मास्टरानी आजकल रज़ाई में लेटे लेटे ही क्लास लेती हैं। पढ़ने और समझने में ये बड़ी बड़ी किताबें तो ब्लैक्बोर्ड से भी बढ़िया काम करती हैं, क्योंकि इन्हें माँ बिना चश्मे के पढ़ लेती हैं और इनमें बनी तस्वीरों में वो गहराई होती हैं, जो किसी आम कहानी में नहीं मिलती। अंतर्ध्यान हो और आँखें बंद रख कर ही पूरा पाठ का व्याख्यान कर दिया जाता है, जैसे माँ किसी अनकही दुनिया में चली गई हों। और अगर उनकी पसंदीदा एक्लेवय की किताबें हों तो कविताएं और जंगल से जुड़ी लोक कथाएं भी साथ में सुनने को मिल जाती हैं। उनके अपने बचपन से जुड़े कुछ किस्से इतने मजेदार होते हैं कि सब आँखें बंद कर खुद उस कहानी का हिस्सा बन जाते हैं। मुश्किल तो बस क्लास में आए मेरे या रजनी जैसे नए बच्चों की है जिन्हें बिना गलती किए भी एक ही पाठ को बार बार दोहराना पड़ता है और माँ इस सब का मज़ा लेती हैं। इस बार आई किताबों में ‘हाथी के बच्चे’ को माँ ने ‘गोल्डन बुक अवॉर्ड’ से नवाज़ा है। माँ पुरानी मास्टरानी रही हैं, जो अच्छी किताबों और शरारती शागिर्दों को दूर से पहचान लेती हैं । ये तस्वीर कल रात की ‘एक्स्ट्रा क्लास’ की है, लगता है आज, 26 जनवरी को, जब सब की छुट्टी होगी हमारी क्लास तो ज़रूर लगेगी । @Eklavya
जब किसी चीज या जगह को ज़ोर जबरदस्ती, रगड़-रगड़ कर चमका दिया जाता है तो उस पर कुछ वक़्त के लिए चमक तो आ जाती है पर उसकी असल खूबसूरती बिगड़ जाती है। प्रगति मैदान में हर बरस होने वाले किताब मेले का इस बार कुछ ऐसा ही हाल है भारत मड्डपम के पाँच हाल में लगा ये मेला बिल्कुल अस्पताल के सैनिटाइज़ेड वार्ड जैसा लगता है जहां हर मज़मून, हर स्टॉल, हर चीज़, हर दूसरा नज़रिया या नापसंदीदा किताब व सब्जेक्ट को मशीनी तरीके और तीसरी आँख से ना सिर्फ एक्स-रे किया गया है पर कोशिश कर बरखासत कर दिया गया है।
मेले में कदम रखते ही अगर आपको किताबों की वो खास गंध ना आए तो सब कुछ अधूरा लगता है। हवा में घुली वो पुराने कागज़ की महक, किरोसीन में मिली स्याही की वो भभक, अरारूट और मैदे वाली लेई की अचार जैसी बास, मोटी जिल्द के गीले गत्ते पर चिपके गीले कपड़े की बू और जाने क्या क्या ऐसा होता है जो आपकी नाक, आँख, कान, गले, और बाकी सभी इंद्रियों को बेचैन कर देता है। साथ साथ होती है हर किताब खरीदने की उंगलियों की लपलपाहट, चाहे कंधे बोझा ढो कर मर ही क्यों ना गए हों। किताबों के स्टालों के गलियारे पार करते करते जब पैर थक जाते थे तो जूट के कालीन पर कहीं भी बैठ कर चाय वाले भैया की इंतज़ार करना प्रेमिका के इंतज़ार से भी ज्यादा दुख दाई होता था पर वो आ जाते थे अपनी मीठी, काली चाय लिए बिल्कुल नारद जी से, कहीं से प्रकट हो जाते थे। पर ये सब कभी हुआ करता था, वो जमाने और थे, वक़्त ठहर हुआ था, किताबों में दूसरों से नफरत करना नहीं सिखाया जाता था, इतिहास मनमानी से नहीं लिखा जाता था और किताब के मेले में किताब ही मिलती थी माला या मूर्तियाँ नहीं ।
