अपने-अपने इष्ट

घड़ी के हिसाब से भी दिन कभी का निकल चुका है सुबह हो चुकी है पर पिछ्ले 25 दिन की तरह सूर्य देवता आज भी नादारद हैं। दिन कब निकला था ये बताने वाले मुर्गे अब दूर-दूर तक बांग नहीं देते। अलार्म लगाना मना  है। घर के आस पास कोई मसीत या गुरुद्वारा भी नहीं है, एक साईं मंदिर है जहाँ कोई घंटाल नहीं बजाता और ना भजन ही गाता है। नगर कीर्तन तो या सम्राट अशोक के समय में होता था या लाहौर में। इतना गहरा कोहरा है कि मैं गली के दूसरे छोर को भी नहीं देख सकता। गली और मौसम दोनों उदास हैं। ऐसे उदास मौसम में अख़्तरी बाई और उनकी गाई ठुमरियां बहुत सताती हैं। ‘ऐ सर्द हवाओ उन्हें ले आओ’

घर के गेट के बाहर खड़ा मैं सोच रहा हूँ किधर को निकलूं। तभी एक मरियल सी काले-सफ़ेद चक्कतों वाली गाय का सर सफ़ेद धुंए को सूतता दीखता है। उसकी तो मजबूरी ठहरी पर वो गाय मुझे देख के हैरान होगी कि इस ठंड और कोहरे में मैं बाहर क्या कर रहा हूँ। सूखी नाली के साथ साथ चलते वो खाने की तलाश में इधर उधर सूंघ रही है। गली के तीन आवारा कुत्ते मेहरा साहेब के गेट से सट्टे जाड़े से अपने आप को बचा रहे हैं। पुराना सा स्कूटर चलाते एक बुज़ुर्ग गली से धीरे धीरे निकल जाते हैं। मंकी कैप (बन्दर टोपी) के ऊपर पहनी हेलमेट की वजह से मैं पहचान नहीं पाता कि वो कौन हैं। मुझे क्या पड़ी कोई आये या जाये बस सूरज निकल आये तो बात बने। सर्दी में तो कीड़े मकौड़े भी नहीं दिखते। स्थाई के बाद ठुमरी का पहला अंतरा ही याद नहीं आ रहा।

सन 2024 की फ़रवरी आ गयी है पर धुंध कहो या कोहरा कम होने का नाम ही नहीं ले रहा। दो दिन हलकी बरसात भी हो चुकी फिर भी ये सफेदी बरकरार है। अब तक तो बसंत का पीला दिखना चाहिए था। असल में ये कोहरा भी मिलावटी है, इसमें बादल कम प्रदूषण ज़्यादा है। कहते हैं राम राज्य आ गया है शायद कोहरे के चलते दिख नहीं रहा।

भीगे पंखों में दुबके कबूतर बिजली की तारों पे बुत बने बैठे हैं न गर्दन हिल्ला रहे हैं ना आँखें, कहीं सर्दी में जम तो नहीं गए। देसी तीतरों का छोटा झुण्ड रोता और कराहता हुआ ऊपर से कहीं निकल जाता है जिसे मैं गर्दन टेढ़ी कर के भी देख नहीं पाता। सामने वालों के घर के बाहर लगे चीड़ के पेड़ की नुकीली सूईयों में कोहरे के टुकड़े अटक कर फंस गए हैं, ऊपर का पेड़ सफ़ेद और नीचे का हरा दिख रहा है। घरों की चारदीवारियों पे लगे पथरों से बूँद बूँद ओस टपक रही है जिसकी कोई आवाज़ नहीं आती। मामू होते तो कहते बिलकुल फैज़ाबाद जैसा लग रहा है। फिर फ़ैज़ाबादी !

