देख लो, आज हम को जी भर के

कहानियां या फिल्में मुझे आसानी से भावुक नहीं कर सकती पर हाँ दर्द भरी कोई कविता, दिल हिला देने वाली कोई ग़ज़ल, ठुमरी, टप्पा या गीत, और रूह को चीर देने वाले संगीत को सुन कर मैं ज़ार ज़ार रो सकता हूँ, रोया भी हूँ, कई बार। सिनेमा में भी और नशिस्तों या बैठकों में भी। मेरा मानना है कि संगीत में किसी को भी अपनी गिरफ़्त में ले कर पागल कर देने वाला जादू है। और फिर संगीत के साथ अच्छे बोल जुड़ जाएँ तो माशाल्लाह क्या कहने। जैसे ख़याम साहेब के दिए संगीत के साथ मिर्ज़ा शौक़ साहेब के लिखे और जगजीत कौर के गाये ये बोल –

कोई आता नहीं है फिर मर के, देख लो।

1982 में बनी फिल्म बाज़ार की इस ग़ज़ल के बोल सिर्फ़ रुलाते ही नहीं अंतर आत्मा को झिंझोड़ देते हैं इतना बींध देते हैं कि सुनने वाला अपना सब कुछ हारने को, समर्पण करने मज़बूर हो जाता है। इसके लिए आपको फ़ारूक़ शेख़ और सुप्रिया पाठक की बेहतरीन अदाकारी पे फिल्माया ये जानलेवा गीत देखने की ज़रुरत नहीं है । रौनक़ और हलचल से भरे किसी बाज़ार में ये गीत आपके पैरों में बेड़ियाँ पहना कर रोक लेता है, वहीँ बैठ कर आँसू बहाने पे मजबूर कर देता है। पर यकीन मानिये ये कशिश, ये दिल्लगी, मकनातीस की तरह अपनी तरफ खींचने की वही ताकत क़ुदरत के नज़ारों में भी है।

आज हम को जी भर के देख लो

सचमुच, कौन वापिस आ सकता है मर खपने के बाद, कौन वापिस आया है, कहाँ आ पाया है। ये गीत, ये बोल, ये मायूसी, ये बेबसी मुझे कई और कारणों से भी महसूस होती है, परेशान करती है  ख़ासकर जब मैं क़ुदरत के किसी नज़ारे से बिछुड़ रहा होता हूँ, उसके किसी नायाब मंज़र को जब मैं पीछे छोड़ घर को, शहर को वापिस लौट रहा होता हूँ तो टीस और बढ़ जाती है।

नंदादेवी, नीलकंठ, त्रिशूल, एवेरेस्ट, गंगोत्री, स्वर्गारोहिणी, भागीरथी और कैलाश पर्वतों से वापिस आने से पहले जब मैंने इन चोटियों को आख़िरी बार देखा था तो यही ग़ज़ल गुनगुना कर मैं रोया था। मानसरोवर झील या सहस्त्रताल से बिछड़ने से पहले भी इसी ग़ज़ल को गा कर उतना ही दर्द सहा था। साल दर साल पिघलते, सिकुड़ते, ग़ायब होते जा रहे हिमनदों (ग्लेशियर) को देख दुखी होता मन ज़ोर ज़ोर से इनके सामने खड़ा रोया था।

खूबसूरत वादियों, बर्फ़ीले पहाड़ों, हरे बुगियालों, भोज, चीड़, बांज और सनोबर के अधकटे जंगलों से बाहर आ कर भी  मैंने ये विछोड़ा ही महसूस किया। जितनी बार वापिस लौटा जंगल को कम ही पाया। पहाड़ को गिरता, टूटता, धंसता, और जर-जर होते ही पाया। नालों और नदियों में पानी कम होता या सूखता ही देखा या फ़िर बरसातों में इनका विकराल रूप तबाही लाते ही देखा।

इन बेजान पत्थरों, नदी-नालों और  नज़ारों से जुदाई का दर्द मेरा पागलपन तो कहा जा सकता है पर ये सोचिये क़ुदरत की इन हसीन नेमतों में से बहुत कुछ अब लुप्त हो रहा, काफ़ी कुछ तो पहले से ही ख़त्म हो चुका है । जल्द ये सब तस्वीरों की तरह यादें ही रह जाएँगी। या फिर अब आपको कभी न दिख पाने और मिल पाने वाले आपके प्यारे दादा-दादी, नाना-नानी या  बुज़ुर्गों की ही तरह।