आज मेले में एक तरफ से हाल में दाखिल होते ही आपका आमना-सामना होता है काला चश्मा लगाये, वर्दी पहने, बंदूक धारी फौजी से जिसके दायें हाथ पर तिरंगा लिए एक फौजी टुकड़ी किसी इलाके में विजय नाद कर आगे बढ़ रही है। आपकी सुरक्षा या देख रेख के लिए ये दिल्ली पुलिस नहीं फ़ौज है। एक बारगी तो शुबा होता है आप किताब मेले में हैं या सुरक्षा मेले में। थोड़ी दूर चलो तो एक पूरी दीवार पर कुछ महीनों पहले हुए ऑपरेशन सिंदूर का पुरा ब्योरा मिल जाता है थोड़ी दूर और चलो तो सेना के तीनों कमान के साधन, सवारी और शस्त्र भी दिख जाते हैं । बख्तरबंद गाड़ी, अर्जुन मेन बैटल टैंक, युद्ध पोत और लड़ाकू जहाज – सब एक बड़े से चौबारे में रखे गयें हैं जिसकी दीवारों में शहीदों की तस्वीरें इज्ज़त और मान से एक कतार में लगाई गई हैं । यहाँ पहाड़ी फतेह करते और झण्डा गाड़ते जवानों की टुकड़ी की प्रतिमा भी है जिसमें एक सिख जवान भी है। इस प्रतिमा के सामने खड़े हैं बी एस एफ और गुरखा सेना के असली जवान।
अब इन सब से नजर हटे तो आदमी किताब भी देखे। लकड़ी की दीवारों के पीछे से किसी कॅफे कॉफी डे टाइप की अमेरिकानों या केपूचीनो कॉफी की महक आपको बुला रही है और आप बेमने से उस तरफ चल देते हैं क्यूंकी मेले में चाय तो मिल नही रही, अब निकालिए दो सौ रुपये जो बाशोम के हाइकु की किताब खरीदने के लिए बचा रखे थे। मन ही मन गिनती हो रही है कितने पैसे जेब में बचे हैं। एक प्रिय दोस्त ने कल ही बताया की कैसे वो साल-दर-साल दस बीस हजार रुपये इकठे कर किताबें खरीद ले जाते थे। मैं आसमाँ को देखने के लिए सर उठता हूँ तो हाल के ऊपर लगी गंदी काली छत देख मुझे यकीन हो जाता है कि अगर भगवान है भी तो वो इस छत के परे तो मेरी नहीं सुनेगा और मेरे पास कभी किताबें खरीदने के लिए एक मुश्त बीस हजार रुपए नहीं होंगे। हालंकी अब में अपनी पसंद की बहुत सारी किताबें खरीद पाता हूँ पर मुझे वो दिन कभी नहीं भूलते जब जब किताब मेला पंद्रह दिन का होता था और हम पूरे पंद्रह रोज़ अलग अलग स्टॉल के सामने बैठ कर किताबों को भारी दिल से निहारते और कुछ रेट लिस्ट बटोर शाम घर लौट जाते थे।
मेला और आस पास अब पहले से साफ है, दिखता भी वैसा ही है। टॉयलेट साफ। घास का मैदान साफ। बहुत कुछ साफ हो चुका है। पाठक साफ, बच्चे साफ, युवाओं की जेब से पैसे साफ, प्रकाशकों का दिया जाने वाला 50 पर्सेन्ट डिस्काउंट साफ, स्कूली बच्चों की कतारें साफ, सस्ते खाने और चाय की दुकानें साफ, नामचीन अन्तराष्ट्रीय प्रकाशक साफ। छोड़िए भी, अब इस से ज़्यादा सफ़ाई क्या हो सकती है।