किसी के घर में काम करने वाली एक बाई सामने की तरफ से तेज़ी-तेज़ी चल कर जा रही है। उसने अपने चेहरे को शॉल से ढक रखा है और अंदर कहीं चिपके मोबाइल से वो ज़ोर ज़ोर से किसी से बांग्ला में बाते कर रही है।  वो मुझे देखती भी नहीं और कुत्तों से बचती हुई तेज़ी से आगे बढ़ जाती है क्या पता नींद में ही चल रही हो, पापी पेट के लिए। इंसानी जिस्म के कई हिस्से पापी ही होते हैं या पाप करने के लिए ही बनाये गए थे। ‘कैसे कटें दिन रतियाँ ’।

मैं अभी भी खड़ा सोच ही रहा हूँ। हाथ जैकेट की जेब से बाहर निकाल में मुठियाँ घुमा कर कसरत का ढ़ोंग कर रहा हूँ। सामने सिर्फ गली के तीन-चार माकन दिख रहे हैं आलस में पस्त। पड़ोसियों के पेड़ पे दो गिलहरियाँ  पकड़म-पकड़ाई खेल रही हैं और उनकी कुतिया, जिसका नाम बिजली है, उन्हें झपटने की नाकाम कोशिश करती ज़ोर ज़ोर से भौंक रही है। बिजली के मुँह से भाप नुमा बादल निकल रहे हैं। गिलहरियों के मज़े हैं मैं  सोचता हूँ, इनकी खाल ही ऐसी है कि इन्हे कोट पहनने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती। ‘ऐ सर्द हवाओ’ – बेग़म  अख़्तर बुला रहीं हैं।

दो और काम करने वाली औरतें आती दिख रहीं है। हमारे पड़ोस के सभी घरों में सब लोग सो रहे होंगे मैं सोचता हूँ , किसी घर में भी तो बत्ती नहीं जल रही, ये औरतें शायद दूसरी लाइन में जा रहीं हैं। आख़िर मैं बाएँ हाथ को मुड़ कर चल देता हूँ। कोहरे में अपने कुत्ते को सैर कराते सामने से बंसल साहेब नमूदार होते हैं। कीचड़ और गली में रुके हुए पानी के जोहड़ों से बचता हुआ बंसल जी को दुआ-सलाम कर में आगे बढ़ जाता हूँ। पता नहीं क्यूँ ज़्यादा दूर जाने का और चलने का मन नहीं हो रहा पर करूँ भी क्या अभी आठ भी नहीं बजे, चाय बनने और पीने में तो अभी आधा घंटा है। ऊपर देखता हूँ , बादल घिरे हुए हैं शायद फिर बरसेगा। पर अभी बरसने के कोई आसार नहीं हैं। ‘तबियत इन दिनों बेगाना-ऐ-गम होती जाती है’

पार्क तक पहुँच गया हूँ – अंदर कोई नहीं है। सैर करने और चलने वाले ट्रैक पर जगह-जगह पानी जमा है, मैं बाहर ही सड़क पर टहलता आगे निकल जाता हूँ। दूर पार्क के कोने पे कोई है। धुंध में अंदाज़ नहीं हो रहा के कौन है। मैं अपनी चाल धीमी कर देता हूँ। वो पीपल का घना पेड़ है जो V 9 गली के मोड़ पे है उसकी कुछ शाखाएं नीचे को झुक आयीं हैं। उसी पेड़ के पीछे ही है कोई। पास में ही किसी ने दो साल पहले एक चौकर चबूतरा बनवा दिया था उस पर लोग पंछियों के लिए दाना छोड़ जाते हैं। अच्छी बात है पर कबूतर बहुत गंद फैलते हैं। इस सब चक्कर में बेगम से ध्यान हट रहा है।

एक महिला अचानक पीपल के चौड़े तने के पीछे से प्रकट होती हैं उनके हाथ में एक थैला है। उस थैले में से वो मिट्टी की रंग-बिरंगी मूर्तियां एक-एक कर के निकलती हैं और चबूतरे पे प्यार से सजा देती हैं। एक मूर्ति लुढ़क जाती है जिसे वो उठा कर तने के सहारे खड़ा कर देतीं हैं। मैं देख नहीं पा रहा हूँ कि मूर्तियां किन की हैं। फिर वो प्लास्टिक की थैली से दाना निकाल चबूतरे पे फ़ैला देती है। उनसे आँखे बचाता मैं सड़क के दूसरी तरफ टहल लेता हूँ। बड़ी कोशिश करता हूँ उधर न देखूं और कहीं मेरी आँख महिला से न मिल जाये। नहीं नहीं ये बेग़म अख़्तर कैसे हो सकतीं हैं। 