आज के अखबार में ही ये खबर है की मुल्क की आला कोर्ट ने उत्तराखंड राज्य के शिवालिक पहाड़ियों में 3000 पेड़ काटने पर रोक लगा दिया है। शुक्र है, कभी कभी कोई पेड़ पहाड़ों पे भी दया करता है।

पर हम सब जानते हैं जंगल बेतहाशा काटे जा रहे हैं, पहाड़ों को काट कर सड़कों और सुरंगों के जाल बिछाए जा रहे है, रेल पटरियां बिछाई जा रहीं हैं । मौसमी बदलाव से बर्फ हर साल कम पड़ती है। तेज़ गर्मी की वजह से ग्लेशियर पिघल रहे है । नदियां या तो सूख रही हैं या तबाही का सबब बन रहीं है । ये सब हमारी, यानि इंसानी ग़फ़लत की वजह से हुआ है और हो रहा है। कुदरत के जिन हसीन नजारों को हमने देखा था, जिनकी हजारों तस्वीरों और फिल्मों को हमने दोस्तों और जानकारों से साझा किया था, जिनके बारे में लिखा था उनमे से बहुत कुछ होले होले ख़त्म हो रही हैं। ये ही नहीं उनके साथ वहां बसने वाले जानवरों, पक्षियों और पौधों की उन हजारों प्रजातियों के बारे में सोचें जिन्हें हमने सदियों से खो दिया है, उन सैकड़ों भाषाओं और बोलियों के बारे में सोचें जिन्हें हमने भूल बैठे हैं।

सोचिये डोडो पक्षी है ही नहीं। शेरों, बाघों और जाने कितने जानवरों को हमने सैकड़ों या कुछ हज़ारों की गिनती में समेट दिया है। जिस मुल्क में राजा महराजा और रईस लोग चीते को पालतू जानवर सा रखते थे उस मुल्क में चीते कभी के ख़त्म हो चुके और उसे 10-15 चीते नामीबिया से मांगने पड़े। जिस देश मैं गिद्ध जटायु की पूजा होती है वहां ऐसा माना जाता है की इनकी आबादी अब केवल 5000 ही है।  तितलियाँ और मधुमखियाँ जिस तेज़ी से लुप्त हो रही हैं उस से लगता है कुछ सालों में ही बहुत से फूल और फल भी ख़त्म हो जायेंगे।  

धीरे-धीरे जिन कुदरती नज़ारों को हम खो रहे हैं उन्हें आज का युवा या वर्तमान पीढ़ी हमेशा के लिए लुप्त होने से पहले एक झलक पाने और देखने के लिए दौड़ रही है। क्या आफ़त है, जिसे उन्हें बचाना चाहिए या हमे बचाना है – प्रकृति की उसी खूबसरत रचना को और ज़्यादा बर्बाद करने के लिए एक नई भीड़ तैयार है। वो भीड़ इन्हे आखिरी बार देखना चाहती है, बिलकुल वैसे ही जैसे सड़क एक्सीडेंट में घायल किसी शख्स की लोग रील तो बनाते हैं पर उसकी मदद को, उसे अस्पताल ले जाने को कोई आगे नहीं आता। धूं धूं कर के जब जंगल जलता है तो इंसान उसे छोड़ दूर भाग जाता है।  जंगलों का जलना, पहाड़ों का दरकना, नदियों का सूखना, पशु-पक्षियों का ख़त्म होना इंसान के अपने अंत की कहानी है।

जी हाँ हिमालय के ये बाकि बचे ग्लेशियर, अंटार्कटिक और आर्कटिक महाद्वीप से टूटते बर्फ के हिम-पर्वत ऐमज़ॉन के जंगल, दुनिया भर की सूखती नदियाँ, पानी के तालाब और ताल, बर्फ से ढके सफ़ेद पहाड़, ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ़, डूबते जज़ीरे और जाने क्या क्या – इन बची खुची, रही सही  नेमतों को बर्बाद करने के लिए लोगों पे एक नया जुनून चढ़ा है।

