स्मिता सिन्हा जी द्वारा हिन्दी में लिखी असल कविता बिना आपकी इजाज़त के आपकी दिल छूने वाली कविता का अंग्रेजी अनुवाद करने की गुस्ताख़ी की है ।
निर्विकल्प
उस एकान्त में अब एकान्त जैसा कुछ नहीं उस शोर में भी अब शोर जैसा कुछ नहीं वो फिर भी रहती है उसी एकान्त में उसी शोर को सुनते हुए…
My English translation
Tranquility
In that solitude there is nothing like solitude anymore, in that noise too there is nothing like noise anymore, still she stays in that solitude listening to that noise…
Early in the प्रातःकाल – a Ghalib-afflicted bhakt interjects serious discussion on vegetable prices. उग रिया था ऊ की दीवार पे सब्ज़ा ग़ालिब तोड़ने हम भी गए पर वाँ टमाटर न मिला
Mr Bond, we started early. This was 1996. Bonding with you, your writing since then. Wishing you good health, joy, and a happy birthday, Ruskin Bond. Keep writing and keep spinning that charm. You have been kind to me, to us, with signed copies of almost all your works. The first book that you signed for me here at the British Book Fair at the British Council, still smells of your touch. This is the bonding of stars @Shashank.
वैसे तो दुनिया भर में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जाता है पर इस 1 मई को सहमत (सफदर हाश्मी मेमोरियल ट्रस्ट) ने ये दिन फिलिस्तीन के लोगों के साथ एकजुटता की अभिव्यक्ति के रूप में भी मनाया। इस मौके पर ‘द बॉडी कॉल्ड फिलिस्तीन’ नामक कला प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जो कि जवाहर भवन, डॉ राजेंद्र प्रसाद रोड, नई दिल्ली के परिसर में लगाई गई।
यह प्रदर्शनी – जिसमें भारत और फिलिस्तीन के कलाकारों की 140 से अधिक कला कृतियों और 5 वीडियो शामिल हैं फिलिस्तीनी लोगों द्वारा सामना किए जाने वाले अत्याचारों और अन्याय के खिलाफ एक बुलंद आवाज़ है।
हम जानते हैं कि फिलिस्तीन का अस्तित्व तब से दांव पर लगा हुआ है जब से इजरायल ने उनके खिलाफ नरसंहारकारी सैन्य हमला शुरू किया है। गाज़ा, पश्चिमी तट, यरुशलम, लेबनान और सीरिया के आसपास के अरब क्षेत्रों में तबाही का पैमाना किसी भी ‘क्रिया-प्रतिक्रिया’ प्रतिमान को झुठलाता है, जिसका दावा इन जमीनों पर इजरायल के निरंतर कब्जे के समर्थक कर सकते हैं।
प्रदर्शनी के क्यूरेटर अमित मुखोपाध्याय अपने नोट में कहते हैं “इस प्रदर्शनी, ‘द बॉडी कॉल्ड फिलिस्तीन’ का उद्देश्य एक अलग आख्यान के लिए तर्क देना है: फिलिस्तीनियों के घर के विशाल और खुले क्षेत्र को एक संदेश भेजना; ‘फिलिस्तीनी विषय की विभाजित अवधारणा’ का प्रतिनिधित्व करना। इस विभाजित अवधारणा को साकार करने की दिशा में पहला कदम अपनी मातृभूमि में वापसी की संभावना पर निर्मित स्वतंत्रता की दृष्टि है; और दूसरा अपने विषयों की संप्रभुता की प्राप्ति के माध्यम से है। मैं जिस आदर्श को कायम रखता हूं वह है फिलिस्तीनी लोगों को बीहड़ इलाकों से गुजरते हुए और दीवार के दूसरी तरफ पार करते हुए देखना।”
सहमत द्वारा जारी की गई ज्ञप्ति ने बताया ” …फ़िलिस्तीन में मौजूदा विडंबना पिछले सात दशकों से चल रहे गृहयुद्ध का एक अतिशयोक्तिपूर्ण रूप है, जिसमें इज़राइल अपनी हथियारबंद शक्ति को जीवित रखता है, और फ़िलिस्तीनी लोगों पर अपने अत्याचारों को ‘इज़रायली लोगों के लिए न्याय’ के रंग में रंगता है।”
फ़िलिस्तीनी दूतावास के डा आबेद एलरजेग अबू जजेर ने भी प्रदर्शनी में लगी कला कृतियों की प्रशंसा करते हुए कुछ कलाकारों से बात चीत की।
प्रदर्शनी के उद्घाटन के बाद सतरूपा भट्टाचार्य ने महमूद दरवेश की कविता पढ़ी और जन नाट्य मंच द्वारा नाटक “फिलिस्तिन के लिए” पेश किया गया।इस
प्रदर्शनी को आप 31 मई 2025 तक रोज़ाना 11 से सात बजे तक दिल्ली के
जवाहर भवन, डॉ राजेंद्र प्रसाद रोड, नई दिल्ली में देख सकते हैं।
हज़रत अमीर ख़ुसरो के उर्स पे हाज़री लगाने लाहौर से आये दोस्त अली उस्मान बाजवा से कल दोपहर मुलाक़ात हुई। यूँ तो उस्मान को मैं बरसों से जानता हूँ पर कल उनसे पहली बार रूबरू हुए। (रूहों के ये रिश्ते बड़े कमाल के होते हैं) मिलना भी क्या था बस दो घंटों में रावी दरया और उनके प्यार को सोखना भर था। कल रात ही उन्हें वापिस सरहद पार घर लौटना था। उस्मान जाने माने अदीब हैं, रेडियो और टीवी पे कई प्रोग्राम करते हैं “वेख पंजाब” और “पंजाबी संगत” संस्थाओं से जुड़े हैं। पंजाबी ज़ुबान को उर्दू के बराबर का दर्ज़ा दिलवाने में दिलो-जान से जुड़े हैं पर सबसे पहले और सबसे ऊपर एक हसीन इंसान हैं जिनके पास दोस्ती और प्यार की हज़ारों कहानियां हैं । उन्हें मिलने आये एक और दोस्त भी इसी तस्वीर में हैं @सतनाम सिंह जिनसे मैं पहली बार मिला। सतनाम जी जाने माने गायक हैं जो पंजाबी लोकगीत के साथ साथ दिल हिला देने वाली नात भी पढ़ते हैं । हमारी दोस्तियां ही कुछ ऐसी हैं हम जहाँ जाते हैं एक क़िताब ले आते हैं या एक क़िताब दे आते हैं। कुलवंत कौर संधू जी द्वारा संकलित इस किताब में करीब दो सौ पंजाबी लोक गीत हैं जिनमे गीतों के साथ टप्पे, घोड़ियाँ, सुहाग, सेहरे, गिद्धे, बोलियाँ और भाई-बहिन के प्यार के गीत भी हैं। ये क्या कम है की कनॉट प्लेस के कॉरिडोर में सतनाम ने हमे पंजाबी गाना सुनाया।
Satnam Singh singer, Ali Usman Bajwa and moi at Sandoz restaurant, Connaught Place
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