विरासत में मिले दुःख

दुःख हमे विरासत में मिलते हैं और सुख कभी विरली लाटरी लगने पर ज़िन्दगी के तिराहे पे। या फिर सुख के पल फिल्मों में देखे और किताबों में पढ़े जाते हैं। सुख एक फ़लसफ़ा है जिसके बारे में बात की जा सकती है जबकि दुख और दर्द सचाई है जो महसूस की जाती है, झेली जाती है।

आजकल मेरी मेज़ पे दर्द और दुखों का एक पुलंदा पसरा है जिसे हाथ में उठा सुबह शाम मैं सुबक लेता हूँ, रो लेता हूँ और हज़ारों लाखों परिवारों के साथ हुए शर्मनाक और दर्दनाक हादसों, क़त्लेआम, लूट-पाट, आगज़नी, फ़साद और तशद्दुद के बारे में सोच के भी काँप उठता हूँ। दो मुल्कों के जिन करोड़ों लोगों पे ये सब बीती उनमे से लाखों तो कुछ महीनों चली इस दरिंदगी और वहशत में मारे गए, कुछ जो मरे नहीं और जिन्होंने ये सब देखा वो सालों ज़िंदा रह कर भी रोज़ मरते रहे। जाने कितने सौ गुमनाम पागलख़ानों और अस्पतालों में सड़ते रहे और हज़ारों लोग उस ग़म के बोझ को ढ़ोते हुए बाकि बची ज़िन्दगी को ज़िंदा लाश सा काटते भर रहे।

दुखों के ये  पुलंदा एक क़िताब है जिसका नाम है – “10,000 दुःखद यादें: बटवांरे की ज़िंदा तारीख़”

मैं नहीं कहूंगा कि आप ये किताब पढ़ें। रहने दें, मत पढ़ें। इसे पढ़ने पर आपको अपने उस वक़्त के समाज और सोहबत पे, अपने मुल्क पे, अपने बुज़ुर्गों पे, अपने आप के इंसान होने पर भी शर्म आएगी। पर अगर आप समाज के लिए तिनका भर भी अच्छा करना चाहते हैं तो अपने बच्चों को ये पढ़ कर सुनाएँ, सिर्फ इसलिए की वो हैवान ना बने।

इन दस हजार दर्दनक यादों के जहन्नुम में एक दुखद किस्सा मेरी माँ और उनके परिवार की यादों का भी है। इनमे कुछ तो ऐसे वाक़िये हैं जो वहशत की हद के भी पार जाते हैं जिन्हे पढ़ या सुन कर आपका दिल दहल जायेगा।

​मैंने मंटो और इस्मत के सारे अफसाने पढ़े हैं, उनको पढ़ कर भी मैं रोया हूं, वो भी उसी वहशत और उसी वक्त को बयान करते हैं पर उनके किरदारों को मैंने सिर्फ समझा और महसूस किया था – पर इस किताब में मैंने उनके जैसा कई किरदारों की तसवीरें भी देखी हैं जो सचाई को और भी भयानक बना देती है​ ।

तारीख़ के इसी हिस्से को बयां करते कई पंजाबी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी अदीबों को मैंने पढ़ा है उनके किरदारों के दर्द से मैं वाकिफ हूं पर यहां इस क़िताब में उन लोगो को चेहरे मिल गया है, तसवीरों वाले ये लोग उस वक्त की गवाही देते हैं, मुझ से बात करते हैं, सामने आ खड़े होते हैं, जवाब मांगते हैं, जिरह करते हैं और मैं उनसे आंखें नहीं मिला पाता, बिलकुल वैसे ही जैसे मेरे वालिद बतलाते थे और मैं सुन्न पड़ जाता था।

क्यों संजोते हैं हम दुखों को, किसके लिए? क्यों इक्कठा करते हैं, क्यों लिखते हैं, क्यों कुरेदते हैं उन्हें सालों साल?

मैं नहीं समझता कि दुख बांटने से कम होते हैं या मन हल्का होता है। लिखे हुए दुख तो फैलते ही जाते हैं एक पीढ़ी से दूसरी से तीसरी, ख़त्म ही नहीं होते, भूलने ही नहीं देते आगे आने वाली नस्लों को भी। और फिर इन किताबों को इन यादों को पढ़ कर, समझ कर कौन सीखा है आज तक? इन से मिली सीख या शिक्षा से कहाँ कम होती हैं त्रासदियां। आज का समय ही देख लीजिये – कौन रोक पाया है ग़ाज़ा में हो रहा नरसंहार। और क्या सबूत चाहिए हमे – अकेली  20वीं शताब्दी में ही जंग से करीब 11 करोड़ लोग मारे जा चुके हैं। 