इस जुनून को बेचने और इस से पैसे कमाने के लिए इसे नए नए नाम दिए जा रहे हैं “लास्ट चांस टूरिज्म” – “फलां-फलां देखने का आखिरी मौका”। एक पुरानी फिल्म का रुआंसा कर देना वाला भावुक कर देना वाला गाना लगा कर ये माल बेचा जा रहा है। आंसू रुमाल में लपेट कर साथ दिए जा रहे हैं। ट्रेवल एजेंट  हजारों लोगों को ऐसे स्थानों पर भेजकर मुनाफ़ा कमा रहे हैं जो पहले ही बर्बाद हैं, ख़त्म हो रहे हैं, ढह रहे हैं और जिन्हे तुरंत, बिना देरी के बचाने की सख्त ज़रुरत है, सँभालने की आवश्यकता है। जिस किसी ने भी 1960 या 1970 की सदी का पहलगाम, गुलमर्ग, खिलनमर्ग, सोनमर्ग या लद्दाख़ देखा है और अगर उस शख़्स को पहाड़ों से रत्ती भर भी प्यार है तो वो आज पुरानी यादों को समेटे वहां जा कर बस आंसू ही बहा सकता है। सब कुछ तो ख़त्म हो गया। तरक्की और तकनीकी सहूलियत के नाम पर आपको रोपवे का गंडोला तो मिल गया पर गुलमर्ग, मुंसियारी और औली में बर्फ की मखमली ढ़लाने बर्बाद हो गई हैं। 

अगर आपको याद नहीं तो याद दिला दूँ करीब दो दशक पहले वैली ऑफ़ फ्लावर्स (फूलों की घाटी) इतनी बर्बाद हो चुकी थी की उसे बचाने के लिए सरकार को उसे बंद करना पड़ा। नंदा देवी सेंचुरी और वैली ऑफ़ फ्लावर्स 10 साल तक पर्यटकों के लिए बंद रहे ।  यकीन मानिये पूरे हिमालय का यही हाल है। हिमाचल के पहाड़ों में हर साल आने वाली बर्बादी का ये आलम है की वहां के रहने वाले लोग शहरियों से वहां न आने की अपील करते हैं। गर्मी के मौसम में नैनीताल पहुंचने वाली सड़क पर चुंगी लगाकर अंदर आने वाली गाड़ियॉं को रोक दिया जाता है। नैनीताल की झील तीस साल में आधी ही रह गई है। वही हाल श्रीनगर की डल, निगीन और वुलर झीलों का है। इन सभी जगहों पर छोड़ी गई गंदगी की तो कोई बात भी नहीं करता।

कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के गडरिये या चारागाही, जिन मे बकरवाल, गद्दी और गुज्जर कबीले शामिल हैं, वो साल दर साल गर्मी के मौसम में अपनी भेड़-बकरियां और डांगर चराने पहाड़ों पे ऊंचाई वाले हरे पहाड़ी मैदानों या बुग्यालों (8 से 12 हज़ार फ़ीट ऊँचे) में अपने पशुओं को ले जाते हैं। ये घुमक्कड़ लोग बताते हैं कि पिछले 15 साल में ही ऊपरी इलाकों में बर्फ़ गिरने में इतनी कमी आई है कि बहुत सी वादियां या दर्रे जहाँ वो जा ही नहीं पाते थे अब 12 महीनों खुले रहते हैं।  बर्फ ना गिरने की वजह से और बारिश की कमी की वजह से पहाड़ के ऊपरी इलाकों में चरने लायक घास भी कम हो गयी है।  सर्दी कम पड़ने की वजह से भेड़ों में बाल या ऊन भी काम आती है। 

समुद्र तल से 19340 फुट की ऊंचाई पर किलिमंजारो अफ्रीका महाद्वीक की सबसे ऊँची चोटी तंज़ानिया और केन्या देशों की सीमा पर एक फ़रिश्ते सी तैनात है। असल में ये बुझ चुका ज्वालामुखी है। पिछले 50 साल में लाखों लोग इस देखने, इस चोटी पर चढ़ने और इसके आस पास के जंगल में विचरने के लिए यहाँ आये हैं।  इस सब का हश्र ये है की इसके आस पास का जंगल 70 फी सदी काट कर साफ़ कर दिया गया है। इन जंगलों में रहने वाले दर्जनों पशु पक्षियों की प्रजातियां अब लुप्त हो गई हैं।  पिछले दो साल से इसकी चोटी पर बर्फ भी नहीं पड़ती। तंज़ानिया सरकार इस बात पर अब विचार कर रही है कि इस पहाड़ पर चढ़ने पे अब रोक लगा देनी चाहिए।

