Daddy and letters

<मेरे हिस्से की विरासत> This yellowing envelope, together with the postage stamps on it, was found in one of the books left behind by my father. Dad was a passionate letter writer; writing and posting dozens of letters each day. I can imagine him having forgotten the envelope in the book mid way to writing a letter within the folds of the same book. Having finished the letter an hour or so later, he would have used another envelope to post the letter, leaving that moment and memory behind. But how he came to acquire this particular envelope of a ‘bone’ mill in Hapur is a bit of a surprise with no clues. I dig, that the year 1966, for Hapur (then part of Meerut district), was marked by significant legal and political developments. It was a period of political transition, with general elections for the Lok Sabha and Vidhan Sabha happening concurrently. Discussions related to a “Family Planning Camp at Hapur” are recorded in the official debates of the Rajya Sabha in May 1966. Same time, a long strike by sugarcane producing farmers and other mill workers of this belt resulted in Sugar Cane (Control) Order, 1966, to be enacted in parliament — a pivotal regulation that is still referenced in modern-day disputes regarding timely payment of dues to sugarcane farmers. Being a trade union leader, dad may have visited Hapur in support of striking workers. There is no sign of this particular mill now but even today there are still a few bone mills in Hapur which supply bone meal for poultry feed. Dad, is my inference right!!

An unused envelope from before 1966 of a Bone Mill that doesnt exist
Upper India Bone Mill

Delhi World Book Fair 2026

किताब मेला  इस बरस

जब किसी चीज या जगह को ज़ोर जबरदस्ती, रगड़-रगड़ कर चमका दिया जाता है तो उस पर कुछ वक़्त के लिए चमक तो आ जाती है पर उसकी असल खूबसूरती बिगड़ जाती है। प्रगति मैदान में हर बरस होने वाले किताब मेले का इस बार कुछ ऐसा ही हाल है भारत मड्डपम के पाँच हाल में लगा ये मेला बिल्कुल अस्पताल के सैनिटाइज़ेड वार्ड जैसा लगता है जहां हर मज़मून, हर स्टॉल, हर चीज़, हर दूसरा नज़रिया या नापसंदीदा किताब व सब्जेक्ट को मशीनी तरीके और तीसरी आँख से ना सिर्फ एक्स-रे किया गया है पर कोशिश कर बरखासत कर दिया गया है। 

मेले में कदम रखते ही अगर आपको किताबों की वो खास गंध ना आए तो सब कुछ अधूरा लगता है। हवा में घुली वो पुराने कागज़ की महक, किरोसीन में मिली स्याही की वो भभक, अरारूट और मैदे वाली लेई की अचार जैसी बास, मोटी जिल्द के गीले गत्ते पर चिपके गीले कपड़े की बू और जाने क्या क्या ऐसा होता है जो आपकी नाक, आँख, कान, गले, और बाकी सभी इंद्रियों को बेचैन कर देता है। साथ साथ होती है हर किताब खरीदने की उंगलियों की लपलपाहट, चाहे कंधे बोझा ढो कर मर ही क्यों ना गए हों। किताबों के स्टालों के गलियारे पार करते करते जब पैर थक जाते थे तो जूट के कालीन पर कहीं भी बैठ कर चाय वाले भैया की इंतज़ार करना प्रेमिका के इंतज़ार से भी ज्यादा दुख दाई होता था पर वो आ जाते थे अपनी मीठी, काली चाय लिए बिल्कुल नारद जी से, कहीं से प्रकट हो जाते थे। पर ये सब कभी हुआ करता था, वो जमाने और थे, वक़्त ठहर हुआ था, किताबों में दूसरों से नफरत करना नहीं सिखाया जाता था, इतिहास मनमानी से नहीं लिखा जाता था और किताब के मेले में किताब ही मिलती थी माला या मूर्तियाँ नहीं । 