क्या हुआ जो वो किताब खरीद नहीं पा रहे, देखिए ना कितने बच्चे किताबों के सामने रील बना रहें है, कितने सारे सेल्फ़ी पॉइंट बनाएं हैं मेल अधिकारियों ने। देखिए ना कितने तिरंगे लहरा रहे हैं, जोश है, वंदे मातरम है और हैं महामहिम की बड़ी बड़ी तस्वीरें और बैनर जो हमे शिक्षा और देश प्रेम का संदेश दे रहें हैं। देखिए ना कितने लेखक अपना इंटरव्यू लिए जाने का इंतज़ार कर रहे हैं और इसका कि कोई पाठक आ कर उनसे किताब पर साइन करवा ले, सेल्फ़ी खींच ले।
देख कर बहुत अच्छा लगता है कि पिछले कुछ सालों से हिन्दी भाषा का बढ़ता दबदबा है । काश उतनी विशिष्ट और बड़ी जगह में कभी उर्दू और पंजाबी भी देखने को मिले। इन ज़बानों के प्रकाशकों को भी ज्यादा तादाद में मेले में भाग लेना चाहिए। मेरा मानना है की पढ़ना उतना ही ज़रूरी है जितनी अच्छी खुराक और अच्छी सेहत। हर बार की तरह इस बार भी मेले में खूब घूम घूम कर थक गया पर पूरी तरह थकने से पहले अपने खास स्टॉल को ढूंढ ही लिया ।
मेले में एक पड़ाव ऐसा होता है जहां बस ठहर जाने को मन करता है। और, जहां बेहतरीन किताबों के साथ साथ ऐसी सुंदर किताबों को बनाने वालों से भी मिलना हो जाता है। किताबों के मामले में मेरा ‘मन तो बच्चा है जी’। बचपन में बेहतरीन, रोचक और सुंदर छपाई वाली रूसी किताबों से प्यार था बड़े होते होते रूसी किताबें खो गईं और उनकी जगह ले ली ‘इकतारा’ की किताबों ने ले ली। इकतारा की किताबें और वो स्टॉल सब थकान हर लेता है। मेरे लिए वहाँ किताबें इतनी मज़ेदार हैं की मैं उन्हें खा सकता हूँ। आलथी-पालथी मार कर बैठ जाता हूँ, मेरी खस्ता हालत देख कर कोई ना कोई दोस्त चाय ला ही देता है। एक एक कर सब नई किताबें उठा वहीं पढ़ लेता हूँ और खरीदने के लिए थैला भर लेता हूँ। इस बार भी वही किया। इस बार एक किताब हाथ लगी तो 200 रुपए वाली कॉफी पीने का मलाल नहीं हुआ। बाशोम के हाइकु वाली किताब नहीं मिली पर हिन्दी के हाइकु की किताब “अरे!” मिल गई। मेरे पास ही अपने चहेते पाठकों के बीच बैठे थे हिमांशु व्यास, “अरे!” के हसीन लेखक। क्या मुस्कान थी उनके चेहरे पर, क्या प्यार था उनकी आँखों में और कितनी मिठास थी हिमांशु जी के लहज़े में । मैंने भी मौके का फायदा उठा कर उन से उनकी किताब पर कुछ लिखने को कह दिया। हाय हाय, एक तीर सा हाइकु मिल गया मुझे, सिर्फ मेरा हाइकु, जो दुनिया के किसी पाठक के पास नहीं है, हो ही नहीं सकता और फिर उसमे हम दोनों का नाम जुड़ा है । सलाम हिमांशु जी और शुक्रिया। एक गलती हो गई – हिमांशु जी के साथ तस्वीर नहीं ली, ऐसा ही होता है हर अच्छे लेखक की औरा ही ऐसी होती है कि सब कुछ भूल जाता है (औरा यानि प्रभामण्डल- वो रोशनी जो सर के पीछे गोल गोल घूमती दिखाई पड़ती है)।
‘इकतारा’ की किताबों और मैगज़ीन ‘साईकल’ और ‘प्लूटो’ को लोग बच्चों की किताबें बताते हैं, मेरी बात मानिए ये सरासर गलत है, ये बड़ों के साथ नाइंसाफी है हमारे ऊपर किया जा रहा ज़ुल्म है। अगर आपको अपने भीतर का, अपने मन और दिल का बचपन बचा के रखना हैं, अपने अंदर बसे उस बच्चे को फिर से जगाना है तो इकतारा की हर किताब को खरीदिए और पढिए, ना सिर्फ खुद पढिए बल्कि अपनी बिरादरी, दोस्ती-यारी और आस पड़ोस में भी सब को ले कर दीजिए, छोटे बच्चों को पढ़ कर सुनाईए। बात ज्ञान की नहीं है दोस्त बात अपने भीतर सोये इंसान को जगाने की है, अच्छाई को देखने की है, प्रेम और भाईचारे की है जो इकतारा की किताबों में भरा है।