दक्षिणी अमरीकी महाद्वीप के देश पेरू की एंडीज पर्वत श्रंखला में तो पूरा का पूरा ग्लेशियर पिघल कर ख़त्म हो गया है और दर्जनों ग्लेशियर पिघल कर छोटे होते जा रहे हैं और पीछे को सरक रहे हैं। इस से एक तरफ समंदर के पानी की ऊंचाई बढ़ती जा रही है तो दूसरी तरफ पीने के पानी की किल्लत बढ़ती जा रही है। 

सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या किया

दिल्ली से निकलने वाले टाइम्स ऑफ़ इंडिया में 9 मार्च को भूगर्भ और भूकंप वैज्ञानिक श्रीमती कुसाला राजेंद्रन का एक इंटरव्यू छपा है जिसमे वो कहती हैं कि “हिमालय में हो रहे निर्माण कार्य को देख कर ऐसा लगता है कि सरकार हिमालय में भूकंप की सम्भावना को हल्के में ले रही है।” हिमालय में हो रही बर्बादी को जाती तौर पर मैं करीब 40 साल से देखता आया हूँ बर्बादी का ये सिलसिला साल दर साल तेज़ ही हो रहा है, थम नहीं रहा।

पिछले साल जब जोशीमठ शहर के धसने की ख़बरें और वहां रहने वालों की दहशत चरम सीमा पर थी तब भी जोशीमठ से बद्रीनाथ के कुल 40 किमी के रास्ते पर करीब 37 जे सी बी एक्सकैवेटर पहाड़ तो बेतहाशा काट ही रहे थे उन चटानों के साथ जा रहे थे पेड़, जंगली घास और झाड़ियां जो वहां की मिट्टी को जक्कड़ के रखती हैं। पहाड़ काटने का ये मलबा सीधे सीधे ढलान की तरफ नदी या नाले में बहा दिया जाता है जिस से या तो उसका बहाव बंद हो जाता है या फिर पानी नया रास्ता काट लेता है। क्या सरकार इस सब से बेखबर है ? नहीं, सब कुछ देखते समझते हुए भी हिमालय के नाज़ुक पर्यावरण के साथ ज़ुल्म हो रहा है। हिमालय देखने और घूमने के नाम पर आज का युवा मोटर साइकिल और कार वहां ले जा कर धुंए और शोर के प्रदूषण से बर्बादी को और तेज़ी से बढ़ा रहा है।

लास्ट चांस टूरिज्म – या किसी नज़ारे को देखने का आखिरी मौका – इस तिज़ारत के पीछे ये लालच है कि कुछ प्राकृतिक स्थल या तो जल्द लुप्त हो जायेंगे या सरकार उन्हें लम्बे अरसे के लिए बंद कर देगी या फिर विशेषज्ञों ने उसके अंत की आखिरी तारिख तय कर दी। या यूँ कि वे इतनी तेजी से बदल रहे हैं कि उन्हें देखने और महसूस करने का अनुभव अब पहले जैसा नहीं रहा, या ये इस बारे में डर है कि वे पूरी तरह से गायब हो जाएंगे। इस अंदेशे, इसी उत्सुकता ने कई हज़ारों यात्रियों को इन दूर-दराज के स्थानों की यात्राएं करने के लिए प्रेरित किया है, जबकि उन्हें ऐसा करने की कोई ज़रुरत नहीं है। “मैंने भी देखा है” की होड़ तबाही को हमारे और नज़दीक ला रही है।

कैलाश-मानसरोवर की यात्रा पूरी करने के बाद हिंदुस्तान वापिस आने के लिए हमे भारत-चीन सीमा पे  हिमालय का लिपुलेख पास सुबह 6 बजे से पहले पार करना था। तिब्बत या चीन की तरफ़ से लिपू पास के नीचे की खड़ी चढ़ाई ख़ासी मुश्किल ही नहीं खतरनाक भी है । तेज़ बर्फ़ीली हवा, घना कोहरा, भयंकर सर्दी,  ग्लेशियर दरकने का डर और उस पे फ़िसलते मिट्टी से सने जूते हर क़दम को इम्तेहान बना रहे थे। तक़रीबन 17,400 फुट की ऊंचाई पे फूली हुई साँसों से फेफड़े फटने की कगार पे थे। जैसे तैसे लिपु दर्रे को पार कर हमे नाभीडांग कैंप की तरफ उतरना था।