मैं सर झटकता हूँ वो महिला फिर थैले मैं हाथ डालती है और इस बार लाल रंग की एक चुन्नी निकलती है। मैं जानता हूँ सुनहरी गोटे के बॉर्डर वाली ये चुनरी देवी को पहनाई जाती है। महिला पेड़ की छल का मुआयना करती है और एक मुनासिब जगह देख चुन्नी को उस पर लटका देती है। फिर उसे हाथ लगा उसका आशीर्वाद लेती है।  इतनी देर नीचे झुकने से उसकी पीठ दर्द हो रही होगी वो अपनी पीठ को दोनों हाथों से पकड़ अब चुन्नी को निहार रही है। सामने पड़ी सब मूर्तियां अब मैं साफ़ साफ़ देख सकता हूँ। मैं आँखें नीची कर पेड़ को पार कर लेता हूँ पर जनता हूँ कि महिला मुझे देख रही है। मन ही मन मूर्तियों की गिनती कर मैं उन सब देवताओं के नाम दोहरा रहा हूँ। शिव, पार्वती, गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती, राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान। कौन नहीं जानता इन सब को। मन ही मन नमस्कार भी करता हूँ और अचानक मायूस महसूस करता हूँ। कुछ दिन पहले तक इनकी पूजा अर्चना होती होगी। अब शायद नई मूर्तियां आ गयीं होंगी या फिलहाल कोई त्यौहार नहीं होगा जब इन्हे पूजा जाना हो। हर काम वक़्त-ज़रुरत से ही तो होता है फिर वो चाहे भगवान का ही क्यों न हों।  

वो महिला उन सब को चबूतरे पे छोड़ कोहरे में कहीं गुम हो चुकी हैं। मैं पलट कर वापिस घर का रास्ता लेता हूँ इस बार हर मूर्ती को गौर से देखता हूँ । चटकीले रंगों में बनी और सलमा सितारों से सजी ये मूर्तियां बच्चों के खिलौनों जैसे ही लगती हैं। अनायास गुनगुनाता हूँ ‘वो जो हम में तुम में करार था’। उफ़्फ़, ठंडी सांस लेने से कुछ न होगा न ही इस बारे में सोचने से।

दाना खाने कोई पक्षी आया नहीं है। पेड़ की जड़ पे किसी ने सिन्दूर भी लगाया है। चूहे या गिलहरी का कुतरा बर्फी का एक टुकड़ा पत्ते के नीचे से झांक रहा है। आखिर हर मूर्ती, हर देव, हर भगवान् को इसी बैठक मैं आना होता है, यहीं पीपल के नीचे इन सब का जमघट्टा होता है। यहीं मिल जाता है भोजन और जल। यहीं भक्त भी आ कर मिल जाते हैं और फिर यहीं बन जाता हैं एक नया शिवालय। घर के पास, ‘अब दूर वाले मंदिर जाना नहीं पड़ेगा’

आखिर सब यहाँ पहुँच जाते हैं या पहुंचा दिए जाते हैं। वो ईश्वर जो की सब कुछ देख रहा है उसी के डर से इंसान, जो इन मूर्तियाँ को फेंक भी नहीं सकता, इन्हे यहाँ ले आता है या ले जाता है किसी नदी और तालाब में बहाने को । पीपल, नदियां, समंदर शायद सब भगवानों का कलेक्टिव घर हैं। यकीन मानिये – न पीपल को न ही यहाँ विराजमान किसी प्रतिमा और भगवान को कोई आपत्ति होगी अगर आप बुद्ध, तीर्थांकर या बाबा नानक की तस्वीर, सलीब पे चढ़े इसु, अल्लाह का कोई फरिश्ता या यहूदी बाबा को यहां छोड़ जाते हैं । ये सब, बिना एक दूसरे को परेशान किये, यही इकठ्ठे रहेंगे बिना किसी नफरत या झगड़े के, दोस्तों जैसे। ‘हमरी अटरिया पे आजा ओ साँवरिया’, हम सब की तरफ से बेग़म इन्हे फ़रियाद कर रही हैं। 

बाज़ रोज़ कोहरा या धुंध बहुत कुछ छुपा लेता है हमेशा के लिए और सर्दी तो बहुत ज़ालिमाना तरीके से बदला लेती है ख़ासकर दिल के मरीजों से । घर पहुँचते ही बुरी ख़बर मिलती है। एक और दोस्त चल बसा। कोहली साहेब नहीं रहे। 1 फरवरी सुबह 4  बजे दिल के दौरे से गुज़र गए। ‘मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे’, अख़्तरी बाई को ख़बर पहले ही पहुँच चुकी थी कि उनका चाहने वाला रुख़सत हो चुका है।

अगर हम लोग अपने दोस्तों की यादों को, उनकी तस्वीरों को अपने दिल से लगा के रख सकते हैं तो ये लोग अपने इष्ट को क्यों पीपल के नीचे क्यूँ छोड़ आते हैं ?

