संस्कृत के महाकवि दंडी ने क़रीब डेढ़ हज़ार साल पहले एक वाक्य कहा था- गद्यम् कवीनाम् निकषम् वदंति| क्यों कहा था कि गद्य कवि की कसौटी है, नहीं मालूम| लेकिन कोई रचना जब इन साहित्यिक विभाजनों के बीच खड़ी हो, तो समझना मुश्किल हो जाता है कि कौन किसका निकष है|
कई गद्यकारों की प्रशंसा और ख्याति इसलिए होती है कि उनकी रचना कविता की तरह तरल है, मखमली है| पर अगर गद्य ऐसा हो जिसे केवल गद्य कहना अपर्याप्त हो, तो? राजिंदर अरोड़ा कविताएं लिखते हैं, उनका मर्म समझते हैं पर गद्य को इस तरह अभिव्यक्ति देना कि वह सपने जैसा दिखने लगे, चमत्कार लगे, और कुछ नहीं तो एक कठिन साधना है|
‘पुरानी दिल्ली-साझा संस्कृति का सफ़र’ (2026) ऐसी ही एक रचना है, जो सपने में उँगली पकड़कर शाहजहानाबाद के चक्कर लगवाती है| सम्मोहित करने वाले चटख रंगों के साथ, जैसे कुछ भी उद्ध न हुआ हो| इसकी तहरीर डर पैदा करती है कि सुकून का वह सपना टूट न जाए| राह में छूटी उँगली तो फिर थामी जा सकती है, लेकिन सपने में उसका छूटना वहशत पैदा करता है कि कहीं आँख खुलते ही सारा तिलिस्म बिखर न जाए| उसमें पात्र हैं, उनका परिचय है, मंज़रकशी है और यह एहसास भी कि जो कहा जा रहा है, क़दीमी है| किताब से गुज़रते हुए हम में शायद यह सिफ़त पैदा हो जाए कि हम अदब के साथ उसके सामने पेश आ सकें जो हमारा था और रहेगा|
उनकी दूसरी किताब ‘वहाँ कौन है तेरा’ भी इसी साल 2026 में छपी| वह बेहतरीन और बेमिसाल याद-दहानी का नमूना है| उसी तरह सपना है| माँ की स्मृति में उनके आखिरी बरसों की यह दास्तान माँ पर किसी मुकम्मल कविता से बड़ा बयान है| दोनों किताबें जो अक्स छोड़ जाती हैं, उनकी रेखाएं, शिल्प, कहन और रंग एक पल को भी मद्धम नहीं पड़ते| वे लगभग एक साँस में लिखी गई रचनाएं हैं, जिन्हें एक साथ न पढ़ना बेहतर होगा कि दो सपनीली इबारतें गड्ड-मड्ड न हों| ऐसा करना तभी और केवल उस सूरत में मुमकिन हो सकता है जब तस्वीर और उसकी तासीर दिल के अंदर जज़्ब हो| जो अंदर नहीं होता उसके बाहर दिखने के इमकान काम होते हैं|
मधुकर उपाध्याय – सितंबर 2026