हिंदुस्तानी सीमा रेखा से 10m नीचे हमारा स्वागत करने ITBP के कमांडैंट हरप्रीत सिंह गोराया हमारा इंतज़ार कर रहे थे। गरमा गर्म चाय और गर्मजोशी से गले मिलते फ़ोर्स के जवान हमे साथ ले नीचे को चल पड़े। सुबह के आठ बजने को थे, हमारी तरफ का आसमान साफ़ हो चला था। सूरज महाराज की मद्धम किरणे आस पास की पहाड़ियों और चोटियों को धीरे धीरे चमका और गरमा रही थीं। कमांडैंट गोराया ने अचानक मेरा हाथ खींच मुझे रोक लिया। सामने ढलान पे इशारे करते हुए उन्होंने एक रंगीन मोनाल पक्षी से मेरा पहला परिचय कराया। इतने रंग कि इंद्रधनुष भी फीका लगे।

वो हाथ जैसे ही ऊपर आया तो सामने एक चोटी पे आ रुका “और वो है ओम पर्वत, दिख रहा है ना ओम !” मन्त्रमुग्ध मैं बहुत देर तक उस पहाड़ों को निहारता रहा। थोड़ी देर बाद कमांडैंट गोराया ने कहा “देख लो, आँखों और दिल में भर लो इस नज़ारे को ये दुबारा मिलने वाला नहीं है।”

क्या सटीक भविष्यवाणी थी वो – आज उस ओम पर्वत पर ओम मंत्र बनाने वाली बर्फ़ न तो पूरी गिरती है न ही ठहरती है । हिमालय बर्फीला नहीं पथरीला होता जा रहा है। साल दर साल दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवेरेस्ट पर भी बर्फ़ का गिरना, रुकना और जमना कम होता जा रहा है। जिसकी वजह से चोटी की जड़ पे लगा खुम्बू ग्लेशियर भी चटक कर टुकड़ों में बहा जा रहा है।

आज ही एक और बुरी खबर पढ़ी। एक एम्परर पेंगुइन (पक्षी) अंटार्कटिक महाद्वीप से तैर कर 2000 मील दूर ऑस्ट्रेलिया के समुद्र तट पर पहुँच गया। वैज्ञानिक बताते हैं की वो पेंगुइन बर्फ़ के टूटे हुए एक बड़े से टुकड़े पर अकेली पड़ गयी होगी और खाने को खोजते खोजते इतनी दूर उस जगह पहुँच गई जहाँ उसकी अपनी कौम का कोई वजूद तक नहीं है। उस पेंगुइन को देखने हज़ारों की जनता पहुँच गई।  इस से पहले की पेंगुइन को कोई नुक्सान पहुंचता वहां के तट रक्षकों ने उसे अपनी देख रेख में ले लिया। 20 दिन में पेंगुइन की अच्छी सेहत को देखते हुए उसे दक्षिणी समंदर में छोड़ दिया गया।

साल दर साल कुदरत के ऐसे कई नज़ारे, कई नेमतें हम लगातार खो रहे हैं। और प्रकृति के ये वो अमूल्य नज़ारें हैं जो दुबारा नहीं आने वाले। हमे इन्हे बर्बादी से बचाना है, संजोना है अपने लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए, सिर्फ इंसान के लिए ही नहीं बाकि प्रजातियों के लिए भी। इस ब्रह्माण्ड में अब तक कोई दूसरी धरती नहीं ढूंढ पाए हम और अगर मिल भी गई तो क्या इस खूबसूरत ग्रह को तबाह करना ज़रूरी है ? ना, इसे संभालिये, सरकार से सवाल कीजिये – पहाड़ों में  बनाई जाने वाली सड़कें, रेल, सुरंगें और आराम के साधन क्या इंसान और हिमालय की ज़िंदगी से ज़्यादा ज़रूरी हैं ? मेरा मानना है बिलकुल नहीं।

