Windermere Theatre Festival & Awards

​More like a crowd following Mahatma Gandhi on a march, or dancing figurines, or the characters of a busy play, or the agitating masses on the street. But no, it is none of those. A beam of spotlight created this stippled-shadow image of award trophies on a dark LED screen just before the start of the Closing Ceremony of an amazingly fulfilling theatre festival. Awaiting the award winners, these cold, dark souls had yet to find warm hands and sparkling mantel shelves. The lawns were still being readied, Bacchus had still to land on the bar, promo slides had still to be projected, ‘Hello Mic Testing’ was still echoing, while the guitar lay abandoned like a ditched, heartbroken lover. Amid all this the bright red carpet knew it was going to be a long night of celebrations. Cheers to all those who participated in the Windermere Theatre Festival & Awards and special shout-out to the winners. This one is specially for Dr Brijeshwar Singh and Prabhat Kumar.

23 February – 1 March, Bareilly, Uttar Pradesh, India

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Dali in Delhi

Dali should have stayed back for Valentine’s 

​Salvador Dali’s ‘Argillet Collection’ show, at the Habitat Centre Delhi, would have been an ideal venue for a Valentine’s Date but sigh, now you have missed it. Dali was a Spanish surrealist artist known for his bizarre images.

It was an eye-popping collection of over 200 of his original sketches, etchings and watercolour paintings which included some very fine pieces bordering erotic art with human bodies squirting or sprouting flowers from their heads and thighs; eyeballs dancing in squiggles and strokes and body parts interacting animatedly with the world around them. ‘Stare for longer than a minute and these disconnected shapes begin to form new connections and meanings in the mind’s eye.’

This was the first time that a large body of Dali’s original works were exhibited in India, though two of his works are in the collection of Victoria Memorial, Calcutta. Here are two works (one is a section or detail) from the Delhi show. Sadly, lighting at the Visual Art Gallery was very poor. The show was still being mounted/dismounted.

Dad’s Paper knife

A Letter Opener, Letter Knife or a Paper Knife was a fairly common device found on almost every office table during the 1940s. It used to be a straightforward blunt blade of metal to cut-open sealed and gummed envelopes. I found this one among a punching machine, a pin cushion, a stapler, a bloating roller pad, a few glass paperweights, a pen holder and various other table items in my dad’s office after he died. This was really fancy for those times. The obverse and the inverse sides of the promotional paper knife, was probably used as a give-away for cycle buyers by Perryson Cycle & Parts company in India. It is pretty much ‘usable’ even today though the mermaid-like fluke (the tail) of the knife is missing, possibly broken, in ‘handling’. With her high cheekbones and curls, this shapely-Greek-goddess-like-sensation must have been a handful for both the secretary and the boss. I don’t think these guys were missing anything in those days. “Dad, this is going to the museum of memories.”

Perryson Paper Knife
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दो गज़ ज़मीन

कितना है बद-नसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिए, दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
   – बहादुर शाह ‘ज़फ़र’

अकेले बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने अपने नसीब को नहीं कोसा होगा बरतानी सल्तनत और ईस्ट इंडिया कंपनी के कई सौ अंग्रेज हुक्मरानों और फौजी भी अपने आख़िरी वक़्त में अपनी ज़मीन को तरसें होंगे उन्होंने ने भी अपने नसीब को कोसा होगा पर उनमे से ना तो कोई शहंशाह था और ना ही कोई भी ऐसी मक़बूल ग़ज़ल या ऐसा एक शेर भी कह पाया होगा।

