Flirtatious as they are
wicked damsels Madhu-Malti
lay bare their fragrant pink bosom
seducing the lone cloud in the blue sky.

This, that, and all between.
Flirtatious as they are
wicked damsels Madhu-Malti
lay bare their fragrant pink bosom
seducing the lone cloud in the blue sky.

Come April, the blue sky
turns sad and reluctant
As if on purpose.

मेरा नंबर चौथा था। मेरे पहले दो औरतें और एक जवान लड़का कमरे के अंदर बैठे डॉक्टर की नज़र भर का इंतजार कर रहे थे। पहली महिला को पीठ का कोई मर्ज़ रहा होगा उसने कमर पर बेल्ट कस रखी थी, दूसरी महिला बुज़ुर्ग थीं उनकी तो उम्र ही दर्द रही होगी और लड़के की टांग पे पलस्तर चढ़ा था जिस पर शायरी के सिवा किसी ने हरे रंग के स्केच पेन से प्रेम पत्र लिखने की शुरुआत भी कर दी थी जिसके अंत में एक मायूस से फूल के साथ बड़ी सी स्माइली के अंदर कुछ गुप्त सन्देश भी था।
जिस तरीक़े से डॉक्टर साहब मरीजों की हड्डियों का मुआयना कर रहे थे उन्हें देख कमरे के बाहर बैठा मैं दर्शन सिंह तरखान को याद कर रहा था। हड्डियों के डॉक्टर प्रेम चोपड़ा और दर्शन सिंह तरखान में मुझे कोई ज्यादा फर्क नहीं लगा। आदम जोड़ों और अंगों को जिस तरह घुमा कर, मोड़ कर और ऊपर नीचे चला कर डॉक्टर प्रेम देख रहे थे ठीक उसी तरह सरदार दर्शन सिंह लकड़ी के बड़े छोटे टुकड़ों को इक्कठे ठोक कर और हिला-डुला देखा करता था। गज़ब हुनर था दर्शन सिंह तरखान के हाथों में, आड़ी तिरछी लकड़ी से भी वो सुन्दर सामान बना देता था।
मेरे घुटने की सोज़िश और एक्सरे को देखने के बाद डॉक्टर बोले एक्सरसाइज नहीं कर रहे हैं? अरे, रोज़ करता हूं जी, मैं नाराज़ हो कर बोला । नहीं जी, ठीक तरह नहीं कर रहे हैं। चलिए आपको फिज़िओथेरेपी करानी होगी । घुटने की मरमत के साथ-साथ उसी दिन से शुरू हो गई गिनती करने की प्रैक्टिस, हिंदी और अंग्रेजी दोनों में । One, two, three, four, five relax … वन, टू, थ्री, फोर, फाइव। ..
टांग और घुटने की कसरत के आठ तरीके बताए गए और कसरत कराने वाले जूनियर डाक्टर के पास भेज दिए गए । जूनियर का नाम था सुफ़ियान जो शायद 23 या 24 साल का रहा होगा। गोरा चिटा और हसमुख। एक लंबे हॉल में स्टील के संकरे स्ट्रेचर नुमा बिस्तरों को तीन तरफ पर्दों से ढक कर छोटे कैबिन बना दिए गए थे जिनके आर पार देखा तो नही जा सकता था पर बात चीत आसानी से सुनी जा सकती थी और दूसरे मरीजों की आहें भी। चौथी तरफ थी ठंडी सफ़ेद दीवार। ऐसे ही एक केबिन की तरफ इशारा कर सुफ़ियान ने दूसरी तरफ से पर्दा खीँच दिया। अब सुफ़ियान और हम अकेले थे। मेरा घुटना अब उनके सुपुर्द था।
तीन तरफ़ से परदे में ढके उस केबिन ने जाने क्यों और कहाँ से मुझे अपनी जवानी के दिनों के उस रेस्टोरेंट की याद दिला दी जिसके घुप अँधेरे में हमने आशिक़ी का एक दौर बिताया था। कमला नगर का अजंता रेस्तरां जवान जोड़ों के लिए ही बनाया गया था और माशूक़ भी वहां जाने से कतराया नहीं करती थीं । मधुर संगीत और बिलकुल हलकी लाल रौशनी में भी हम वो घुप्प काले केबिन ढूंढ लिया करते थे। हर केबिन के बाहर काले कपड़े का पर्दा रहता था जिसे अंदर लटकी डोरी से बंद किया जा सकता था। जब तक अंदर लगी घंटी ना बजाई जाये तब तक कोई वेटर भी डिस्टर्ब नहीं करता था। एक घंटे के 30 रुपये में वो केबिन उस ज़माने के हिसाब से भी ख़ासा महंगा था। ऐसा ख़्याल जितनी तेज़ी से आया उतनी हे तेज़ी से तब निकल भागा जब सुफियान साहेब ने हमारे घुटने ज़ोर से दबा दिया। मेरी चीख़ से साथ वाले केबिन में लेटी महिला और उनकी नर्स ने जाने क्या क्या सोचा होगा। केबिन में दीवार के सहारे लगी लोहे की टेबल पर एक मशीन पड़ी थी जिस से 8 – 10 रंग बिरंगी तारें टेबल के नीचे तक फ़ैलीं थीं। पट्टियों के कुछ गोले, मरहम की ट्यूब और बाकि सामन के साथ टेबल भरी पड़ी थी।