Finally they all congregate under a peepul tree

Ma, Patna, and her early days

इनमें से एक मुहम्मदी है, एक ओल्गा है और एक है मेरी माँ। ये तस्वीर पटना की है, साल रहा होगा 1950 जब माँ BNR Training College, गुलज़ार बाग, पटना से टीचर्स ट्रेनिंग कर रही थीं । ये 6 लड़कियां माँ की दोस्त और क्लास वाली थी जबकि इनके पीछे चश्मा पहने इनकी टीचर खड़ी है। ये सब हॉस्टल में रहती थीं। माँ के सिवा अब कौन कहां है कोई पता नहीं । माँ दाहिने से तीसरे नंबर पर हैं। 

माँ (यानि कृष्णा ग्रोवर अरोरा) बताती हैं कि ये तस्वीर १५ अगस्त या उसके आस पास की है। उस दिन कॉलेज में कुछ प्रोग्राम हुआ था कोई अंग्रेज़ ट्रेनर आए थे। ये लड़कियां आये हुए मेहमान के लिए कुछ गा रहीं है, मेहमान सामने शामियाने के नीचे बैठे होंगे। टेंट की रस्सियाँ साफ़ दिख रही हैं। सोचिए ये प्रिंट ७३ साल पुराना है और अब भी ताज़ा सा ही लगता है और इन सब में माँ तो गज़ब दिख रही हैं 

माँ अब इस तस्वीर में से किसी को नहीं पहचान पाती, बावक्त अपने आप को भी नहीं। कॉलेज की अपनी इन दो दोस्तों के नाम के सिवा मां को कभी-कभी उस वक्त के कुछ और नाम भी दस्तक देते हैं जैसे “वॉयलेट” और मिस दासगुप्ता। “वॉयलेट सच मुच का नाम है” वो दोहराती हैं और कहती हैं “वो मेरी पक्की सहेली थी”। वॉयलेट के साथ गप लगाना और एंब्रॉयडरी करना उन्हें याद भर है।

“आपकी साड़ी का रंग या प्रिंट क्या रहा होगा ?” मैंने पूछा। “बॉर्डर लाल, हरा या नीला हो सकता था पर कॉलेज के दौरान साड़ी सिर्फ और सिर्फ सफ़ेद ही पहन सकते थे, हां छुटी के दिन या जब  कॉलेज से बाहर जाते थे तो अपने पंजाबी सूट पहन कर और दो गुत्त (braids) बना कर जाते थे। फंक्शन वाले दिन तो टीचर बताती थी के क्या पहनना है।” 

लाहौर जैसे फैशन परस्त और खाने-पीने वाले शहर से आई बीस साल की अल्हड़ के लिए कैसा रहा होगा 1950 का पाटलीपुत्र बनाम पटना। कैसे रहे होंगे पटना के जवां लोग, स्कूल और टीचर, बाज़ार, दुकानें वहां के सिनेमाघर, रेस्टोरेंट या मस्ती की दूसरी जगह, आज़ादी के बाद का वहां का माहौल। कैसी होगी वहां की राजनीति जब बाबू राजेंदर प्रसाद राष्ट्रपति बन दिल्ली आ चुके थे और कृष्ण सिंह सिन्हा बिहार के मुख्य मंत्री थे, वो जिन्होंने प्रदेश से जमींदारी खत्म कर ज़मीन काश्तकारों के हाथों में दे दी ।

कॉलेज में बिताए दो साल में हुई कुछ ही चीज़ें माँ को याद हैं ।

वो लोग जो अपने माजी को भूल सकते हैं बहुत खुशकिस्मत होते हैं, वो अपने दिलो दिमाग पे बोझ ले कर नहीं जीते।