कैसा मंज़र रहा होगा वो, एक तरफ़ जाँबाज़ हिंदुस्तानी सवार और बादशाह सलामत की फ़ौज, मेरठ से आये मुट्ठी भर घुड़सवार, देशभक्त सिपाही और दूसरी तरफ़ फ़िरंगियों की ताकत, तोपें, बारूद और बर्बरता । किला-ए-मौला (लाल किला) की बाहरी दीवार के उत्तर में बने कश्मीर दरवाज़े और उस से लगी दिल्ली की पहाड़ी पर सन 1828 में बने फ्लैगस्टाफ टावर तक पहले  11 मई 1857 से ले कर 7 जून 1857 और फिर 30  सितम्बर तक घमासान जंग हुई। आज के मैगज़ीन मेमोरियल और कश्मीर गेट के बीच हुई दस्त-बदस्त लड़ाई (hand-to-hand combat) में करीब सात हज़ार लोग मारे गए। पहले 28 दिन की घमासान लड़ाई के बाद मेरी और ग़ालिब की दिलकश दिल्ली को ‘मुर्दों का घाट’ करार दे दिया गया था। ऐसा बताया गया है कि दिल्ली की आधी आबादी हलाक कर दी गई और एक चौथाई बाशिंदे दिल्ली छोड़ कर भाग गए।

आज़ादी के लिए इस क्रांति के दौरान मेरठ से दिल्ली आये हिंदुस्तानी सिपाहियों ने बरतानी मैगज़ीन पर हमला किया। मैगज़ीन यानि असला, गोला-बारूद का ज़ख़ीरा (जहाँ से उसे सिपाहियों और फ़ौजियों तक पहुँचाया जाता है)। अंग्रेजों ने इस मैगज़ीन की सुरक्षा के लिए इसके इर्द गिर्द मोर्चाबंदी कर ली थी पर ईस्ट इंडिया कंपनी के बहुत से सैनिक हिंदुस्तानी क्रांतिकारियों के साथ हो लिए थे, गोरों की सेना में कुल 9 ब्रिटिश सैनिक बचे थे जो 5 बजे तक अपनी जगह पर कायम रहे और क्रांतिकारियों पर बंदूकों से फ़ायर करते रहे। ऐसा माना जाता है कि एक क्रन्तिकारी सीढ़ी के सहारे छत पर पहुंच गया था जिसने मैगज़ीन और खुद को उड़ा देने का सोचा ही था कि इस से पहले उस समय के सहायक कमिश्नर जॉन बकले ने मैगज़ीन को उड़ा देने का इशारा किया। कहा जाता है धमाका इतना ज़ोरदार  था कि उसकी आवाज मेरठ तक गूंजी थी । आसपास रहने वाले  सैकड़ों लोग मारे गये जिनमे कुछ अंग्रेज भी थे। बारूद से उड़ा दी गई इस मैगज़ीन के रहे सही ढांचे पे पत्थर का एक दरवाज़ा बनाया गया जो कश्मीरी गेट पोस्ट ऑफिस के ठीक सामने उसी जग़ह पर आज भी मैगज़ीन मेमोरियल गेट के नाम से जाना जाता है।

8 जून 1857 तक अंग्रेज जवाबी हमला नहीं कर पाए क्योंकि उनकी फ़ौज मुल्क भर में दूर-दूर तक बिखरी हुई थी। मेरठ छावनी में बगावत हो चुकी थी, पास में कोई और बड़ी छावनी थी नहीं। अंग्रेजों को दिल्ली शहर पर फिर से कब्ज़ा करने के लिए फ़ौज इकट्ठा करनी थी जिसमें काफी वक़्त लगा, लेकिन जून के आख़िर तक गोरखाओं की दो बड़ी टुकड़ियां और ब्रिगेडियर जनरल जॉन निकोलसन की कमान में 32 तोपों और 2,000 से अधिक नए फौजियों की घेराबंदी वाली रेलगाड़ी पंजाब से दिल्ली आ पहुंची ।