दुखों और दर्दों का ये पुलंदा  बहुत भारी है।

10,000 Memories: A Lived History of Partition
(Independence and World War II in South Asia – Book 1 – West Side)
Published 2023 by: The 1947 Partition Archive, Berkeley, California. Rs. 4100, pp 724

ये क़िताब अगस्त 1947 में हुए एक मुल्क के बटवारें के बारे में है, अपने घरों, अपनों और अपनी ज़मीन से बेदखल हुए लोगों की है जिन पर ख़ुद एक दूसरे ने ही ज़ुल्म किये। हिन्दुस्तान और पकिस्तान से मेरी पीढ़ी के कई लोगों ने अपने माँ-बाप, दादा-दादी, दोस्तों और करीबी रिश्तेदारों को उम्र भर भयानक यादों से जूझते देखा है। मैंने तो देखा है। ये क़िताब उन दर्दनाक यादों की है और उस बोझ की है जो विरासत में ये लोग हमारे लिए छोड़ गए हैं।

ऐसा माना जाता है कि अपने पूरे जीवन में आदमी दुःख अधिक झेलता है और उसकी खुशियों के दिन कम ही होते हैं।  गूगल बाबा को खंगालने से भी ये नतीजा ही निकलता है। वो तो यहाँ तक बताते हैं कि पिछले दो हज़ार साल में लिखे गए साहित्य में दुखद कहानियां की तादाद कहीं ज़्यादा है। ट्रेजेडी या दुखद अंत तलाशना अधिक सम्मोहक होता है। फिल्मों में भी ख़ुशी की तुलना में अभी तक ट्रेजेडी ही ज़्यादा बिकती है। याद कीजिये दिलीप कुमार और मीणा कुमारी को।

हमारे धर्म ग्रंथों में भी तो ​कितने सारे दुख दर्शाए गए हैं। रामचरितमानस को ही ले लीजिये – श्रवण कुमार के माता पिता का दुःख, राजा दशरथ का दुःख, बनवास को जाते हुए राम की माता का दुःख, भाई भरत का दुःख, अयोध्या वासियों के दुःख, वनवास में राम, लक्ष्मण और सीता के कितने ही दुःख, स्वरूप नख का दुःख, सुग्रीव का दुःख, सीता हरण का दुख, लंका नरेश रावण और उसके भाईयों और बेटे के वध का दुख और फिर अंत में सीता को घर से निकाले जाने का दुख। ईसा मसीह के सूली पर चढ़ाये जाने का दुख, कर्बला की जंग में अली हसन की शहादत का दुख। कितने गिनोगे ?

इस क़िताब में सच्ची दास्तानें हैं, आप बीते और झेले ज़ुल्म और ग़म हैं। इतने दर्द हैं कि एक को पढ़ने के बाद लगता है दूसरा किसी और जनम, किसी और साल में पढ़ेंगे। आपने कभी कहीं सुना है कि एक माँ अपने नए जन्मे बेटे को अस्पताल में इस लिए छोड़ आयी क्यूंकि उसे पैदा करने वाली दाई दूसरे मज़हब की थी। अपने जीते जी कितने किस्से आपने सुने हैं जहाँ घर के एक बड़े ने अपने हाथों से अपने दो मंज़िला घर को आग लगा दी हो जिसमे उस वक़्त उसकी तीन बेटियों और माँ अंदर रही हों । लोहे की आँखें, पत्थर दिल और बेग़ैरत जिगरा हो तो आगे पढ़िए वार्ना यहाँ से वापिस लौट जाइये ।

नीचे लिखे कुछ हिस्से इस अंग्रेज़ी की किताब से हिंदी में अनुवादित किये गए हैं। इन सब को आप से साँझा करते अच्छा तो नहीं लग रहा पर ये सच्चाई मैं छुपा भी नहीं सकता। बहुत ही भयावह और दर्दनाक घटनायें,  वारदातें, प्रसंग और वृत्तांत नहीं दे रहा हूँ।  बस वो जिन से आपको इन दुःखद यादों और  ट्रेजेडी का अंदाजा हो जायेगा।

किताब शरू होते ही पहले कुछ पन्नो में पाठक को ये सलाह दी गई है

पाठक को समझ और विवेक से सोचने की सलाह दी जाती है। इस पुस्तक की सामग्री कुछ पाठकों के लिए भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है। गवाहों की यादों में सांप्रदायिक हिंसा, आत्महत्या, अपहरण, ऑनर किलिंग, युद्ध, लैंगिक हिंसा, क़त्ल, मौत, माली नुकसान, दंगे, चोरी, धार्मिक समूहों के प्रति अपमानजनक भावनाएं और हिंसक घटनाओं के मनोवैज्ञानिक प्रभावों से निपटने पर संभावित रूप से परेशान करने वाली यादें शामिल हो सकती हैं। पाठक को विवेक से काम लेने की सलाह दी जाती है और 18 वर्ष से कम आयु के युवाओं के लिए माता-पिता के मार्गदर्शन का अनुरोध किया जाता है।