आज मेले में एक तरफ से हाल में दाखिल होते ही आपका आमना-सामना होता है काला चश्मा लगाये, वर्दी पहने, बंदूक धारी फौजी से जिसके दायें हाथ पर तिरंगा लिए एक फौजी टुकड़ी किसी इलाके में विजय नाद कर आगे बढ़ रही है। आपकी सुरक्षा या देख रेख के लिए ये दिल्ली पुलिस नहीं फ़ौज है। एक बारगी तो शुबा होता है आप किताब मेले में हैं या सुरक्षा मेले में। थोड़ी दूर चलो तो एक पूरी दीवार पर कुछ महीनों पहले हुए ऑपरेशन सिंदूर का पुरा ब्योरा मिल जाता है थोड़ी दूर और चलो तो सेना के तीनों कमान के साधन, सवारी और शस्त्र भी दिख जाते हैं । बख्तरबंद गाड़ी, अर्जुन मेन बैटल टैंक, युद्ध पोत और लड़ाकू जहाज – सब एक बड़े से चौबारे में रखे गयें हैं जिसकी दीवारों में शहीदों की तस्वीरें इज्ज़त और मान से एक कतार में लगाई गई हैं । यहाँ पहाड़ी फतेह करते और झण्डा गाड़ते जवानों की टुकड़ी की प्रतिमा भी है जिसमें एक सिख जवान भी है। इस प्रतिमा के सामने खड़े हैं बी एस एफ और गुरखा सेना के असली जवान। 

अब इन सब से नजर हटे तो आदमी किताब भी देखे। लकड़ी की दीवारों के पीछे से किसी कॅफे कॉफी डे टाइप की अमेरिकानों या केपूचीनो कॉफी की महक आपको बुला रही है और आप बेमने से उस तरफ चल देते हैं क्यूंकी मेले में चाय तो मिल नही रही, अब निकालिए दो सौ रुपये जो बाशोम के हाइकु की किताब खरीदने के लिए बचा रखे थे। मन ही मन गिनती हो रही है कितने पैसे जेब में बचे हैं। एक प्रिय दोस्त ने  कल ही बताया की कैसे वो साल-दर-साल दस बीस हजार रुपये इकठे कर किताबें खरीद ले जाते थे। मैं आसमाँ को देखने के लिए सर उठता हूँ तो हाल के ऊपर लगी गंदी काली छत देख मुझे यकीन हो जाता है कि अगर भगवान है भी तो वो इस छत के परे तो मेरी नहीं सुनेगा और मेरे पास कभी किताबें खरीदने के लिए एक मुश्त बीस हजार रुपए नहीं होंगे। हालंकी अब में अपनी पसंद की बहुत सारी किताबें खरीद पाता हूँ पर मुझे वो दिन कभी नहीं भूलते जब जब किताब मेला पंद्रह दिन का होता था और हम पूरे पंद्रह रोज़ अलग अलग स्टॉल के सामने बैठ कर किताबों को भारी दिल से निहारते और कुछ रेट लिस्ट बटोर शाम घर लौट जाते थे। 

मेला और आस पास अब पहले से साफ है, दिखता भी वैसा ही है। टॉयलेट साफ। घास का मैदान साफ।  बहुत कुछ साफ हो चुका है। पाठक साफ, बच्चे साफ, युवाओं की जेब से पैसे साफ, प्रकाशकों का दिया जाने वाला 50 पर्सेन्ट डिस्काउंट साफ, स्कूली बच्चों की कतारें साफ, सस्ते खाने और चाय की दुकानें साफ, नामचीन अन्तराष्ट्रीय प्रकाशक साफ। छोड़िए भी, अब इस से ज़्यादा सफ़ाई क्या हो सकती है। 

क्या हुआ जो वो किताब खरीद नहीं पा रहे, देखिए ना कितने बच्चे किताबों के सामने रील बना रहें है, कितने सारे सेल्फ़ी पॉइंट बनाएं हैं मेल अधिकारियों ने। देखिए ना कितने तिरंगे लहरा रहे हैं, जोश है, वंदे मातरम है और हैं महामहिम की बड़ी बड़ी तस्वीरें और बैनर जो हमे शिक्षा और देश प्रेम का संदेश दे रहें हैं। देखिए ना कितने लेखक अपना इंटरव्यू लिए जाने का इंतज़ार कर रहे हैं और इसका कि कोई पाठक आ कर उनसे किताब पर साइन करवा ले, सेल्फ़ी खींच ले। 

देख कर बहुत अच्छा लगता है कि पिछले कुछ सालों से हिन्दी भाषा का बढ़ता दबदबा है । काश उतनी विशिष्ट और बड़ी जगह में कभी उर्दू और पंजाबी भी देखने को मिले। इन ज़बानों के प्रकाशकों को भी ज्यादा तादाद में मेले में भाग लेना चाहिए। मेरा मानना है की पढ़ना उतना ही ज़रूरी है जितनी अच्छी खुराक और अच्छी सेहत। हर बार की तरह इस बार भी मेले में खूब घूम घूम कर थक गया पर पूरी तरह थकने से पहले अपने खास स्टॉल को ढूंढ ही लिया । 