नए आये फौजियों ने कश्मीर दरवाज़े के सामने दिल्ली की ओर देखने वाली एक पहाड़ी (जिसे आजकल दिल्ली रिज कहा जाता है) पर कब्ज़ा कर लिया लेकिन फिर भी वो शहर पर बड़ा हमला नहीं कर पाए। इस पहाड़ी पर तब घना जंगल होता था जहाँ आज सेंट स्टीफेन हॉस्पिटल है। दोनों तरफ से शहर की घेराबंदी चालू थी, शहर के अंदर मुगल सम्राट बहादुर शाह का दरबार काबिज़ था पर वो अंग्रेजों के खिलाफ जंग नहीं चाहते थे और उनके वफादार सैनिकों ने भी उन्हें मजबूर नहीं किया। 40,000 से ज़्यादा हिंदुस्तानी लड़ाकों का सामना करते हुए अंग्रेजी फौजों को ऐसा लगा मानो वे भी  घेराबंदी में हैं। 

दिल्ली शहर में वापिस घुसने के लिए अंग्रेजों ने 14 सितम्बर 1857 को कश्मीर दरवाज़े के एक हिस्से और उसके ऊपर बने रास्ते को बारूद से उड़ा दिया। इस वाकिये की इबारत-लिखा पत्थर आज भी कश्मीरी गेट पर लगा है। निकलसन ने कश्मीर गेट पर हमले की अगुवाई की। जिस वक़्त वह अपने आदमियों को जोश दिलाने के लिए पीछे मुड़कर देख रहा था तो एक हिंदुस्तानी सिपाही ने पास के मकान से उसे गोली मार कर घायल का दिया। तीन दिन तक अपने ज़ख्मो से जूझने के बाद निकलसन दुनिया छोड़ गए। अंग्रेजी रेकॉर्ड्स में लिखा है की “निकलसन ने तलवार खींचते हुए अपने आदमियों को अपने पीछे चलने के लिए बुलाया क्योंकि वह एक संकरी गली में एक हमले करने जा रहे थे।”

ऐसा कहा जाता है कि ब्रिगेडियर निकलसन को डाक्टरी मदद न मिलने की वजह से उसने पहाड़ी के नीचे वाली चट्टानों पे ही दम तोड़ दिया। उसकी लाश को उसी जगह पर दफना दिया गया और बाद में उसके आस पास की जगह घेर कर उसे क़ब्रिस्तान करार दे दिया गया।

ब्रिगेडियर निकलसन के मारे जाने के बाद दिल्ली में कोई भी महफूज़ नहीं था। अँगरेज़ सिपाही घर घर जा कर अपने बाग़ी सिपाहियों, मुग़ल बादशाह के सिपाहियों और मुग़लों की मदद करने वाली बची खुची जनता को ढूंढ रहे थे। जिस पर ज़रा सा भी शक होता उसे वहीँ हलाक़ कर दिया जाता। लाशों को दफ़नाने और जलाने के लिए भी लोग नहीं थे इसलिए उन्हें हाथ रेहड़ों पे धकेल कर जमुना नदी में बहाया गया। अंग्रेज़ों ने दिल्ली को चारों तरफ से घेरा बंद कर रखा था।  कुछ रोज़ बाद न सिर्फ दिल्ली वालों को बल्कि अंग्रेजी हुक्मराओं और फौज में भी हैज़ा, पेचिश और चेचक जैसी घातक बीमारियां फ़ैल गईं जिसने अंग्रेजी रेजीडेंसी को भी चपेट में ले लिया।

जैसे-जैसे दिन बीते अंग्रेज़ों ने दिल्ली के रहने वालों पे हर तरह के ज़ुल्म बरपा किये। सबसे पहले गल्ले और खाने की दूकाने बंद कर दी गईं, फिर बाज़ार, फिर घर से बाहर निकलने की सख्त मनाही और फिर क़त्लो-ग़ैरत। यहाँ तक की लाल किले के अंदर भी बहुत ख़ून खराबा हुआ और किले पर कब्ज़ा कर लिया गया। औरतों और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया। हिंदुस्तान के बादशाह बहादुर शाह जो तब तक हुमायूँ के मक़बरे में पनाह लिए थे उन्हें 20 सितम्बर 1857 को गिरफ्तार कर लिया गया और 21 सितम्बर तो उनके दो बेटों और एक पोते की गोली मार कर हत्या कर दी गई।