सुफ़यान ने मुझे लेटने को कहा और मैं लेट गया। इस बार उसने मेरी दायीं टांग को बड़े नरम से हाथों से छुआ और घुटने को धीरे धीरे दबाया। इस सब के बीच उसने मेरे चेहरे की तरफ देखना नहीं छोड़ा। वो ये जानना चाह रहा था कि मुझे दर्द कहाँ और कितना हो रहा है। ख़ैर, दीवार के साथ रखी मशीन के तीन तारों को उसने मेरे घुटने पे लगाया जिस से मेरी टांग में बिजली के करंट सी धीमी सुरसुरी बहने लगी, घुटने के ऊपर उसने एक गरम तौलिया डाल दिया और मुस्कुराते हुए मेरे सामने रखे स्टूल पे बैठ कर अपना मोबाइल देखने लग गया। 15 मिनट की झनझनाहट के बाद सुफ़ियान ने टांग को सीधा छत की तरफ उठा दिया और गिनती गिनना शुरू किया।
One, two, three, four, five, six seven eight nine ten… relax
वन, टू, थ्री, फोर, फाइव, सिक्स, सेवेन, एट, नाइन, टेन – रिलैक्स – लेग उप अगेन – एक, दो, तीन, चार, पांच, छै, सात, आठ, नौ, और दस – रिलैक्स। थक गए ? दर्द तो नहीं हो रहा ? मैंने भी ना में सर हिला दिया।
हरे रंग की पाजामे नुमा पतलून और आधी बाजू की हरी कमीज पहने साढ़े पांच फुट लम्बा शख्स मुझे बहुत ही लम्बोतरा दिख रहा था उसका सर कमरे की छत तक पहुँचता हुआ। जैसे ही मैं टांग छत की तरफ पूरी ऊपर उठाता हूँ तो मुझे वाघा बॉर्डर पर हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी बॉर्डर पुलिस के जवानों की याद आ जाती है जो पूरे ज़ोर से अपनी टाँगे सर से भी ऊपर उठा कर पैर ज़मीन पे पटकते हैं। मेरा दिल वो ज़ोर लगाने की इज्ज़ाज़त नहीं देता। मुझे मालूम है उतने ज़ोर से अगर में पावं पटकूंगा तो टांग की या पैर की हड्डी तो गयी। मैं धीरे धीरे टांग को नीचे कर सावलिया नज़रों से सुफ़ियान साहेब को इस उम्मीद से देखता हूँ कि मैंने सब ठीक किया या नहीं। उनकी मुस्कराहट से दिल को बड़ी तसली हुई और अब मैं उस छोटे बच्चे जैसा महसूस कर रहा था जो हर काम ठीक करने पर अपनी माँ या टीचर की तरफ देख उनके अप्रूवल और शबाशी का मुंतज़र होता है। या फिर अच्छा बच्चा बने रहने पर एक चॉकलेट का हकदार।
मैं ऑंखें पैर से हटा कर छत पर लगे स्मोक अलार्म की डिबिया की तरफ करता हूँ। उसके ऊपर एक नंबर लिखा है SA – 343, उसके छेद में धूल जमी है। डिबिया ठीक मेरे सर के ऊपर है और उससे एक फुट दूर है पानी के फ़वारे जैसा नल । अगर किसी वज़ह से अभी कहीं से धुआँ उठे तो पानी का फ़व्वारा सीधे मेरे माथे पे फूटेगा ये सोचते ही मैं अपने शरीर को दायीं और सरकने के कोशिश करता हूँ पर डॉक्टर मेरा बाज़ू पकड़ मुझे वापिस खींच लेता है और झिझकारते हुआ बोलता है “अरे, गिर जाओगे, मत सरको, ये बेड इतना चौड़ा नहीं है”, मैं संभल के नीचे की और झांकता हूँ और अपने शरीर को वापिस अंदर खींच लेता हूँ। अब भी नज़र ऊपर लगे फायर अलार्म से नहीं हटती। उस तक आने वाली बिजली तार की पट्टी टेढ़ी लगी है। मुझे फिर दर्शन सिंह तरखान याद आतें हैं, वो होते तो ये पट्टी बिलकुल सीधी लगी होती। पट्टी के साथ साथ चलती मेरी नज़र छत के कोने तक चली जाती है जहाँ किसी बच्चा मकड़ी ने नया और छोटा सा जाला बुना है जिसके अंदर अभी तक कोई मच्छर या मखी नहीं फ़सा।
वो जाला महीन सफ़ेद धागे जैसा है। दर्शन सिंह हमेशा कुर्ते नुमा लम्बी सफ़ेद क़मीज़ पहनते थे बिलकुल डॉक्टर के लम्बे सफ़ेद कोट की तरह। उनके दाएं कान में पेंसिल लगी रहती थी इनके गले में स्टेथोस्कोप। दर्शन सिंह ढीले हुए या कमज़ोर पड़े जोड़ को चूल लगा पक्का जाम कर देते थे ये डॉक्टर साहेब भी कुछ ऐसा ही करते हैं। पर जब मकड़ी की टांग टूटती होगी तो उसे कौन ठीक करता होगा ?