कोई आता नहीं है फिर मर के

– 14 मार्च 2025

बचपन – childhood

There is something unreasonably seductive about the sound of an aircraft whizzing overhead. A distant hum becomes an unmusical reminder from the past followed by a roar and a streak of white piercing the blue sky which makes me leave everything and run to the terrace or the nearest balcony. By the time my eyes focus, the neck cranes at the object chasing its silvery reflective surface. Not voluntarily, but dictated by muscle memory the arm goes up waving at the machine and the gaze pierces through grayish-blue windows looking for the friend who was lucky enough to have taken a ride. Frantically, I wave and shout, hoping against hope, he will wave back (was it he or she?). I even fold my hands in reverence to the flying bird-machine. Me, the lesser mortal, waiting for that friend to wave back from the blind window. A pair of eyes glare at me from behind the door, a disappointed head shakes, banging the door, I hear her say –   बचपना नहीं गया अभी तक  Both, my hand and head go limp and I wonder कहाँ गया वो बचपन  when I would run in the street chasing the aircraft till it disappeared in the horizon. ​My fingers twitch for some inexplicable reason and rush to seek something in the trouser pocket. The pocket is empty, the fingers retreat to form a V in the air and trigger an imaginary pebble in the air. Indeed I miss the बचपन  and remember the Gulel (a slingshot) with which I would try and aim at the craft. Stop, wait and take me along.  

Alvida Jumma – Jama Masjid

​कुछ तस्वीरों के मायने नहीं ढूंढने होते, उन्हें डिकोड नहीं करना होता – बस निहारना होता है, दिल में उतारना होता है।  कुछ तस्वीरों पे बड़े बड़े हर्फों में लिखा होता है – प्यार। कुछ तस्वीरें अपने मौन में, अपनी रूह में पूरी कायनात की कहानी छिपाये होती हैं। ये तस्वीर उस ब्रह्मांड की नाद का हिस्सा है जिस से आज बहुतरे वंचित हैं। रमज़ान के मुबारक महीने में ऐसी तस्वीर तोहफें में देना वाला एक फ़रिश्ते के सिवा और कौन हो सकता है। और इस तस्वीर को अपने कैमरे  में बंद करने वाला फरिश्ता है हमारा प्यारा तारिक़ मुस्तफ़ा जिसने हमेशा अपने सब दोस्तों और चाहने वालों पे प्यार बरसाया है। दिल्ली की जामा मस्ज़िद में ली ये तस्वीर अलविदा जुम्मा की है, इस तस्वीर में छुपी हर कहानी को पढ़ कर में दुनिया से, दोस्तों से साझा करना चाहता  हूँ।  तारिक़ की जितनी तारीफ की जाए कम है।  तारिक़ हरफ़न मौला से भी ज़्यादा फन जानते हैं। पेशे से IT के धुरंदर एक्सपर्ट हैं, संगीत, नाटक, गाना और नशिस्तों से इस तरह जुड़े हैं जैसे फूलों पे तैरती तितलियाँ और ऐसे बेहतरीन फोटोग्राफर और डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने वाले हैं कि दर्जनों अवार्ड से नवाज़े गए हैं – सबसे ऊपर – तरीक़ नेक दिल इंसान हैं। तस्वीर के लिए शुक्रिया । जियो प्यारे   @tariq 

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Prayers of Alvida Jumma at the Jama Masjid in Delhi

Ashtray collection

​सिगरेट पिए और धुंए के छले बनाये मुद्दत हो गई। अब तो तम्बाकू की खुशबु और स्वाद भी भूल चूका और वो जिसकी वजह से ​सिगरेट पीते थे वो भी भूल चुका है। पर नई  से नई  ऐशट्रे इकठ्ठा करने का शौक़ बरकरार है। अभी पिछले हफ्ते ही ये दो मिलीं। अपनी कलेक्शन के  नंबर 144 और 145 । पीतल की बनी ये ऐशट्रे 6 x 3 इंच की हैं ।  करीब एक इंच गहराई की हैं और एक का वज़न 312 ग्राम है। दिलजले धुंएबाज़ ने जो काजल इन पर छोड़ा है उसमे अभी भी पके तमाखू की महक बरकरार है। अपने अपने शौक़ हैं! 

​Warning: Smoking and consumption of tobacco in any form is injurious to health

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