उस वक़्त किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि दिल्ली कभी हिन्दोस्तान की राजधानी भी बनेगी।  मुगलों का शहर दिल्ली जिसके आस पास कोई समंदर नहीं था कोई बंदरगाह नहीं वो अंग्रेज़ों को सिर्फ इसलिए पसंद आया क्यूंकि वो मुगलों की राजधानी था और शायद वहां कोई बड़ा खज़ाना छिपा था । 

 170 साल पहले भी इस इलाक़े में ख़ासी हलचल रहती होगी। अंग्रेज़ों की रेजीडेंसी, मैगज़ीन स्टोर, फ़ौजियों की आवाजाही, अच्छा ख़ासा चलता बाज़ार, लाहौर, काबुल, पंजाब और कश्मीर को जाने वाले लोगों के काफ़िले, और बाहर से आने वाले व्यापारियों के जत्थे दिल्ली के क़िले की दीवार के बाहर बनी छोटी सराय और टेंटों में रुका करते थे। आज भी ये इलाका उतनी ही गहमागहमी वाला है।

कश्मीरी गेट के भीड़भाड़ वाले इलाके में जहाँ सब कुछ धूल-मट्टी से सना होता है वहां ऊपर मेट्रो और नीचे बसें, कारें, स्कूटर, टेम्पो दौड़ते हैं। बस और ऑटो स्टैंड की भीड़ के बीच में ही फेरीवाले अपना सामान बेचते हैं जिसमे अचानक उभर आने वाली लाल रंग की ऊँची दीवार देखने वाले को चौकां देती है। इस दीवार पे लगे लोहे के लाल गेट के पीछे छुपा दिल्ली का पहला ईसाई कब्रिस्तान है। इसमें सैकड़ों ब्रिटिश फ़ौजियों और ईसाई धर्म के मानने वाले अन्य देशी-विदेशियों की कब्रें हैं, जिन्होंने हिन्दुस्तान के गुज़रे कल में बहुत सी अच्छी या बुरी भूमिका निभाई। ये कब्रिस्तान उस ज़ुल्म, उस जंग, और उस वक़्त का भी गवाह है जो 1857 में दिल्ली शहर ने झेला। कुछ भी कहें ये कब्रिस्तान भी अपनी विरासत का हिस्सा है पर अफ़सोस इसे भी संजो कर नहीं रखा गया।

फौत हुए फ़ौजी, मिशनरी, व्यापारी और अधिकारी लोग आज यहाँ आराम करते हैं। टूटे हुए मकबरे और कब्रों के बिखरे हुए पत्थर अब सिर्फ़ बीती ज़िंदगियों के निशान हैं। वो नामी बड़े औधेदार अब मिट्टी में सने हैं जो कभी जाने माने रहे होंगे। इनके बीच उन बच्चों और औरतें की कब्रें भी हैं जिनका इस लड़ाई से कोई सरोकर नहीं था जो सिर्फ आपसी बैर या बीमारी के शिकार हुए। इस ईसाई कब्रिस्तान को निकलसन क्रिश्चियन कब्रिस्तान के नाम से जान जाता है जो सन 1857 में पहाड़ी के उबड़ खाबड़ तले का एक बड़ा हिस्सा घेर कर बनाया गया था।  इसके पूरब में जमुना नदी है, पश्चिम में तीस हज़ारी कोर्ट, उत्तर में दिल्ली विश्वविद्यालय और दक्षिण में नई दिल्ली के इलाके हैं। आज क़ब्रिस्तान की दीवार के साथ सटा हैं आलीशान ओबेरॉय अपार्टमेंट्स जिसके पिछले हिस्से में रहने वाले कुछ लोग सीधे क़ब्रिस्तान के मैदान को देख सकते हैं।

