Sunshine lied.
It wasn’t a cloud
that stole my sun.
Category: Poetry
Whatever I thought was a verse
पहाड़ में जब
अच्छा लगता है पहाड़ में जब
बादल, कोहरा या नीहार
कमरे और घर-आँगन में चले आते हैं
अपना घर समझ कर ।
शहर में बादल
घर के ऊपर से गुज़र जाता है
अनजान मुसाफिर सा
या फिर निःशब्द घूरता है दूर से
और कोहरा खड़ा रहता है घर के बाहर
नाराज़ बड़े भाई सा
शहर में ओस पत्तों से टपकती है
पहाड़ उसे दरारों में संजो लेते है ।
शहर बिसरा बैठे है
बादल, कोहरे और ओस से दोस्ती
चलो पहाड़ चलें
महीन धुंध वहाँ मुझे ढूंढ रही है .
darkness
i print darkness
in patches of sun
to escape shadows of broken dreams
Lusty dream
in the shutdown mode
life discovered an unsaved version
of a lusty dream.
बसंत और संत
पांचवें दिन गिर जाती हैं
गुलाब की पंखुड़ियां
सातवें दिन, गुलाबी प्रेम .
बस रंगीनियों और रंगों में कुछ फ़र्क़ होता है – वैसे
बसंत और संत (वलनतीन) एक जैसा ही लगता है
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