नीचे दिए गए लोगों के नाम, उनके घर गावँ या शहर के नाम सब सच्चे और असली हैं 

बेअंत सिंह रावलपिंडी से मेरठ आए
मेरा जन्म पुंछ कश्मीर में हुआ था। जब मेरा जन्म हुआ, तो कश्मीर में बहुत बर्फबारी हुई थी। इस वजह से, मेरे जन्म देने के बाद हम 15 दिनों तक अस्पताल में फंसे रहे। वहां मेरी देखभाल करने वाली महिला और मुझे खाना खिलाने वाली महिला मुस्लिम थीं। जब मेरी मां को उनके धर्म के बारे में पता चला, तो उन्होंने मुझे घर ले जाने से इनकार कर दिया और मुझे मुस्लिम महिला को सौंप दिया कि वह मुझे अपनी औलाद की तरह पालें। पहले पाँच सालों तक मैं अपने परिवार को नहीं जानता था। जब मेरे पिता की मौत हुई तो मेरी माँ ने रावलपिंडी वापस जाने का फैसला किया। इस समय मेरी देखभाल करने वाली और गोद ली हुई माँ ने मेरी असली माँ से मुझे वापस ले जाने के लिए कहा क्योंकि वो मेरी ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकती थी। ये पहली बार था जब मैं अपनी मां और भाई-बहनों से मिला था। हालाँकि मेरी माँ मुझे वापस ले जाने के लिए राज़ी हो गई थीं, लेकिन उसने कभी भी मेरे साथ मेरे दो भाइयों जैसा सलूक नहीं किया इसलिए 14 साल की उम्र में मैं हिन्दुस्तान चला आया।

न. क., (पूरा नाम नहीं बताया), ये शहीद भगत सिंह नगर जिले में रहती थीं   
जब हमारी माँ हमारे लिए दूध लाती थी, तो हमें डर होता था कि दूध में जहर है और हम ये सोचते थे कि इससे पहले कि भीड़ हमारा अपहरण और बलात्कार कर सके, हमारे पिता ने हमें मारने का फैसला किया था। जब मेरे पिता ने आस-पास के गाँवों से मुसलमानों को बाहर निकाल भगाया, तो हमारा सामूहिक भय समाप्त हो गया।

रोशन लाल, भरमौर, चम्बा से
बटवारे की अफ़वाहों के चलते हिन्दू बिरादरी के लोगों ने दर फैलाया और इसे  मौका बना कर मुस्लमान लोगों को इस इलाके से निकाल दिया।

खान हुसैन ज़िआ, जालंधर से लाहौर गए
क़त्ले आम, रिफ़्यूजी लोगों की परेशानियों और बटंवारे के बीच लाहौर में तेज़ बाढ़ आ गई। वहां दो लोगों की ड्यूटी ये लगाई गई की लुटे हुए सामान को कैसे बाटना है।

देवराज सिक्का, जमपुर पाकिस्तान से लुधिअना आये
अक्टूबर के महीने में, महात्मा गांधी ने पाकिस्तान से आये हुए शरणार्थियों से शहर के मुस्लिम निवासियों को बेदखल ना करने का आग्रह करने के लिए पतिपन का दौरा किया। फिर भी कुछ दिनों बाद शरणार्थियों ने मुसलमानों को जबरन बाहर ​निकाल दिया। मुझे खेद है कि हमें खाना पकाने के ईंधन के लिए कई घरेलू पुस्तकालयों में कुछ ऐतिहासिक पांडुलिपियों को जलाने के लिए मजबूर होना पड़ा।​

कृष्ण
दोनों तरफ अपने ही लोग थे, दोनों क़ौमों मिल जुल के रहती थीं, दोनों मज़हब के लोगों भी मुहल्लों में इकठा ही रहते थे, हैरत है फिर भी ये सब हुआ। आख़िरकार जब हम पटियाला आ गए, तो बच्चा होते हुए भी मैंने मज़दूरी की था और एक साल तक स्कूल नहीं गया। मैं अलग-अलग गांवों से अंडे इकट्ठा करता और लोगों को घर घर जा के बेचेता था।

अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला के पिता बनारसी लाल चावला शेखपुरा, लाहौर से करनाल आये
लोग अपना सामान ट्रेन में चढ़ाने लगे। पर उनके चढ़ने से पहले ही ट्रेन उनका सामान लेकर रवाना हो गई।  वहाँ एक खाली मस्जिद थी जहाँ हम लगभग नौ साल तक रहे। मैंने टॉफियाँ बेचकर कुछ पैसे कमाए उस से ज़्यादा कमाई नहीं होती थी। आख़िरकार मैंने मस्जिद में रहते हुए शादी कर ली और मेरी पत्नी की तीन बेटियाँ और एक बेटा था। हमारी सबसे छोटी कल्पना थी।

मिल्खा सिंह, (नामवर धावक)  बस्ती बुखारी, कोट अड्डू मुज़फ़्फ़रगढ़ से दिल्ली आये
मैंने अपने पिता को बहादुरी से लड़ते हुए देखा और मुझे उन पर तलवार से हमला होते देखना याद है। जब वह घायल हो कर गिर गए, तो वह चिल्लाये, “भाग मिल्खा, भाग”, ये कहते हुए हुए कि मैं अपनी हिफाज़त के लिए भाग जाऊं।

1947 का विभाजन अधिक जटिल था क्योंकि दोनों पक्ष पीड़ित भी थे और अपराधी भी। वर्ल्ड वॉर 2 वाले यहूदियों के प्रलय में एक तरफ के लोग, जर्मन, अपराधी थे और दुसरे शिकार ग्रस्त या पीड़ित थे। उसे हिंसा को समझना आसान था क्योंकि आघात को एक तरफ और अपराध को दूसरी तरफ जिम्मेदार ठहराया जा सकता था।  – अनिरुद्ध काला ,1947 में पैदा हुए

शेर सिंह कुक्कल (सिख), बफ़ा, खैबर पख्तूनख्वा से गोरखपुर आये
सन 1947 में कई लोगों ने धर्म और पहचान बदलना शुरू कर दिया था । 10 अगस्त से पहले, एक रात धमकी देने वाली मुनादी हुई और हमारे मुस्लिम दोस्तों ने हमें अचानक होने वाले हमले की चेतावनी दी। उन्होंने एक ट्रक मंगवा कर हमें महफूज़ जगह पर ले जाने का इंतज़ाम किया।

इकबाल बीबी, क्वेटा, बलूचिस्तान से होशियारपुर, पंजाब  आयीं
मुझे अपनी इज़्ज़त और अपनी जान का डर था। मैंने खुद को कीचड़ और गंदगी में छिपा लिया ताकि मैं उन के लिए बदसूरत दिखूं और वो मुझ पर ध्यान ही न दें। दंगाई  ख़ासतौर पे रिफ़्यूजी कैम्पों में रहने वाली और अच्छी दिखने वाली औरतों को अगुवा कर उनका बलात्कार कर रहे थे।

अवतार कौर ढिल्लों मुज़फ्फराबाद कश्मीर से जम्मू आयीं
मुझे सब साफ़ साफ़ याद है।  हमारा परिवार भागने के दौरान अपना कोई भी सामान नहीं ले जा सका, इसके बजाय बुजुर्गों ने हमारे घर में आग लगा दी और हमारे पास जो कुछ भी था उसे जला दिया। मुझे याद है कि बड़ी उम्र के लोगों ने अपने बच्चों की प्यास बुझाने के लिए गीली मिट्टी को कपड़े की थैलियों में रख उसमे से निचोड़कर पानी निकाला । हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं था।  मेरी दो बहनों की पुंछ में मौत हो गई।  कई लोग भूख से मर गए और बच्चे दूध की कमी से मर गए।

सुचवंत सिंह, कोटली मुज़फ़्फ़रबस्द कश्मीर से श्रीनगर कश्मीर
अपने घर से निकल जब हम अगले गाँव पहुँचे, तो हमने फिर से अपनी माँ और भाई-बहनों के बारे में पूछा। वहां के लोगों ने मेरी दादी को बताया कि उनके परिवार के एक सदस्य ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए मेरी मां और बहन को मार डाला है। मेरी चचेरी बहनें जिनका अपहरण कर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया था, वे सीमा के दूसरी ओर आज तक रहती हैं।

मोहम्मद इक़बाल, भारेवाल, सियालकोट से (बचपन का नाम – मदन )
हिंसा के दौरान मेरे दादाजी को उनके गन्ने के खेत में घात लगाकर मार दिया गया । उनकी हत्या के बाद, मेरे परिवार ने इस्लाम धर्म अपना लिया और हमने मेरे दादाजी को गांव में ही दफना दिया। मेरी आखिरी इच्छा है कि समय के खिलाफ दौड़ हारने से पहले मैं अपनी बहन महिंदर जी से आखिरी बार मिलूं। बटवारें के दौरान मुझे बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा – सबसे बड़ी कठिनाई मेरे माता-पिता और भाइयों से अलग होना थी। जब मैं अकेला होता था तो रोता था।