पटना कॉलेज में ये लोग हॉस्टल में रहते थे। लड़कियों के हॉस्टल की कहानियां हम बेटों से कभी साझा नहीं की गईं , बेटी को कुछ का पता है जो भाइयों को बतलाई नहीं जा सकती। उन दिनों की शरारत और बदमाशियों का जिक्र भी कभी कभी बातों में आ जाता है जिसमे ज्यादातर बिना इजाज़त लिए फिल्म देखना सबसे ऊपर है । कुछ वाक्यों में किसी ख़ास शख़्स को दोस्त बनाना, परदे वाले रेस्टोरेंट में चाय के लिए जाना या फिर ख़त लिखना और मिलना शामिल है। 

इन सब ने टीचर्स ट्रेनिंग के बाद अपने अपने घरों को रूखसती की और अलग अलग सूबों में मास्टरनी की नौकरी कर शादी के लिए तैयारी शुरू कर दी। बटवारे में बेघर हुई पंजाबी कौम अगले तीन चार साल बाद भी अभी अपने पैर नही जमा पाई थी, मिडिल क्लास लड़कों के पास अच्छी नौकरियां नहीं थीं या उनका अपना कारोबार पूरी तरह सेट नही हुआ था जिसके चलते पढ़ी-लिखी और नौकरी कर कमाऊ लड़कियों के लिए लड़कों की कमी थी ।

झरोखों से निकली रौशनी की तरह गुज़रे वक़्त की महीन यादें माँ के दिल की दीवार पे सिनेमा सी चलती होंगी तभी तो उनके बात करने के लहजे से लगता है जैसे कहीं बीच में वायलिन का एक तार खींचा गया और कहीं धप सी मृदंग की थाप आई। आजकल सुबह माँ की आँख खुलते ही ज़िन्दगी का एक गुज़रा मंज़र उनके सामने आता है। पुरानी यादों से भरा पर ऐसा तरो-ताज़ा कि रात को किसी ने बचपन और जवानी की यादों पे पड़ी धूल को एक हिस्से से साफ़ कर दिया हो और उस हिस्से की यादें ज़ुबान पे रपटती तेज़ी से बहार आने को बेचैन  हों। सुबह की पहली चाय के साथ उन यादों को ऐसे बयान करती हैं जैसे वो ‘रात-बीती’ ही हों। 

आज सुबह दो बार कोशिश करने पर भी कंधे पे शॉल नहीं डाल सकीं सो रजनी ने ओढ़ा दी। अपने दायें कंधे की तरफ ऊँगली करते हुए कहती हैं, “मेरा कन्धा बहुत दर्द कर रहा है। रात जेनेट ज़ोर से लिपट गई और देर तक उसने मुझे भींचे रखा। अस्मा ने उसे मना भी किया पर वो फिर भी सीने से लगी रही। शायद रो रही थी।” एक मिनट के लिए रुकीं, फर्श पे कुछ देखा फिर बेड की तरफ़ और फिर बोलीं ‘जेनेट रात यहीं थी, सुबह ही गयी होगी’। सवालिया निगहाओं से बिस्तर को भी कुछ पूछ रहीं थी जैसे वो ही इस सब का ज़िम्मेवार हो। 

हम दोनों, रजनी और मैं, भौंचके खड़े माँ को देखते रहे। ‘जेनेट’ और ‘अस्मा’ हमारे लिए दो नए नाम थे। अब ये दो कौन हैं और कहाँ से आ गईं? रोज़ बरोज़ नए किरदार जुड़ते जा रहे हैं। चाय के दूसरे कप के साथ बात आगे बढ़ी। लो अब और दो नाम यादाश्त से फिसल कर बाहर आये। बानो और मोहंती। ये दो भी क्लास में साथ पढ़ने वाली सहेलियां थीं। उपनाम मोहंती वाली लड़की का पहला नाम याद नहीं आया। “हॉस्टल की रसोई जेनेट की निगरानी में थी वो ही रोज़ की सब्ज़ी-दाल तय करती थी। चावल तो दोनो वक़्त बनते थे पर रोटी एक ही वक्त। जेनेट हम सब से भी रसोई का काम कराती थी, मेरी जिम्मेवारी खासकर टमाटर काटने की थी। बहुत टमाटर कटवाएं हैं उसने मुझसे। मुझे रसोई का काम करना बिलकुल अच्छा नहीं लगता था।”

मुँह सा बना कर हाथ में पकड़ा चाय का मग माँ मेज़ पर रख देती हैं और कुछ सोचने लगती हैं। पूरी ज़िन्दगी उन्हें खाना बनाना या रसोई का काम बिलकुल अच्छा नहीं लगा, कभी नहीं । बड़े फ़ख्र से ख़ुद ही बताती हैं ‘शादी के पहले दो साल हम सिर्फ बाहर ही खाते थे।’ 

