Remembering Amrita Pritam as I walk past her house on this cool, cloudy, carefree Monday morning. Here’s a brief read in Hindi. ‘प्रेमदास वल्द अर्जुनदेव बरी’

This, that, and all between.
Remembering Amrita Pritam as I walk past her house on this cool, cloudy, carefree Monday morning. Here’s a brief read in Hindi. ‘प्रेमदास वल्द अर्जुनदेव बरी’

THE WORLD OF HINDI CINEMA
और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाक़त लिखना
रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना
अगर आप शिराज़ हुसैन उस्मानी की कला, उनकी खताती (कैलिग्राफी), उनके स्टूडियो ‘ख्वाब तनहा’ और उनकी शख्सियत से वाकिफ नहीं हैं तो आप बहुत कुछ मिस कर रहे हैं। अपनी क्रीऐटिवटी और अपने हुनर से कल शाम शिराज़ साहब ने महफ़िल लूट ली। मौका और नुमाइश (‘दुनिया परछियों की’) तो हिन्दी सिनेमा के फिल्म पोस्टर, गीत पुस्तिकाएं, लॉबी कार्ड और बड़े छोटे परदे पर चलती तस्वीरों की थी पर शिराज़ हुसैन के बनाए परदों पे थिरकते हर्फों नें देखने वालों पर ना सिर्फ जादू कर दिया पर वो आज के माहौल पर एक तबसरा भी हैं ।
जाने माने फिल्म इतिहासकार और कला क्यूरेटर आशीष राजाध्यक्ष ने इस प्रदर्शनी को पुराने फिल्मी पोस्टरों, लॉबी कार्ड, थिएटर के अंदर का माहौल बना कर मल्टी-मीडिया के इस्तेमाल सिनेमा के प्रेमियों के लिए खास तरीके से पेश किया है। यह प्रदर्शनी रोजमर्रा की भारतीय जिंदगी में सिनेमा की अमूर्त उपस्थिति को उजागर करती है।
अर्थशिला दिल्ली में लगी “दुनिया परछाइयों की” प्रदर्शनी “भारतीय सिनेमा के सच्चे सिनेप्रेमियों के लिए है। हिन्दी सिनेमा 21वीं सदी के भारत में सबसे बड़े सांस्कृतिक प्रभावों में से एक रहा है। प्रदर्शित पोस्टर 70, 80 और 90 के दशक की सिनेमाई स्मृति को याद करते हैं।”
प्रदर्शनी 27 सितंबर 2025 से 4 जनवरी 2026 तक रहेगी। बेहतरीन, ज़रूर देखिए। बाकि जानकारी @arthshila_delhi



Presenting Irfan Habib saheb an illustrated drawing of his picture riding a bicycle was a special moment for me. The smile on his face says it all, he loved the drawing. Meeting him is a delight, talking to him is a pleasure and Listening to nuanced history from Irfan saheb is a revelation. All three check-marked yesterday; over tea, then lunch at Sahmat, and then at the First Sitaram Yechury Memorial Lecture. Having spent nearly four hours in a car coming from Aligarh, I worried if he would have the energy to stand for more than an hour. Defying all, he did it without breaking a sweat. At 93 he is fit and ever-smiling as we have been watching him for over 35 years. The illustration was very kindly done by Allen Shaw on my request.









My nascent attempt at reading poetry.

पिशौरियों और लाहौरीयों की मुहब्बत के कई किस्से मशहूर हैं; हाय हाय, ऐसे हैं के सुनाये नहीं बनते। ऐसी मुहब्बत के मौका मिले तो ये दोनों तो एक दूसरे को घर तक छोड़ कर आते हैं; काटने या कूटने से भी नहीं बख़्शते ये। मुक़ाबले भी ख़ूब करते हैं — महीन और सूफियानी चमड़ी वाले लाहौरीयों नें कसूर में ऊँटनी (डाची) की नर्म खाल से ज़नाना जुतियाँ बनाई तो पिशौरियों ने मोटी जिल्द वाले जनावरों और ट्रक टायर से मर्दाना सैंडल बना दिये। एक पुश्तैनी लाहोरी ने जब पिशौरी सैंडल पहनने की गुस्ताखी की तो शाम तक उसके पैरों का हाल आप देख सकते हैं। ‘ये जख्म थोड़े ही हैं ये तो प्यार के थपेड़े हैं’। लो भाई लो, ले लो वापिस, इतना प्यार नहीं चाहिए मुझे। कोहलापुरी ठीक है। वैसे ये कोई हल्दी रसम नहीं हो रही है और जब से मैंने फोटो खींची है पिशौरन तो मुँह फुलाए बैठी है।
महाभारत के कौरवों वाले कुरु वंश की राजमाता गांधारी इसी इलाक़े से बताई जाती हैं। पिशौर के गांधार मैदानों में ही पली बढ़ी होंगी। खैबर दर्रे को जाने वाली वादी में बसा पेशावर शहर गांधार के महकते मैदानी इलाके के लिए जाना जाता है। तीन तरफ़ पहाड़ों से घिरे गांधार के मैदानों और पहाड़ियों में कभी हजारों बौद्ध भिक्षु गुफाओं और मठों में रहते थे। सिकंदर के फ़ौजियों की एक टुकड़ी रास्ता भटक यहीं आ गई थी जिन्होंने भिक्षुओं को बुद्ध की मूर्तियाँ तराशना सिखाया। उधर दूसरी तरफ उत्तर पूर्व वाले लाहौर से एक सड़क (मुग़ल रोड) मरी और रावलपिंडी होते हुए हिमालय की काराकोरम और पीर पंजाल शृंखला तक ले जाती है। मरी की पहड़ियाँ भी गांधार सी हसीन हैं जो अपने यहाँ बनी शराब से पेशावर को टल्ली कर देती हैं। एक तरफ भक्ति रस तो दूसरी तरफ सोमरस।

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