नूर दीन के पुत्र लालदीन सिंह, जिनका परिवार तंगोरी, चंडीगढ़ से पस्सु पाकिस्तान गया
जब परिवारों को छुपते हुए या दुश्मन से बचते हुए रिफ़्यूजी कैंप में जाना पड़ता था, या सरहद को पार करना होता था, तो कुछ डरपोक लोग अपने बच्चों को पीछे छोड़ देते थे, क्योंकि बच्चे अक्सर शोर मचाते थे, जिससे भागने वाले पकडे जा सकते थे या उस से पूरे परिवार मारा जा सकता था।

विलायत खान, (गायक) गोस्लान पिंड, लुधियाना से पाकिस्तान में सर्गे चले गए
सदमा इतना था कि वहां पहुँचने के बाद मैं गाना भूल गया, इनमे वो गीतों और कविता भी शामिल थे जो मैं बटवांरे से पहले बचपन से गाता था। वहां मेरी कला की सराहना करने वाला भी कोई नहीं था।  रोटी कमाने और ज़िंदा रहने के लिए, मैंने भेस बदल कर लकड़ी काटने जैसे छोटे-मोटे काम किए। हिन्दुस्तान में गोस्लान वापिस लौटने के बाद मेरा संगीत मेरे पास वापस आ गया। तब से, मैंने गाना जारी रखा है और मैंने ढद्दी संगीत के लिए यहाँ पहचान बनाई । संगीत नाटक अकादमी ने मुझे 2009 में पुरस्कार से सम्मानित भी किया।

एम. के. (पूरा नाम नहीं बताया), जिला नारनौल
हमने गांव के लंबरदार की बंदूक चुरा ली और अपने गांव में कीकर के पेड़ पर चढ़ गए। पहले दो लोग जो हमारे पास से गुजरे हमने उन्हें गोली मार दी । यह कोई जंग नहीं थी – यह नारोवाल में कर्बला था

रोमिला थापर जो बटवारे के समय पूना में रहती थीं
आज़ादी की लड़ाई ने प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रति जुनून पैदा कर दिया था क्योंकि कई लोग इस सवाल से जूझ रहे थे कि हम कहां से आए हैं और भारतीय होने का क्या मतलब है। जबकि हमें यह पूछना चाहिए था कि एक स्वतंत्र राष्ट्र होने का क्या मतलब है।

10,000 मेमोरीज़: इस पहली किताब में 1,000 से ज़्यादा तस्वीरें हैं और हर पन्ने पर लोगों से हुई मार्मिक बातों के कुछ हिस्से हैं जो पढ़ने वालों के लिए उस समय के इतिहास को सामने लाती हैं। प्रकाशक इस श्रृंखला में 50 और किताबें निकालेंगे।

प्रकाशक ने अपने नोट में लिखा है कि “10,000 मेमोरीज़ कई वर्षों की कड़ी मेहनत का परिणाम है जिसमें अखिल-दक्षिण एशिया स्तर पर भारतीय उपमहाद्वीप में सैकड़ों मौखिक इतिहासकारों द्वारा लिए गए साक्षात्कार शामिल हैं। सरकारी रिकॉर्ड और अन्य समकालीन स्रोतों के आधार पर विभाजन के विशिष्ट इतिहास के विपरीत, यह उपन्यास अध्ययन उन जीवित मानव अभिनेताओं के जीवित इतिहास के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो व्यापक सामाजिक संदर्भ में भू-राजनीतिक महत्व की उस अविस्मरणीय घटना के कारण पीड़ित हुए थे। द्वितीय विश्व युद्ध के भूले हुए चीन-बर्मा-भारत रंगमंच का आर्थिक परिदृश्य। सिंह भल्ला और उनकी टीम ने एक उत्कृष्ट दृश्य इतिहास प्रदान करके अत्यंत कठिन काम किया है… इसे पढ़ना आनंददायक है, और यह निश्चित है कि यह विभाजन का एक उत्कृष्ट अध्ययन बन जाएगा।”

राजिंदर अरोरा, 20 दिसंबर 2024

The Book
A map showing location of displaced families

Orthopedist and a carpenter

हड्डियों के डॉक्टर और तरख़ान 

मेरा नंबर चौथा था। मेरे पहले दो औरतें और एक जवान लड़का कमरे के अंदर बैठे डॉक्टर की नज़र भर का इंतजार कर रहे थे। पहली महिला को पीठ का कोई मर्ज़ रहा होगा उसने कमर पर बेल्ट कस रखी थी, दूसरी महिला बुज़ुर्ग थीं उनकी तो उम्र ही दर्द रही होगी और लड़के की टांग पे पलस्तर चढ़ा था जिस पर  शायरी के सिवा किसी ने हरे रंग के स्केच पेन से प्रेम पत्र लिखने की शुरुआत भी कर दी थी जिसके अंत में एक मायूस से फूल के साथ बड़ी सी स्माइली के अंदर कुछ गुप्त सन्देश भी था। 