मुझे नहीं याद हमारे घर में कभी भी ‘पकवान’ बने हों। सादा खाना जो काम से कम मेहनत से और जल्द से जल्द तैयार हो सके ताकि रसोई से वो निपट जाएँ उनकी कमज़ोरी थी। मुझे और मेरी बड़ी बहन को चाय-काफी बनाना, आटा गूँधना, सब्ज़ी (ख़ासकर प्याज़) काटना, दाल धोना, बैंगन भूनना, अंडा उबालना, ब्रेड सेकना उस पर मक्ख़न या जैम लगाना, दही मथना आदि-आदि कच्ची उम्र में ही सीखा पढ़ा दिया गया था। उनकी पसंद की सब्ज़ियों का दायरा भी बड़ा नहीं था – आलू, आलू-गोभी, आलू-बड़ी, आलू-टमाटर, आलू-मटर, आलू-प्याज़, छोटे-आलू – और कभी दिल किया तो बैंगन का भुर्ता। 

सिर्फ खाना बनाना ही क्या माँ को घर का कोई काम करना कत्तई पसंद नहीं था। उनके लिए ये मजबूरी थी अपने घरवाले और बच्चों को पालने-पोसने के लिए। माँ का बस चलता और अगर उनके पास पैसा होता तो वो घर का कोई काम कभी न करतीं। झाड़ू-पोछा, बर्तन-भांडे, कपडे धोना और इस्त्री करना, डस्टिंग, साफ़ सफाई सब ‘किसी और’ के काम थे, उनके नहीं। छोटी उम्र में ही मैंने कपडे धोना सीख लिया था। माली हालत कैसे भी रहे हों कपडे प्रेस करने वाले भैया का साथ हमारे बचपन से रहा है। 

सिर्फ घर के काम ही नहीं, यकीन मानिये (मैंने ये पढ़ कर उन्हें सुना भी दिया है) अपने कपड़ों, जी हाँ उनके अपने पहने कपड़ों, खासकर साड़ी को तह कर अलमारी में रखना उन्हें बिलकुल नहीं भाता था। ये काम पिता जी का था। तब भी उन्हें पसंद नहीं था, आज तो ख़ैर 90 साल की उम्र में बिलकुल भी नहीं, आजकल साड़ी, शाल वग़ैरह हम ही तह कर देते हैं या वो उसे गोल मोल कर अलमारी में लुढ़का देती हैं।  

अमूमन स्कूल-कॉलेज से जुड़ी यादें कम ही भूलती हैं पर माँ ने बहुत कुछ शायद जान बूझ कर भुला दिया था या दिमाग के किसी अँधेरे कोने में धकेल दिया जो अब रिस रहा है । “पार्टीशन की मार-काट उसका दर्द और अपना घर आंगन बचपन में ही लुट जाने का बड़ा मलाल है मैं बीते वक्त के बारे में नहीं सोचना चाहती।” ऐसे ही कुछ शब्द माँ ने लाहौर में भी कहे थे जब हम उनका और पिता जी का घर ढूंढने पाकिस्तान गए थे। 

हमारे नाना, जो लाहौर में थानेदार थे, बटवारे के बाद परिवार को हिंदोस्तान में छोड़ खुद काम के लिए काबुल, अफगानिस्तान चले गए। वहां कारोबार जमा नहीं तो सिंध से बीकानेर होते हुए वापिस दिल्ली आ गए। हमारे नाना-नानी के दस बच्चे थे, पांच बेटियां और पांच बेटे, मां का नंबर उपर से चौथा है। दस में से अब कुल चार ही बचे हैं, तीन बहने और एक भाई ।

हमारी माँ की सबसे बड़ी बहन, जो माँ से करीब 12  साल बड़ी थीं, रोहतक में ब्याही थीं, वहां के आर्य स्कूल में सीनियर टीचर थीं सो मां पटना से सीधे रोहतक उनके पास चली आईं । वहां आ कर पहले एक लोकल ट्रेनिंग कॉलेज में लड़कियों को टीचर बनने में ट्रेन करने लगीं और फिर एक प्राइवेट स्कूल में टीचर की नौकरी करने लगीं ।