इस बार के किताब मेले (2026) में एक प्यारा कोना ऐसा भी है जहां से आप अपने चहेतों को चिट्ठी भेज सकते हैं। अभी इसकी ज़िम्मेवारी खवाब तन्हा कलेक्टिव के शिराज हुसैन ने संभाली हुई है हालांकि ये काम डाक विभाग का होना चाहिए था। शिराज ने ना सिर्फ अपने हाथ से बनाया लेटर बॉक्स लगा रखा है वो आपको एक खूबसूरत रंगीन पोस्टकार्ड और उस पर लगी टिकट भी मुफ़्त देंगे, जी हाँ ठीक पढ़ा आपने “मुफ़्त” यानि FREE. मेले के हाल नंबर 2 में राजकमल प्रकाशन के स्टॉल पर आपको मुसकुराते हुए शिराज मिल जाएंगे जो ना सिर्फ ऐसे कई पुण्य के काम करते हैं बल्कि पहुंचे हुए आर्टिस्ट और कलिग्रफर भी हैं। इनके बनाए कैलंडर, पोस्टर, पोस्टकार्ड, बुकमार्क, और बहुत कुछ वहाँ देखने और खरीदने को मिल जाएगा दुनिया में अब ऐसे इंसान कम रह गए हैं। जल्दी करिए इन्हें मिल लीजिए और अपने घर वालों, दोस्तों, या आशिक – माशूक को याद कर एक चिट्ठी लिख ही डालिए। स्टॉल P-01 हॉल 2-3, मंडपम, मेले में। आखिरी डाक 18 तारीख तक । तस्वीर में लेटर बाक्स के साथ शिराज और राज ।
किताब मेल जैसा भी है अच्छा है, किसी मॉल में घूमने से तो लाख दर्जे बेहतर । सिर्फ 18 जनवरी तक है, आज ही जाएं । साल के ये वो दस दिन हैं जब मैं सब कुछ त्याग कर किताब मेले में चौबीस घंटे बैठ और घूम सकता हूँ। अभी की दोस्तों ने दूसरे शहरों से आना है मैं तो आत ही रहूँगा ।
कल रात (29 दिसम्बर) का नागिन डांस । कोहरे के बीच आस पास से गुजरती गाड़ियों की बतियों का तांडव और पेड़ के पीछे छिपी गली की स्ट्रीटलाइट से आँख मिचौली खेलता धुआँ ।
नींद भी क्या नेमत है जिसके लिए दुनिया में करोड़ों लोग तरसते हैं, लाखों लोग इलाज करवा दवाइयाँ खाते हैं और जाने कितने हज़ारों रात रात भर बिस्तर पर सर पटकते थक जाते हैं पर सो नहीं पाते। और फिर मिथकों में कुम्भकरण जैसे भी हैं जो ब्रह्मा के श्राप से छह महीनों तक गहरी नीदं में रहते थे। या फिर यूरोपीय मिथक में सम्राट स्टेफेन और रानी लिआ: की बेटी अरोरा, जो स्लीपिंग ब्यूटी नामक कहानी से जानी जाती है, उन्हें भी श्राप था की वो सौ बरस तक सोती ही रहेंगी। ऐसा क्यों है के जहाँ कुछ लोग बिलकुल सो नहीं पाते वहाँ कुछ लोग लम्बी तान के दिनों-दिन सो सकते हैं। कौन हैं ऐसे नसीबवर जिन्हे निंदिया के उड़न खटोले का अपार आनंद मिलता है। माँ को ये उड़न खटोला और निंदिया का ख़जाना मिल गया है। माँ अब ज्यादा समय सोती है, दिन हो या रात। कोई ख़ुमारी नहीं, ना ही तबियत में कोई बदलाव है पर फिर भी नींद उन्हें घेरे रहती है। आँखें भारी, गला रुँधा, आवाज़ दबी, बीच बीच में उबासी और निद्राग्रस्त आलस । वज़ह शायद मौसम हो सकता है, जो बदल रहा है। बाहर हवा ठंडी हो चली है, दिन छोटे हो गए हैं, अँधेरा जल्दी हो जाता है पर इस सब का माँ की नींद से क्या रिश्ता है मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। पहले तो दिन के वक़्त कभी किताब पढ़ लेती थीं, कभी भजन गुनगुना लेती थीं या फिर अपने भाई या बहनों से फ़ोन पे बात कर लेती थीं पर अब वो भी नहीं होता। यहां तक कि जब शाम के वक़्त टीवी चालू भी होता है तब भी वो ऊँघ रही होती हैं, जब कि हम एक ही कमरे में बैठे होते हैं तब भी वह आंखें बंद कर लेती है और सो जाती है। डॉक्टर बताते हैं कि इसका कारण कोई बिमारी या दवाइयाँ तो नहीं है क्यूंकि उनकी सेहत अब पहले से कहीं बेहतर है। क्यूंकि माँ बिना मदद के चल नहीं पाती और सीढ़ियां नहीं चढ़-उतर पाती तो उनका घर के बाहर आना जाना भी काफी आरसे से मुमकिन नहीं हुआ। बीच बीच में हम लोगो उन्हें जबरदस्ती से बाहर आँगन में ला कर धूप में बिठला देते हैं पर जैसे ही सूर्य महाशय जगह बदलते हैं और गर्माहट कम होती है तो माँ भी वहां से खिसक लेती हैं। पिछले बरस तक धूप में बैठ कर मूली, मूंगफली, बेर और गुड़ मज़े से खाती थीं अब उस सब का शौक़ भी नहीं रहा। दोपहर को बस खाना खाने के लिए उठती भर हैं और फिर से बिस्तर। वो दुबला शरीर रज़ाई का वज़न भी कैसे सहता होगा ? सर्दियाँ शुरू हो गई हैं इसलिए वह सुबह देर तक बिस्तर पर रहती है, देर से उठती है और 9.30 बजे तक ही चाय पीने को कमरे से बाहर आती हैं। जिसके बाद वह फिर से बिस्तर पर लेट, रज़ाई लपेट और आंखें बंद करके सो जाती है। मैं सोचता हूँ इतनी देर कोई कैसे सो सकता है पर शायद इस उम्र में ऐसे ही होता होगा। दो-एक घंटे बाद नहाने के लिए तभी जाती है अगर उनका मन होता है। ज्यादातर वो अलसाई सी रहती हैं। पिछले हफ्ते वह पांच दिन बाद नहाई थी। इसके बाद स्वेटर पहना कर उन्हें शॉल ओढ़ा दी जाती है। अभी टोपी नहीं निकली है तो शाल से ही सर को ढक लेती हैं। नहाने के बाद चाय का एक दौर ऐसा चलता है जिसमे चाय पीते पीते वो झपकी ले रही होती हैं और हमे डर लगता है कि चाय की कटोरी समेत झुक कर वो मेज़ से ना टकरा जाएँ। मां की बिगड़ती सेहत के चलते एक अरसे से घर की हर छोटी बड़ी बात उनके चारों ओर घूमती है, वो धुर्री हैं हम सब फ़िरकी। मसलन सुबह की चाय तब बनेगी जब माँ उठेंगी, नाश्ता तब बनेगा या परोस जाएगा जब माँ हाथ-मुंह धो कर ताजा तैयार हो जाएँगी, दोपहर का खाना तब टेबल पर लगेगा जब उनका मन होगा, जो कि कभी-कभी शाम चार बजे तक टल जाता है। शाम की चाय, टीवी का चैनल, दरवाज़ा बंद रहेगा या खुला, पंखा धीमे या तेज़, परदे खुले रहेंगे या ढके, कब कोई बाहर जा सकता है और कहाँ, वग़ैरह वग़ैरह सब माँ के हिसाब से चलता है। अगर वो सो रही हों तो आजकल उनके कमरे के अंदर और बाहर डाइनिंग रूम में