जिस तरीक़े से डॉक्टर साहब मरीजों की हड्डियों का मुआयना कर रहे थे उन्हें देख कमरे के बाहर बैठा मैं दर्शन सिंह तरखान को याद कर रहा था। हड्डियों के डॉक्टर प्रेम चोपड़ा और दर्शन सिंह तरखान में मुझे कोई ज्यादा फर्क नहीं लगा। आदम जोड़ों और अंगों को जिस तरह घुमा कर, मोड़ कर और ऊपर नीचे चला कर डॉक्टर प्रेम देख रहे थे ठीक उसी तरह सरदार दर्शन सिंह लकड़ी के बड़े छोटे टुकड़ों को इक्कठे ठोक कर और हिला-डुला देखा करता था। गज़ब हुनर था दर्शन सिंह तरखान के हाथों में, आड़ी तिरछी लकड़ी से भी वो सुन्दर सामान बना देता था।  

मेरे घुटने की सोज़िश और एक्सरे को देखने के बाद डॉक्टर बोले एक्सरसाइज नहीं कर रहे हैं? अरे, रोज़ करता हूं जी, मैं नाराज़ हो कर बोला । नहीं जी, ठीक तरह नहीं कर रहे हैं। चलिए आपको फिज़िओथेरेपी करानी होगी । घुटने की मरमत के साथ-साथ उसी दिन से शुरू हो गई गिनती करने की प्रैक्टिस, हिंदी और अंग्रेजी दोनों में । One, two, three, four, five relax  … वन, टू, थ्री, फोर, फाइव। .. 

टांग और घुटने की कसरत के आठ तरीके बताए गए और कसरत कराने वाले जूनियर डाक्टर के पास भेज दिए गए । जूनियर का नाम था सुफ़ियान जो शायद 23 या 24 साल का रहा होगा। गोरा चिटा और हसमुख। एक लंबे हॉल में स्टील के संकरे स्ट्रेचर नुमा बिस्तरों को तीन तरफ पर्दों से ढक कर छोटे कैबिन बना दिए गए थे जिनके आर पार देखा तो नही जा सकता था पर बात चीत आसानी से सुनी जा सकती थी और दूसरे मरीजों की आहें भी। चौथी तरफ थी ठंडी सफ़ेद दीवार। ऐसे ही एक केबिन की तरफ इशारा कर सुफ़ियान ने दूसरी तरफ से पर्दा खीँच दिया। अब सुफ़ियान और हम अकेले थे। मेरा घुटना अब उनके सुपुर्द था। 

तीन तरफ़ से परदे में ढके उस केबिन ने जाने क्यों और कहाँ से मुझे अपनी जवानी के दिनों के उस रेस्टोरेंट की याद दिला दी जिसके घुप अँधेरे में हमने आशिक़ी का एक दौर बिताया था। कमला नगर का अजंता रेस्तरां जवान जोड़ों के लिए ही बनाया गया था और माशूक़ भी वहां जाने से कतराया नहीं करती थीं । मधुर संगीत और बिलकुल हलकी लाल रौशनी में भी हम वो घुप्प काले केबिन ढूंढ लिया करते थे। हर केबिन के बाहर काले कपड़े का पर्दा रहता था जिसे अंदर लटकी डोरी  से बंद किया जा सकता था। जब तक अंदर लगी घंटी ना बजाई जाये तब तक कोई वेटर भी डिस्टर्ब नहीं  करता था। एक घंटे के 30 रुपये में वो केबिन उस ज़माने के हिसाब से भी ख़ासा महंगा था।  ऐसा ख़्याल जितनी तेज़ी से आया उतनी हे तेज़ी से तब निकल भागा जब सुफियान साहेब ने हमारे घुटने ज़ोर से दबा दिया। मेरी चीख़ से साथ वाले केबिन में लेटी महिला और उनकी नर्स ने जाने क्या क्या सोचा होगा। केबिन में दीवार के सहारे लगी लोहे की टेबल पर एक मशीन पड़ी थी जिस से 8 – 10 रंग बिरंगी तारें टेबल के नीचे तक फ़ैलीं थीं। पट्टियों के कुछ गोले, मरहम की ट्यूब और बाकि सामन के साथ टेबल भरी पड़ी थी। 

