To my left was the history of cinema, and to my right was the history of literature on the Partition of India. Last evening was one of those pleasant ones when two distinguished authors visited our gareebkhana. I had read Prof Jawarimal Parakh’s writing on cinema but never had the opportunity to listen to him. His works focus on academic film criticism, sociological analyses, and literary-to-cinematic transformations of Indian cinema. Very kindly he gifted me signed copies of two of his works. Another eminent contemporary author Hariyash Rai, fiction writer, and critic known for his novels, short story collections, and literary criticism shared insights on his excellent book on Indian literature on Partition. Hariyash Rai also brought his latest novel ‘Doob’. Both were generous in sharing their thoughts and books.
अगर मेरे बाईं तरफ हिन्दुस्तानी सिनेमा इतिहास के विद्वान थे तो दाहिनी तरफ तकसीम-ए-हिंद (भारत के विभाजन) के अदब की तारीख के लेखक। कल शाम उन खुशनुमा शामों में से एक थी जब दो मशहूर लेखक हमारे गरीबखाने पर तशरीफ लाए। मैंने प्रोफेसर जवारीमल परख साहब की सिनेमा पर लिखा तो पढ़ा था, लेकिन उन्हें मिलने और रूबरू सुनने का मौका कभी नहीं मिला था। उनका ज्यादा लेखन अकादमिक फिल्म क्रिटिसिज्म, सामाजिक विश्लेषण और हिंदुस्तानी सिनेमा के अदबी-से-सिनेमाई सफर पर रहा है। उन्होंने बेहद मोहब्बत के साथ मुझे अपनी दो किताबों की दस्तखत शुदा कॉपियां तोहफे में दीं। उनके साथ हमारे दौर के एक और नामी लेखक और समीक्षक, हरियश राय साहब ने—जो अपने उपन्यासों, अफसानों और साहित्यिक आलोचना के लिए जाने जाते हैं— विभाजन पर हुए लेखन वाली अपनी बेहतरीन किताब से जुड़े कुछ गहरे ख्यालात हमसे साझा किए। हरियश राय साहब अपना नया उपन्यास ‘दूब’ भी साथ लाए थे। अपने ख्यालात की रौशनी बिखेरने और अपनी किताबें साझा करने में ये दोनों ही शख्सियतें बेहद उदार हैं।
“हिंदी सिनेमा को चाहें तो हिंदुस्तानी सिनेमा भी कह सकते हैं, क्योंकि अब भी हिंदी फिल्मों की भाषा का आदर्श वह हिंदुस्तानी है, जो हिंदी की संस्कृतनिष्ठता और उर्दू के फारसीपन से अपने को मुक्त रखकर आम आदमी के दिल से सीधे जुड़ने की ताकत रखती है। हिंदुस्तानी जबान की इस ताकत को अपनाकर हिंदी सिनेमा ने दर्शकों के दायरे को ही नहीं बढ़ाया बल्कि उन गैर हिंदी भाषी फिल्मकारों के लिए भी रास्ता आसान किया जिन्होंने व्यापक जनता तक अपनी पहुंच बनाने के लिए हिंदी में फिल्में बनाना जरूरी समझा। वी. शांताराम (मराठी), एस. एस. वासन (तमिल), विमल राय (बांग्ला), महबूब (गुजराती), बी.आर. चोपड़ा (पंजाबी), दसारि नारायाण राव (तेलुगु) आदि कई फिल्मकारों के नाम लिए जा सकते हैं जिन्होंने हिंदी में फिल्में बनाकर अपनी भाषा से बाहर के दर्शकों तक पहुंचने की कामयाब कोशिश की। हिंदी सिनेमा के साथ गैर हिंदी भाषी कलाकारों के जुड़ाव को फिल्म निर्माण और निर्देशन के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि अभिनय, संगीत, पटकथा, छायांकन, संपादन यानी कि सिनेमा के हर क्षेत्र में देखा जा सकता है।” – जवरीमल्ल पारख