मेले में एक पड़ाव ऐसा होता है जहां बस ठहर जाने को मन करता है। और, जहां बेहतरीन किताबों के साथ साथ ऐसी सुंदर किताबों को बनाने वालों से भी मिलना हो जाता है। किताबों के मामले में मेरा ‘मन तो बच्चा है जी’। बचपन में बेहतरीन, रोचक और सुंदर छपाई वाली रूसी किताबों से प्यार था बड़े होते होते रूसी किताबें खो गईं और उनकी जगह ले ली ‘इकतारा’ की किताबों ने ले ली। इकतारा की किताबें और वो स्टॉल सब थकान हर लेता है। मेरे लिए वहाँ किताबें इतनी मज़ेदार हैं की मैं उन्हें खा सकता हूँ। आलथी-पालथी मार कर बैठ जाता हूँ, मेरी खस्ता हालत देख कर कोई ना कोई दोस्त चाय ला ही देता है। एक एक कर सब नई किताबें उठा वहीं पढ़ लेता हूँ और खरीदने के लिए थैला भर लेता हूँ। इस बार भी वही किया। इस बार एक किताब हाथ लगी तो 200 रुपए वाली कॉफी पीने का मलाल नहीं हुआ। बाशोम के हाइकु वाली किताब नहीं मिली पर हिन्दी के हाइकु की किताब “अरे!” मिल गई। मेरे पास ही अपने चहेते पाठकों के बीच बैठे थे हिमांशु व्यास, “अरे!” के हसीन लेखक। क्या मुस्कान थी उनके चेहरे पर, क्या प्यार था उनकी आँखों में और कितनी मिठास थी हिमांशु जी के लहज़े में । मैंने भी मौके का फायदा उठा कर उन से उनकी किताब पर कुछ लिखने को कह दिया। हाय हाय, एक तीर सा हाइकु मिल गया मुझे, सिर्फ मेरा हाइकु, जो दुनिया के किसी पाठक के पास नहीं है, हो ही नहीं सकता और फिर उसमे हम दोनों का नाम जुड़ा है । सलाम हिमांशु जी और शुक्रिया। एक गलती हो गई – हिमांशु जी के साथ तस्वीर नहीं ली, ऐसा ही होता है हर अच्छे लेखक की औरा ही ऐसी होती है कि सब कुछ भूल जाता है (औरा यानि प्रभामण्डल- वो रोशनी जो सर के पीछे गोल गोल घूमती दिखाई पड़ती है)। 

‘इकतारा’ की किताबों और मैगज़ीन ‘साईकल’ और ‘प्लूटो’ को लोग बच्चों की किताबें बताते हैं, मेरी बात मानिए ये सरासर गलत है, ये बड़ों के साथ नाइंसाफी है हमारे ऊपर किया जा रहा ज़ुल्म है। अगर आपको अपने भीतर का, अपने मन और दिल का बचपन बचा के रखना हैं, अपने अंदर बसे उस बच्चे को फिर से जगाना है तो इकतारा की हर किताब को खरीदिए और पढिए, ना सिर्फ खुद पढिए बल्कि अपनी बिरादरी, दोस्ती-यारी और आस पड़ोस में भी सब को ले कर दीजिए, छोटे बच्चों को पढ़ कर सुनाईए। बात ज्ञान की नहीं है दोस्त बात अपने भीतर सोये इंसान को जगाने की है, अच्छाई को देखने की है, प्रेम और भाईचारे की है जो इकतारा की किताबों में भरा है। 