सुफ़यान ने मुझे लेटने को कहा और मैं लेट गया। इस बार उसने मेरी दायीं टांग को बड़े नरम से हाथों से छुआ और घुटने को धीरे धीरे दबाया।  इस सब के बीच उसने मेरे चेहरे की तरफ देखना नहीं छोड़ा। वो ये जानना चाह रहा था कि मुझे दर्द कहाँ और कितना हो रहा है। ख़ैर, दीवार के साथ रखी मशीन के तीन तारों को उसने मेरे घुटने पे लगाया जिस से मेरी टांग में बिजली के करंट सी धीमी सुरसुरी बहने लगी, घुटने के ऊपर उसने एक गरम तौलिया डाल दिया और मुस्कुराते हुए मेरे सामने रखे स्टूल पे बैठ कर अपना मोबाइल देखने लग गया। 15 मिनट की झनझनाहट के बाद सुफ़ियान ने टांग को सीधा छत की तरफ उठा दिया और गिनती गिनना शुरू किया। 

One, two, three, four, five, six seven eight nine ten… relax

वन, टू, थ्री, फोर, फाइव, सिक्स, सेवेन, एट, नाइन, टेन – रिलैक्स – लेग उप अगेन – एक, दो, तीन, चार, पांच, छै, सात, आठ, नौ, और दस – रिलैक्स। थक गए ? दर्द तो नहीं हो रहा ? मैंने भी ना में सर हिला दिया। 

हरे रंग की पाजामे नुमा पतलून और आधी बाजू की हरी कमीज पहने साढ़े पांच फुट लम्बा शख्स मुझे बहुत ही लम्बोतरा दिख रहा था उसका सर कमरे की छत तक पहुँचता हुआ।  जैसे ही मैं टांग छत की तरफ पूरी ऊपर उठाता हूँ तो मुझे वाघा बॉर्डर पर हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी बॉर्डर पुलिस के जवानों की याद आ जाती है जो पूरे ज़ोर से अपनी टाँगे सर से भी ऊपर उठा कर पैर ज़मीन पे पटकते हैं। मेरा दिल वो ज़ोर लगाने की इज्ज़ाज़त नहीं देता। मुझे मालूम है उतने ज़ोर से अगर में पावं पटकूंगा तो टांग की या पैर की हड्डी तो गयी। मैं धीरे धीरे टांग को नीचे कर सावलिया नज़रों से सुफ़ियान साहेब को इस उम्मीद से देखता हूँ कि मैंने सब ठीक किया या नहीं। उनकी मुस्कराहट से दिल को बड़ी तसली हुई और अब मैं उस छोटे बच्चे जैसा महसूस कर रहा था जो  हर काम ठीक करने पर अपनी माँ या टीचर की तरफ देख उनके अप्रूवल और शबाशी का मुंतज़र होता है।  या फिर अच्छा बच्चा बने रहने पर एक चॉकलेट का हकदार। 

मैं ऑंखें पैर से हटा कर छत पर लगे स्मोक अलार्म की डिबिया की तरफ करता हूँ।  उसके ऊपर एक नंबर लिखा है SA – 343, उसके छेद में धूल जमी है। डिबिया ठीक मेरे सर के ऊपर है और उससे एक फुट दूर है पानी के फ़वारे जैसा नल । अगर किसी वज़ह से अभी कहीं से धुआँ उठे तो पानी का फ़व्वारा सीधे मेरे माथे पे फूटेगा ये सोचते ही मैं अपने शरीर को दायीं और सरकने के कोशिश करता हूँ पर डॉक्टर मेरा बाज़ू पकड़ मुझे वापिस खींच लेता है और झिझकारते हुआ बोलता है “अरे, गिर जाओगे, मत सरको, ये बेड इतना चौड़ा नहीं है”, मैं संभल के नीचे की और झांकता हूँ और अपने शरीर को वापिस अंदर खींच लेता हूँ। अब भी नज़र ऊपर लगे फायर अलार्म से नहीं हटती। उस तक आने वाली बिजली तार की पट्टी टेढ़ी लगी है। मुझे फिर दर्शन सिंह तरखान याद आतें हैं, वो होते तो ये पट्टी बिलकुल सीधी लगी होती। पट्टी के साथ साथ चलती मेरी नज़र छत के कोने तक चली जाती है जहाँ किसी बच्चा मकड़ी ने नया और छोटा सा जाला बुना है जिसके अंदर अभी तक कोई मच्छर या मखी नहीं फ़सा। 

वो जाला महीन सफ़ेद धागे जैसा है। दर्शन सिंह हमेशा कुर्ते नुमा लम्बी सफ़ेद क़मीज़ पहनते थे बिलकुल डॉक्टर के लम्बे सफ़ेद कोट की तरह। उनके दाएं कान में पेंसिल लगी रहती थी इनके गले में स्टेथोस्कोप। दर्शन सिंह ढीले हुए या कमज़ोर पड़े जोड़ को चूल लगा पक्का जाम कर देते थे ये डॉक्टर साहेब भी कुछ ऐसा ही करते हैं। पर जब मकड़ी की टांग टूटती होगी तो उसे कौन ठीक करता होगा ?