साफ सफाई नहीं की जाती, रसोई में बर्तन धोने के लिए दरवाजा बंद कर दिए जाते हैं – मिक्सर ग्राइंडर नहीं चलाया जाता, किसी भी तरह से कोई शोर नहीं हो सकता या तेज आवाज में बोला नहीं जाता, सिर्फ इसलिए कि कहीं माँ की नींद में ख़लल ना पड़े। हम उनके कमरे का दरवाजा बंद नहीं कर सकते, इससे वो नाराज़ हो जाती हैं। अगर दरवाज़ा सरका कर आप अंदर झाँक लें और वो जाग रही हों तो पूछ लेती हैं, “क्या चाहिए?” उनके कमरे के बाहर कुछ हलचल हो तो वो पूछती हैं, “कौन है?”। आजकल ये दो हर्फ़ उनका तकिया कलाम हैं। ‘कौन है’ का उन्हें पूरा और साफ जवाब चाहिए होता है, कुछ भी कह कर आप उन्हें टाल नहीं सकते। वो शख़्स कौन है, उसका नाम क्या है वो बाहर क्या कर रहा है, घर में क्यों आया है – ये सब उन्हें तफ़सील से जानना होता है। फ़िर उसके बाद वो ही, उनकी प्यारी निंदिया का उड़न खटोला निकल पड़ता है। कुछ दिन पहले देर रात अपने बिस्तर के दूसरी तरफ इशारा करते हुए माँ ने पूछा, “यहां किस ने सोना है?” रजनी ने जवाब में पूछ लिया “पर क्यों?” अब उनका जवाब सुनिए, “पता होना चाहिए ना कि यहां कौन सो रहा है, ताकि उस हिसाब से हम अपना मूड बनाएं।” इसका क्या जवाब देगा कोई। कल उनकी बड़ी बहन सरला का फ़ोन आया सो मैंने मासी को बताया कि माँ सो रही हैं, फिर भी मैंने माँ को उठा दिया और कहा कि वो बात कर लें । अब अपनी बड़ी बहन से उनका जो वार्तालाप हुआ आप ही सुन लीजिये। “अगर सोऊँ नहीं तो और मैं क्या करूं? क्यूँ दिन भर बैठूं? मैंने किसी का कोई कर्ज देना है क्या? क्यूँ राम-राम बोलूं, वो राम क्या देगा मुझे? उसके बिना भी अच्छी मौत आएगी मुझे, हाँ । नहीं, मुझे नहीं पढ़ना कुछ, होर की। रामायण, भागवत सब पढ़ लिया है, कई बार, कुझ खास नहीं मिला मुझे उनमे ।” दूसरी तरफ से क्या सवाल हो रहे होंगे इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं। आराम-तलबी हो तो ऐसी हो जो सब से बेपरवाह हो, भाई, बहन, बेटा, बहु या फिर किताबों के भगवान ही क्यों न हों । मुझे याद आ रहा है: किस किस को याद कीजिये किस किस को रोइये, आराम बड़ी चीज़ है मुँह ढक के सोईये वैसे आराम-तलबी से बढ़िया हो भी क्या सकता है। तनाव को ख़ारिज करने की सबसे बढ़िया दवा है आराम। बीच बीच में उनकी नींद के बारे में सोच मुझे रश्क़ भी होता है, क़ाश मैं भी इतनी मस्ती में सो सकता, दिन भर नहीं तो दो चार घंटे ही सही। ये कमबख़्त काम कोई और कर ले, मुझे छुटी मिले, में भी पहाड़ पे जा किसी बुगियाल की नरम घास पे वो गुलज़ार साहेब वाली “पीली धूप” में सो सकूँ, शायद मुझे भी उसके छपाक से गिरने की आवाज़ सुनाई दे जाए। माँ अध-सोइ अध-जगी आँखों से बातें भी कर लेती हैं, सपने भी देख लेती हैं और बवक़्त लाहौर में अपने बचपन के घर भी घूम आती हैं। दोस्तों से मिल आती हैं, “कोकिला छपाकि जुम्मे रात आई जे” खेल आती हैं, अपनी नानी से झंग जा कर