अपने अंदर रह रहे किसी किरदार की तरह उदयन जी का ये उपन्यास करीब चार बरस तक मुझ से परे, अनजान सा बैठा रहा। फिर एक रोज़ रू-ब-रू होते ही कहानी ने सब उंडेल दिया – प्यार, उलाहने, उम्मीदें, शिकायतें और सपने भी। हम भी किसी सिनेमा सा सुनते और देखते चले गए, बिना इंटरवल के। अब दुख ये है कि क़यास को चार साल पढ़ा क्यों नहीं । भरपाई यूं होगी कि उदयन जी का लिखा सब पढ़ना होगा। ब-वक़्त ऐसे बेहतरीन लेखक और उनका शांत-उजला लेखन मेरी पकड़ से इस लिए भी दूर रहता है कि मैं उसके लिए अपनी समझ तैयार कर लूँ। अगर आप ऐसी कहानियाँ पसंद करते हैं जो बहुत शोर-शराबे वाली न होकर शांत और सोचने पर मजबूर करने वाली हों, तो ‘क़यास’ आपको जरूर पढ़नी चाहिए।
‘क़यास’ हिंदी लेखन की बेहतरीन कलात्मक रचना है जो चुप्पी में घुट रहे इंसानी रिश्तों को सादगी से पेश करती है। कहानी ‘सुदीप्त’ के इर्द-गिर्द घूमती है, जो किसी छोटे से शहर में आ कर किसी पुरानी, बंद पड़ी लाइब्रेरी को फिर से जीवित करता है। कहानी की शुरुआत में ही सुदीप्त की हत्या हो जाने के बवजूद कहानी अपने शांत रौ में बहती रहती है जिसके बाद कहानी का हर किरदार सुदीप्त की हत्या के कारण या हत्यारे के बारे में ‘क़यास’ (अनुमान) ही लगाता रहता है। पूरी कहानी सुदीप्त से जुड़े अलग-अलग लोगों—उसकी पत्नी मृदुला, नौकर लखना, बेटी नुहा और मित्र वंदना—के मन में उठने वाले ऊहापोह, शक, और उनके अपने ‘अंदाजों’ के ज़रिए आगे बढ़ती है। कोई जासूसी कहानी न हो कर ये इंसान की महीन ज़ेहनी परतों में छुपे अपने-अपने क़ातिल को बेनाक़ाब करने में कामयाब होती है। सुदीप्त की हत्या के इर्द-गिर्द बुनी गई ये कहानी कातिल को खोजने के बजाय, उसके करीबियों के मन में उठने वाले ‘अनुमानों’ पर केंद्रित है। उदयन जी कहानी में भी कविता की ले और रस ले आते हैं । छोटे-छोटे अध्याय कहानी में आने वाले अगले मोड के इंतज़ार में पाठक की दिलचस्पी बनाए रखते हैं। अपने-अपने अंदरूनी डरों का आईना साथ ले कर चलता हर किरदार दूसरों के बारे में बनाई राय की विफलता से जूझता नज़र आता है।