मेरे दायीं तरफ वाले केबिन में कोई गुनगुना रहा है। शायद कोई फ़िल्मी धुन है पर मुझे गाना याद नहीं आ रहा। में सोचता हूँ गुनगुनाने वाला डॉक्टर ही होगा किसी मरीज़ की इतनी ज़ुर्रत कहाँ जो यहाँ अस्पताल में गाये। मुझे अब दोनों बातों से कोफ़्त हो रही है। पहली कि गाने वाला कौन है और दूसरी की वो गाना मुझे याद क्यों नहीं आ रहा। उफ़। इस बीच डॉक्टर सुफियान ने चौथे तरीके की कसरत करनी शुरू कर दी है और में पहले की तीन भूल चूका हूँ।  इस वाली कसरत में घुटने को नीचे की ओर दबाते हुए पंजे को अपनी तरफ खींचना है।  इस से दर्द भी होता है पर फिर भी मैं इसे पांच बार कर ही लेता हूँ। डॉक्टर सुफियान खुश हैं, ‘अच्छी प्रोग्रेस है’ ये कह कर वो मुस्कुराते हैं। वो गाना फिर भी मुझे याद नहीं आ रहा। 

बड़े डॉक्टर प्रेम चोपड़ा साहेब किसी मरीज़ को देखने ‘राउंड’ पे हैं मुझे उनकी आवाज़ आ रही है। सब जूनियर डॉक्टर सतर्क हैं और बड़ी मुस्तैदी से मरीजों को समझा रहे हैं। मुझे अब थकान हो रही है और अब में ऊब रहा हूँ। मुझे ऐसे लग रहा के की बस अब पहली मंजिल पे चल कर अस्पताल के कैफेटेरिया में बढ़िया कॉफ़ी पी  जाए और अगर आस पास में कोई जान पहचान वाला न हो तो लगे हाथ एक गरम समोसा भी झीम लिया जाए। अब इन मॉडर्न अस्पतालों को पूरे आराम के लिए ही तो बनाया गया है। मरीज़ को मिलने और हाल पूछने आये सभी दोस्त और रिश्तेदार लोगों का भी तो ध्यान रखना भी तो अस्पताल की ड्यूटी है और फिर शाम चार से पांच अगर मिलने का समय है तो वो चाय का भी तो समय है। वैसे भी अस्पताल में पार्किंग और हल्दीराम भी तो कमाई का एक बड़ा ज़रिया हैं। 

इस से पहले  कि मैं कुछ कहता सुफ़ियान साहेब ही बोल पड़े ‘अब घर जा कर शाम को ये सब एक्सरसाइज ज़रूर कीजियेगा’ । एक बड़ी सी स्माइल के साथ मैंने भी ऊपर पड़ी चादर को धकेला और अपने जूते ढूंढने लगा। 

साथ वाले केबिन से फिर वही गाने की धुन बजी, इस बार हलकी सीटी के साथ। यकायक मेरे मुँह से निकला ‘ये पकड़ा’ तभी डॉक्टर प्रेम चोपड़ा पर्दा सरका अंदर आ गए और जूनियर सुफियान हैरान हो गए। मैंने कहा ‘कुछ नहीं’ और झेंप गया। डॉक्टर चोपड़ा ने कहा अरे झिझकिये मत बताइए। Sir, don’t you think that an orthopedist and a carpenter do very similar work? डॉक्टर चोपड़ा घबराये और सकपका गए, शायद उन्हें कुछ जवाब नहीं सूझा। बिना कुछ कहे उन्होंने सर हिलाया और तेज़ी से बाहर निकल गए। शायद जवाब अगली बार देंगे ये सोच मैंने तसल्ली कर ली।  इतने मसरूफ डॉक्टर हैं उन्हें कहाँ ऐसी फलसफे वाली बातों के लिए वक़्त होगा।  उफ्फ्फ छोड़ो। 

जूते के फीते बांधते बांधते मुझे गाने का मुखड़ा तो याद आ गया पर अंतरा फिर गच्चा दे गया। कम्बख़्त, वो क्या था यार ? ‘आसमां पे है ख़ुदा और ज़मी पे हम … ता तरा तरा तरा ता तरा तरम।