मिल भी आती हैं। पिछले दिनों अपनी छोटी बहन रानी से नींद में बाते करतें कह रहीं थी “आजकल मैं लाहौर आयी हुई हूँ।” ये सुनकर मैं तो कुर्सी से गिरने वाला था। लेटे हुए अगर उनकी गर्दन दाईं तरफ़ घूमी हो तो अपने कमरे के बाहर आने-जाने वाले दो बाशिंदो पे नज़र रखे होती हैं और अगर वो ही गर्दन बायीं तरफ़ हो तो सामने लगी सुब्रोतो मंडल की पेंटिंग से सीक्रेट गुफ्तगू कर रही होती हैं। सुब्रोतो मंडल की वो पेंटिंग एक जवां शख्स का पोर्ट्रेट है, कुछ कुछ चरवाहा, भैंस चराने वाला, ग्वाला, घुमक्कड़ सा, साँवला, गबरू। उसके बायें हाथ में लम्बी सी बांसुरी है और उसी हाथ की कलाई में ताम्बे का कंगन झूल रहा है। रंगीन सा दिखने वाले जंगल में वो एक पेड़ के साथ सटा खड़ा है, उसके सर पे सावे रंग का साफ़ा बंधा है जिस से काले, घुंघराले बालों की दो लटें सांप सी बल खा रही हैं, कन्धों से लटका हल्दी से पीले रंग का अंगोछा उसके सामने झूल रहा है। डिबिया नुमा एक तावीज़ उसके गले में लटका है और दूसरा उसके दाहिने बाजू पे बंधा है। उसके माथे पे छोटा सा काला टीका है लगता है उसकी माँ ने सुबह ही उसकी नज़र उतारी होगी। उसका बदन नीला है और गज़ब नशीली आँखें हैं। आर्टिस्ट ने उस पेंटिंग का टाइटल “कृष्ण” दिया था। मैंने जब उसे पहली बार देखा था तो मुझे उसमे सिर्फ और सिर्फ राँझा दिखा था। वारिस शाह का राँझा, तख़्त हज़ारे का राँझा। पेंटिंग के उस नज़ारे को देख कुछ ऐसा महसूस हुआ था की वहीँ कहीं पेड़ों के झुरमट के परे चनाब दरया का किनारा होगा जिसके परे रांझे की हीर मिट्टी का घड़ा पकडे उसे मिलने का इंतज़ार कर रही होगी। ख़रीदने के बाद मेरे लिए वो पेंटिंग रांझा हो गयी थी और मैं उसे देख वारिस शाह को याद करता, उस प्रेम कहानी को दोहरा भैरवी में हीर के कुछ टुकड़े गुनगुना लेता था। इस बात पर माँ और मैं कई बार बहस कर चुके हैं पर उन्हें उसमे अपना बांसुरी वाला कृष्ण-कन्हैया ही दिखता है चाहे उसके सर पे मोर पंख हो या न हो । शायद नींद में माँ अपने कृष्ण की बांसुरी भी सुन लेती हों तभी मंत्र मुग्ध हो सोती रहती हैं। माँ के कृष्ण माखन चोर बाल गोपाल से ले कर वृन्दावन के कुंज विहारी और गोपियों के रास रचैया तक आ कर रुक जाते हैं। इसके बाद के कृष्ण से माँ का कोई वास्ता नहीं है। महाभारत के कृष्ण जो ‘यदा यदा ही धर्मस्या’ का उपदेश देते हैं वो माँ के लिए कभी नहीं थे, वो युद्ध, वो मार काट और कृष्ण का पक्षपात माँ के मिथक का हिस्सा नहीं हैं। माँ ने धर्म की बहुत सी लड़ाइयां देखी हैं, धर्म को उन्मादियों के हाथ जीतते और धर्म को इंसान के हाथ हारते हुए भी देखा है। धर्म के नाम पर दंगे, आगज़नी, हिंसा, मार-काट और बटवारें उनके बचपन से माँ के साथ रहे हैं। तक़सीम की उन यादों और भयावय तस्वीरों से निजात पा लेना उनके लिए नामुमकिन था। इसी कारण हँसते-खेलते, रास करते, बांसुरी बजाते कृष्ण ही