रोहतक में ही माँ की शादी उस परिवार में तय कर दी गई जिन्हें नाना लाहौर से जानते थे । इन दोनो की शादी का न्यौता  सरकारी पोस्टकार्ड के पीछे पिता जी की बहन ने छपवाया था जिन्होंने उनका ब्याह पक्का किया था। एक अकेली बहन के सिवा पिता जी का और कोई नहीं था। उनकी मां और पिता दोनों बटवारे से पहले ही गुज़र गए थे, एक भाई था जो शायद दंगों में मारा गया। बहन का लाडले होने की वजह से पिता जी बिगड़ैल थे। इधर ज़माने से आगे चलने वाली, तेज तर्रार, हॉस्टल में रही, नौकरी से लैस टीचर को बिगड़े नवाब को सीधा करने में कोई वक्त नहीं लगा । 

रोहतक में शादी बना ये जोड़ा दिल्ली के करोल बाग़ इलाके में आ बसा। हमारी बुआ का कोई बच्चा नहीं था।  ये अकेला छोट भाई था जो उन्हें जान से भी प्यारा था। बुआ और फूफा ने बड़े प्यार से पाल पास कर बड़ा किया था सो शादी के बाद उसे आसानी से अपने से अलग भी नहीं पाए। पर नई बहु (हमारी माँ) को शायद अपनी आज़ादी और प्राइवेसी दोनों ही पसंद थे। नए ख़यालात नया रेहन-सहन और आने वाली औलादों के लिए तालीम पे ज़ोर देने वाली ने घर जल्द ही अलग कर लिया हालांकि खाना बनाने की सलाहियत न होने की वजह से कुछ महीने रसोई बुआ के यहाँ से ही चलती रही। घर पास पास ही थे सो वैसे भी सुबह शाम मिलना चलता रहा। 

अपना मायका भी दूर था, दो बड़ी बहने और दो भाई शहर से बाहर। हमारी नानी भी सेहत से कोई ज़्यादा अच्छी नहीं रहती थी और उनके पास तो अपने ही कई मसले थे। इन्हे फिल्म देखने का शौक़ ऐसा था कि घर लिबर्टी सिनेमा के ठीक सामने रोहतक रोड पे ले लिया। बस फिर क्या था, बच्चों को सुलाओ बाहर से ताला लगाओ सड़क पार करो और नाईट शो के लिए घुस जाओ। 

​सहस्तर का फूल

​सहस्रताल टिहरी गढ़वाल की भीलांगना घाटी के विकराल पर्वतों पर स्थित एक भीषण ताल है जो कि बहुत दुर्गम है। स्थानीय ग्रामीण जन सहस्रताल को “सहस्तर” पुकारते हैं और कहते हैं – ‘जर्मन की लड़ाई’, सहस्तर की चढ़ाई । सहस्रताल की यात्रा से लौटने पर एक दिन मैंने यह कामना की:

काश में सहस्तर का फूल होती। कोई हृदयहीन हाथ मुझे तोड़ता तो मेरी डाल के असंख्य महीन कांटे उसमें विषैले डंक मारते। … मेरा पवित्र एकान्त भंग करने वहाँ बेहया भीड़ न होती। कोई इक्का-दुक्का दर्शक वहाँ आता भी तो भीषण डांगरों को पार कर प्रचन्ड वन से गुज़रता एक एक चट्टान पर पैर जमाता, भूख प्यास सहता, अथक श्रम और साहस से हाँफता यहाँ तक पहुंचता और उन ऊँचाइयों पर मुझे खिला पाकर किसी अज्ञात भाव में डूब कर मुझे देखता।

काश में सहस्तर का फूल होती। मैं बिकती नहीं सजती नहीं, मैं किसी फूलदान में कैद न होती, अर्थियों पर न होती, मैं बगीचे में न होती, मैं किसी जूड़े का गहना न होती, मैं किसी के प्रेम का प्रतीक न होती, मैं किसी मन्दिर में न होती।

मैं सहस्तर के भयावह दुरुह तट पर खड़ी ऐन अपनी जड़ों पर होती।

​​ज्योत्स्ना शर्मा​, ​सहस्तर का फूल 

Coming down from Sahastratal after two most stunning but grueling days of the trek. With mashals in hand this an amazing picture where Rastogi ji, Puran Jangpangi can be recognized.