जॉन निकलसन की कब्र लोहे की रेलिंग से घिरी है जिस पर सफेद संगमरमर का पत्थर है जो बहुत मैला हो चुका है। उसपे लिखी इबारत आसानी से पढ़ी नहीं जा सकती। माना जाता है कि निकलसन का भूत कब्रिस्तान में घूमता है (मैंने आवाज़ लगा कर उसे बुलाने की बहुत कोशिश की)। जाँबाज़ और मनमौजी निकलसन ने दिल्ली आने से पहले अफगानिस्तान और पंजाब में भी कई लड़ाई लड़ी थी जहाँ उनके साथी अफसरों ने उसे पसंद नहीं किया, पर ऐसा लिखा भी मिलता है कि कुछ हिंदुस्तानी उसकी इज़्ज़त करते थे। लेखक विलियम डेलरिम्पल ने अपनी क़िताब “द लास्ट मुग़ल” में निकलसन को “निर्दयी क्षमता” वाला “शाही मनोरोगी” कहा है।

निकोलसन की कब्र को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दिया गया है। इसी कब्रिस्तान में इमली व कीकर के पेड़ों और बोगनविलिया की धधकती लाल झाड़ियों के बीच दफनाए गए अन्य सैनिकों में 42वीं बंगाल रेजिमेंट के अलेक्जेंडर विलियम मरे शामिल हैं। जिनकी कब्र के पत्थर पर लिखा है मरे “18 सितंबर 1857 को दिल्ली की घेराबंदी के दौरान लड़ते हुए गिर गए थे।” मेरा मानना है की क़ब्रिस्तान में फूलों की क्यारियाँ होनी चाहियें।

अकेले 1857 में इस क़ब्रिस्तान में 500 से ज़्यादा लोगों को दफनाया गया। इंटरनेट पर पड़े एक लेख में लिखा है “जेम्स कमिंग 28 जुलाई, 1874 को बिजली गिरने से मारे गए एक टेलीग्राफ मास्टर थे, “अपनी विधवा और नवजात बेटी को अपने नुकसान पर विलाप करने के लिए छोड़ गए”। अगस्त 1907 में 29 वर्ष की आयु में जेम्स डाओफ की “हीटस्ट्रोक से मृत्यु” हो गई। एलिजाबेथ बैडली रीड, रेवरेंड बी.एच. की बेटी। अमेरिकन मेथोडिस्ट मिशन सोसाइटी की बैडली का जन्म 1885 में लॉस एंजिल्स में हुआ था और उनकी मृत्यु 1935 में दिल्ली में हुई थी। उनकी क़ब्र पर लिखा है, ”वह भारत से प्यार करती थीं।” ये सब क़ब्रें अब नहीं दिखती।

यहां कई बच्चों की कब्रें भी हैं जिनके लिए शायद उन दिनों का हिन्दोस्तान बहुत मुश्किलों वाला रहा होगा । क़ब्रिस्तान की देखरेख करने वाले कर्मचारी जेम्स ने मुझे बताया कि “वैसे तो कब्रिस्तान अब बंद हो गया है। नए मुर्दे दफ़नाने के लिए अब यहाँ कोई जगह नहीं है।” फिर भी मैंने देखा की यहाँ बहुत से नई कब्रें हैं जिनपे चमकते काले ग्रेनाइट पत्थर लगे हैं ये सब 2020 और उसके बाद की ही हैं। एक परिवार को मैंने क़ब्रिस्तान से निकलते देखा जिनके हाथों में फूलों की टोकरियां थीं और बाटने के लिए कुछ खाने का सामन था।

​जिन ख़ास लोगों की कब्रों को पहचानने में जेम्स ने मेरी मदद की और जिनके नाम मैं पढ़ सका उनमे थे – ​सारा हैरियट (1858), अल्बर्ट अल्फ्रेड ​लेसन (1862​), चार्ल्स विलियम ​(1864​),  ऐनी फ़्रांसिस ​(1861​), एथेल ​(1907​), मेरी मोल (1864), थॉमस पीकॉक (1859) और एलिज़ाबेथ वोल्विंग (1864) .