उनके इष्ट रहे। पहले माँ मुँह ढक के सोती थीं, रज़ाई या चादर पूरे चेहरे को अंदर समेटे, जाने सांस कैसे लेती थीं। पर अब, अब ऐसा नहीं करती सर्दी में भी रज़ाई ठुड्डी से नीचे ही रहती है। बाजु अंदर, होंठ हल्के से खुले, पीछे को खींचे सिमटे बाल, कंधे समतल और वो बिलकुल सीधी लेटती। मेरी तरह दायें, बाएं, या पेट के बल नहीं। रात भर हिलती भी नहीं हैं। हर रोज़ नहीं पर कभी कभी खर्राटे भी लेती हैं, ज़ोर से । उनके कमरे में लगा कैमरा बताता है की रात में एक दो बार उठती हैं और अपनी नन्हीं सी प्लास्टिक की बोतल से पानी पी कर फिर सो जाती हैं। पहले उनकी नींद बहुत कच्ची थी ‘ज़रा से आहट’ वाली, चौकन्नी। मैंने कई बार सोचा ऐसे कैसे पूरी होती होगी इनकी नींद। सुबह भी छह बजे उठ खड़ी होती थीं, हाँ पिछले दस बारह सालों में दोपहर को झपकी ले लेती थीं, “खाना-खाने के बाद मुझे अक़्सर नींद आ जाती है”, ऐसा कह वो अपनी झेंप छुपा लेती हैं। कच्ची रही हो या पक्की दिन की हो या रात की, माँ को नींद तो प्यारी थी, हमेशा। हमारी तरह वो देर रात तक जाग नहीं सकती थीं, ना अब ना पहले। हमारे बचपन में भी सोये बिना उनका गुज़र नहीं था। घर भर का सार काम, बच्चों की देख भाल और उनके लफड़े, बिरादरी और रिश्तेदारों से निपटना और तंगहाली में घर चलाने आदि से माँ थक तो जाती ही होंगी।और फिर वो ज़िन्दगी ही क्या कि इंसान चैन से सो भी ना सके। साइंसदाँ बताते हैं कि जब हम सो रहे होते हैं और गहरी नींद में होते हैं तब हॉर्मोन हमारे शरीर को दुरुस्त करते हैं और हमारे जिस्म में नई ऊर्जा भर देते हैं जिसके बाद उठने पर हमे ताज़गी और ख़ुशी महसूस होती है। दिमाग़ी कश-मक़श से परे नींद तनाव को सोख लेती है। इस खोज का लुब्ब-ए-लुबाब ये है कि एक रात की नींद पूरी कर लेने पर इंसान सुबह खा पी कर फिर से सोने की तैयारी कर सकता है। “मैं सोती हूँ तो इसमें हर्ज़ा क्या है, हैं?” माँ पूछती है। “तुम लोग परेशान क्यूँ होते हो?” कहते कहते फिर से वो निंदिया के उड़न खटोले में परवाज़ ले लेती है। मुझे कुंदन लाल सहगल की गाई लोरी याद आती है ‘सो जा राजकुमारी सो……जा’
Leo Tolstoy – fiddling with the book in her hands she stares blankly at the window across her as I mention the name hoping that she would be able to recall ‘War and Peace’ or any other work by the great novelist. She had read the Hindi translation of the masterpiece when we were very young, later all of us read both the English and Hindi translations. Today, the name didn’t ring any bells. Recalling and going back in time is an effort for Ma unless it is something to do with her childhood. I said, ‘today you look like Tolstoy without a beard and with a new cap’ – she blushed.
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