अपने दिल का खालीपन मैं कमरे में छोड़ आता हूँ
अब कमरा खालीपन से भर गया है
जैसे पहाड़ में गढे मौन से भरे होते हैं।
This, that, and all between.
Whatever I thought was a verse
अपने दिल का खालीपन मैं कमरे में छोड़ आता हूँ
अब कमरा खालीपन से भर गया है
जैसे पहाड़ में गढे मौन से भरे होते हैं।
Will you show me the city?
For one last time, please!
but before that, let us
change our boots,
the gravel knows our smell.
Sunshine lied.
It wasn’t a cloud
that stole my sun.
अच्छा लगता है पहाड़ में जब
बादल, कोहरा या नीहार
कमरे और घर-आँगन में चले आते हैं
अपना घर समझ कर ।
शहर में बादल
घर के ऊपर से गुज़र जाता है
अनजान मुसाफिर सा
या फिर निःशब्द घूरता है दूर से
और कोहरा खड़ा रहता है घर के बाहर
नाराज़ बड़े भाई सा
शहर में ओस पत्तों से टपकती है
पहाड़ उसे दरारों में संजो लेते है ।
शहर बिसरा बैठे है
बादल, कोहरे और ओस से दोस्ती
चलो पहाड़ चलें
महीन धुंध वहाँ मुझे ढूंढ रही है .
i print darkness
in patches of sun
to escape shadows of broken dreams
You must be logged in to post a comment.