क़ब्रिस्तान में दाख़िल होते ही उसके सामने वाले, यानी क़ब्रिस्तान के दक्षिणी सिरे पर​, सबसे पुरानी कब्रें हैं जो 1857 से लेकर ​1​890 तक की हैं​, गेट के दहिनी ​ओर 1900 से लेकर 1940 तक कि और उत्तर​-पश्चिम ​व पीछे के ​हिस्से में ज़्यादा नई कब्रें हैं जिनके चमकते ​काले और सफ़ेद पत्थरों से और उन​ पर लिखे संदेशों से पता चलता है कि वो सब 1970 के बाद ​की हैं।  निकलसन क़ब्रिस्तान में 1857 से 2022 तक ​की कब्रें हैं जो की ​छोटे आकार में बनी मूर्ति कला ​का बेहद खूबसूरत ​नमूना हैं।  संगमरमर, ग्रेनाइट और लाल बलुआ पत्थर पर बेहतरीन बारीक़ ​नक़्क़ाशी में उकेरी ​गई है। बहुत सी कब्रों पर इसाई धर्म का ​चिन्ह सलीब ​(क्रॉस​) बना है तो कुछ लाजवाब ​कंदकारी का काम है।

जेम्स ने मुझे बताया की क़ब्रिस्तान की देख रेख के लिया बहुत कम पैसा आता है जो की एक समस्या है। इसके चलते बहुत सी पुरानी लाल पत्थर से बानी खूबसूरत डिज़ाइन की कब्रों के ढांचे गिरते जा रहे हैं। कब्रिस्तान के पूरे मैदान में साफ़ सफाई भी पूरी तरह नहीं हो पा रही । जेम्स का कहना है कि बरसों की धूल और गर्द पड़ने से क़ब्रिस्तान की मैदानी मिट्टी की ऊंचाई भी बढ़ गई है जिस से पुरानी कब्रें  धँसती जा रहीं हैं और बहुत सारी तो अब दिखाई भी नहीं देती। मैंने देखा कुछ नशेड़ी लड़के एक कोने में आग जला कर चिलम भर रहे थे। मुझे देखते ही दो लोग दीवार फाँद बाहर कूद गए।

निकलसन की क़ब्र में उनका चेहरा और आँखें कश्मीर गेट की तरफ़ ही हैं। बीते 170 सालों में जाने वो किस किस बदलाव और ख़ून-खराबे के गवाह रहे।

कुछ देर जॉन निकलसन की क़ब्र पर खड़ा मैं उनसे बाते करता रहा। मेरे सवाल बहुत थे पर उनके जवाब झिझक झिझक कर और धीरे धीरे आ रहे थे। ठंड में शायद जॉन भी बात करने के मूड में नहीं थे या फिर तफ़सील से बताना नहीं चाहते थे। ​सर्दी के मौसम के चलते दिल्ली में अभी सूरज के दर्शन भी नहीं हुए थे, दिन के 11.30 बजे भी कब्रिस्तान पर कोहरा ​तैर रहा था। क़ब्रिस्तान के कर्मचारी जेम्स से बात करते मैंने काँपती उँगलियों से फ़ोन पर कुछ नोट्स लिए और चाय की दूकान ढूंढते बाहर चला आया।

“आपके हिस्से की दो गज़ ज़मीन तो हिंदुस्तान में ही थी निकलसन साहब, फिर मिलेंगे। 

So Long, John. Sleep tight.”

14 जनवरी 2025

Nicholson Cemetery Kashmiri Gate Delhi