को दी थी। पंजाबी की ये गीता सन 1941 में अमृतसर की छपी है – यकीनन नानी ने लाहौर या झंग में खरीदी होगी (अब लकीर के उस पार) । नानी को गुरुमुखी और उर्दू पढ़नी आती थी, हिंदी और अंग्रेजी नहीं। शायद ये माँ के दहेज़ में आई होगी या फिर शादी के बाद माँ को किसी खास मौके पर मिली होगी। मोटे अक्षरों में छपी 216 पन्ने वाली इस गीता की कीमत कुल ढाई रुपये है। इसकी जिल्द पर चिपकी रंगीन तस्वीर देख कर यकीन नहीं होता कि आज से 85 साल पहले भी ब्लॉक से इतनी खूबसूरत रंगीन छपाई हो सकती थी। खाली हाथ जाने वाला कुदरत का उसूल गलत है। और कुछ साथ जाए या ना जाए किताबें साथ जरूर जानी चाहियें । माँ कितना मिस करती होगी इन किताबों को ।
A death leaves behind a physical and emotional architecture that the living must navigate. Things, even memories, left behind by the one who has gone is the memento mori for the survivors.









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