कभी न खत्म होने वाला सफ़र – ‘यार मेरा हज करा दे’

संजय कुंदन द्वारा पुस्तक समीक्षा

भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर राजनीति ने जितनी कहानियाँ लिखी हैं, उनसे कहीं अधिक कहानियाँ आम लोगों की स्मृतियों में सुरक्षित हैं। वे कहानियाँ बताती हैं कि सरहदें नक्शों पर खिंचती हैं, दिलों पर नहीं। राजिन्दर अरोरा की ‘यार मेरा हज करा दे’ ऐसी ही एक सच्ची कहानी है, जिसमें बहुचर्चित फिल्म ‘ मैं वापस आऊंगा’ के बुजुर्ग की तरह एक बूढ़े पिता की लाहौर लौटने की इच्छा, विभाजन की त्रासदी, साझा संस्कृति और मनुष्यता के गहरे रिश्तों का मार्मिक आख्यान बन जाती है। भले हीं यहां लौटने की इच्छा का सबब फिल्म की तरह प्रेम और उसकी स्मृतियां न हो। अपने बचपन के शहर की ओर लौटना ऐसी ही एक यात्रा है, जिसमें रास्ते से ज़्यादा स्मृतियाँ साथ चलती हैं। यह किताब स्मृति, विस्थापन और मनुष्यता की उस साझा विरासत की खोज है, जिसे कोई सरहद बाँट नहीं सकता।