मेरे दायीं तरफ वाले केबिन में कोई गुनगुना रहा है। शायद कोई फ़िल्मी धुन है पर मुझे गाना याद नहीं आ रहा। में सोचता हूँ गुनगुनाने वाला डॉक्टर ही होगा किसी मरीज़ की इतनी ज़ुर्रत कहाँ जो यहाँ अस्पताल में गाये। मुझे अब दोनों बातों से कोफ़्त हो रही है। पहली कि गाने वाला कौन है और दूसरी की वो गाना मुझे याद क्यों नहीं आ रहा। उफ़। इस बीच डॉक्टर सुफियान ने चौथे तरीके की कसरत करनी शुरू कर दी है और में पहले की तीन भूल चूका हूँ। इस वाली कसरत में घुटने को नीचे की ओर दबाते हुए पंजे को अपनी तरफ खींचना है। इस से दर्द भी होता है पर फिर भी मैं इसे पांच बार कर ही लेता हूँ। डॉक्टर सुफियान खुश हैं, ‘अच्छी प्रोग्रेस है’ ये कह कर वो मुस्कुराते हैं। वो गाना फिर भी मुझे याद नहीं आ रहा।
बड़े डॉक्टर प्रेम चोपड़ा साहेब किसी मरीज़ को देखने ‘राउंड’ पे हैं मुझे उनकी आवाज़ आ रही है। सब जूनियर डॉक्टर सतर्क हैं और बड़ी मुस्तैदी से मरीजों को समझा रहे हैं। मुझे अब थकान हो रही है और अब में ऊब रहा हूँ। मुझे ऐसे लग रहा के की बस अब पहली मंजिल पे चल कर अस्पताल के कैफेटेरिया में बढ़िया कॉफ़ी पी जाए और अगर आस पास में कोई जान पहचान वाला न हो तो लगे हाथ एक गरम समोसा भी झीम लिया जाए। अब इन मॉडर्न अस्पतालों को पूरे आराम के लिए ही तो बनाया गया है। मरीज़ को मिलने और हाल पूछने आये सभी दोस्त और रिश्तेदार लोगों का भी तो ध्यान रखना भी तो अस्पताल की ड्यूटी है और फिर शाम चार से पांच अगर मिलने का समय है तो वो चाय का भी तो समय है। वैसे भी अस्पताल में पार्किंग और हल्दीराम भी तो कमाई का एक बड़ा ज़रिया हैं।
इस से पहले कि मैं कुछ कहता सुफ़ियान साहेब ही बोल पड़े ‘अब घर जा कर शाम को ये सब एक्सरसाइज ज़रूर कीजियेगा’ । एक बड़ी सी स्माइल के साथ मैंने भी ऊपर पड़ी चादर को धकेला और अपने जूते ढूंढने लगा।
साथ वाले केबिन से फिर वही गाने की धुन बजी, इस बार हलकी सीटी के साथ। यकायक मेरे मुँह से निकला ‘ये पकड़ा’ तभी डॉक्टर प्रेम चोपड़ा पर्दा सरका अंदर आ गए और जूनियर सुफियान हैरान हो गए। मैंने कहा ‘कुछ नहीं’ और झेंप गया। डॉक्टर चोपड़ा ने कहा अरे झिझकिये मत बताइए। Sir, don’t you think that an orthopedist and a carpenter do very similar work? डॉक्टर चोपड़ा घबराये और सकपका गए, शायद उन्हें कुछ जवाब नहीं सूझा। बिना कुछ कहे उन्होंने सर हिलाया और तेज़ी से बाहर निकल गए। शायद जवाब अगली बार देंगे ये सोच मैंने तसल्ली कर ली। इतने मसरूफ डॉक्टर हैं उन्हें कहाँ ऐसी फलसफे वाली बातों के लिए वक़्त होगा। उफ्फ्फ छोड़ो।
जूते के फीते बांधते बांधते मुझे गाने का मुखड़ा तो याद आ गया पर अंतरा फिर गच्चा दे गया। कम्बख़्त, वो क्या था यार ? ‘आसमां पे है ख़ुदा और ज़मी पे हम … ता तरा तरा तरा ता तरा तरम।
माँ को ताश खेलने की लत है
मेरे बचपन से ही, या यूँ कहिये
जब से मैंने देखा है, तब से,
अब भी है। पर तब से थोड़ी कम।
15 नहीं तो 10 बाज़ियाँ बांटी जाती हैं
पत्ते फैंट कर – स्वीप, रम्मी या पप्लू।
कोई साथ न खेले तो नाराज़ और गुस्सा
जैसे अमली को मिली न हो
उस दोपहर की अफ़ीम।
ये लत नाना को भी थी
मासी और मामा लोगों को भी
यानी पूरे ननिहाल को।
सब खेलते थे पत्ते –
12 महीने, हर रोज़, बस
मातमी दिनों को छोड़।
नानी नहीं खेलती थी
उसे शायद आता ही नहीं था
ताश खेलना या पत्ते बांटना भी
उससे कोई पूछता भी नहीं था।
गोरी, चिट्टी, मेम सी गुलाबी नानी।
उसे वक़्त कहाँ था ताश खेलने का
उसे तो और बहुत काम थे
11 बच्चे और एक थानेदार
जो पालना था ।
घर के कुल 13 जन
ताश की गड्डी का
एक पूरा रंग, जाने कौन सा –
हुकम, चिड़ी, ईंट या पान ?
नानी ताउम्र रसोई में ही रही
और फ़ारिग ही न हुई
चूल्हे से अंगीठी से अंगार से
आखिर खो गई उसी आग में ।
बच रहे, 11 जमा 1
खो गई पान की बेग़म
क्वीन ऑफ़ हार्ट्स, ग्रैनी लॉस्ट।
नानी चल बसी
फिर भी बाज़ियाँ रुकी नहीं
अभी-अभी माँ की आवाज़ आई –
“फ़ेंक पत्ता” ।

Father died at home, in his house
looking himself in the mirror;
guiding the razor upside-down on his thin face,
pulling wrinkled skin over shrunken cheekbones,
making faces while shaving; grinning,
upsetting, teasing, and taunting the mirror,
Just then a heart-attack took him in minutes;
And the Mirror captured his soul.
The Mirror was fixed on the wall
facing the kitchen, where mother worked.
She kept her distance from the mirror,
feeling sad and scared of looking in it –
finally, covering it with a towel that father used.
Father owned the house where he died.
‘Krishna Kutir’, the house was named
after my mother, who sold it ten years later
and passed the money to his heirs.
No Father, No House. No Mirror. All gone.
A lot more went with it, my innocence, my youth.
We all grew up in it – a sister, two brothers,
mother, father – and the house itself,
which had come by chance, really.
Father had no money to buy it.
He would say. ‘I was lucky’. Yes, he was.
Indeed, lucky for an orphan and a refugee
to own a house in the capital.
For sure, those days he was lucky,
and happy too, having got a raise in salary.
He also won two lotteries in six months.
First, a ‘lucky draw’ where his name was picked
and a small flat allotted to him for small money.
Second, a ‘cash prize’ for writing a slogan
for a cigarette brand of the working class.
He used the money to part-pay the flat.
Would you believe, there was a time
when one was rewarded to smoke!
Very Lucky!
Like his income, the house too was
low income. LIG Flat they called it.
Dad was proud, ‘I made it like a bee,’
he once told me looking into the mirror.
He saved for it, every paisa he could
like a bee secreting to make a hive –
cutting on his smokes, eats, and bus fare;
cycling to work eight miles one way.
Mother sold the house as it had her name.
The mirror went with the house.
Outside the house, there was a name plate
faded, nailed to the wall, having survived
forty years of elements, envy, and evil-eye.
When Ma moved, father stayed behind
in his house. He didn’t move, he couldn’t.
His soul had been seized by the Mirror.
Not everything died with father, a lot survived.
His dreams, his books, his letters, his diaries
and the Mirror on the soiled verandah wall
from which his face followed us everywhere.
Ma brought all she could, tears & trauma in tow
and the fading nameplate, ‘Krishna Kutir’.
I, for one, couldn’t unhook the Mirror
Father held it tight.
— R, March 27, 2024

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