इस बार के किताब मेले (2026) में एक प्यारा कोना ऐसा भी है जहां से आप अपने चहेतों को चिट्ठी भेज सकते हैं। अभी इसकी ज़िम्मेवारी खवाब तन्हा कलेक्टिव के शिराज हुसैन ने संभाली हुई है हालांकि ये काम डाक विभाग का होना चाहिए था। शिराज ने ना सिर्फ अपने हाथ से बनाया लेटर बॉक्स लगा रखा है वो आपको एक खूबसूरत रंगीन पोस्टकार्ड और उस पर लगी टिकट भी मुफ़्त देंगे, जी हाँ ठीक पढ़ा आपने “मुफ़्त” यानि FREE. मेले के हाल नंबर 2 में राजकमल प्रकाशन के स्टॉल पर आपको मुसकुराते हुए शिराज मिल जाएंगे जो ना सिर्फ ऐसे कई पुण्य के काम करते हैं बल्कि पहुंचे हुए आर्टिस्ट और कलिग्रफर भी हैं। इनके बनाए कैलंडर, पोस्टर, पोस्टकार्ड, बुकमार्क, और बहुत कुछ वहाँ देखने और खरीदने को मिल जाएगा दुनिया में अब ऐसे इंसान कम रह गए हैं। जल्दी करिए इन्हें मिल लीजिए और अपने घर वालों, दोस्तों, या आशिक – माशूक को याद कर एक चिट्ठी लिख ही डालिए। स्टॉल P-01 हॉल 2-3, मंडपम, मेले में। आखिरी डाक 18 तारीख तक । तस्वीर में लेटर बाक्स के साथ शिराज और राज ।

किताब मेल जैसा भी है अच्छा है, किसी मॉल में घूमने से तो लाख दर्जे बेहतर । सिर्फ 18 जनवरी तक है, आज ही जाएं ।  साल के ये वो दस दिन हैं जब मैं सब कुछ त्याग कर किताब मेले में चौबीस घंटे बैठ और घूम सकता हूँ। अभी की दोस्तों ने दूसरे शहरों से आना है मैं तो आत ही रहूँगा ।  

राजिंदर अरोड़ा, 14 जनवरी 2026, गुड़गाँव 

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क़िस्सा बेनाम किताब का

तमाशा मेरे आगे

जैसा हाल देस का, वैसा घर का हाल. आजकल घर में एस.आई.आर. चल रहा है. जी हाँ, स्पेशल इन्सेंटिव रिवीज़न—कोने-कोने में झांक कर तफ़्तीश हो रही है. आप कहेंगे, ये क्या मज़ाक है, घर में कुल चार जन हैं, वहाँ कौन देसी, कौन बिदेसी. घर में कहाँ घुस आएंगे कोई. अरे, एक तो आप समझते नहीं हैं. ये कोई अपने वाले, दूसरे वाले, बंगाली, रोहिंग्या, नेपाली, धर्म, जात या हाज़िर, नाज़िर का इंसानों वाला एस.आई.आर. नहीं है, ये है किताबों का एस.आई.आर.—एक-एक किताब गिनी जा रही है, कौन हिन्दी, अँग्रेज़ी, उर्दू, अवधी, पंजाबी, बांग्ला, तमिल आदि-आदि. कौन कहाँ से आई, किस शेल्फ़ में है, क्या विषय है, वगैरह-वगैरह. कहानियाँ और नॉवेल एक तरफ़, कविता दूसरी तरफ़, इतिहास और यात्राएं अलग, गीता, बाइबल, क़ुरआन शरीफ़, गुरु ग्रंथ साहब, ज़ेंड अवेस्ता सब इकट्ठी हैं या नहीं. एक प्यारे से लड़के ने घर की हर किताब को कटलॉग और इंडेक्स करने का ज़िम्मा उठाया है सो सब का नाम, लेखक का नाम, विषय, प्रकाशक, छपने का साल, आईएसबीएन और बाकी सब एक ऐप में दर्ज किया जा रहा.

इस सब के चलते एक बड़ी समस्या आन खड़ी हुई, बिल्कुल एस.आई.आर. जैसी. घुसपैठिया तो नहीं कहूँगा पर एक ऐसी किताब मिली है, जिसका कोई नाम-पता नहीं है, यक़ीन मानिए, किताब का कोई नाम नहीं, लेखक का नाम नहीं, दाम नहीं, छपने का साल, प्रकाशक आदि कोई कुछ पता ही नहीँ है. इस बेचारी किताब को अब क्वारंटाइन कर दिया गया है.

आप मेरी व्यथा नहीं समझ रहे, बहुत दुखदाई है किसी किताब के बारे में ये न समझ आना कि वो है कौन.

जैसे ही हम किसी नई किताब को हाथ में लेते हैं तो जल्द ही हमें उसके बारे में कुछ न कुछ मालूम हो ही जाता है. उस किताब का नाम, उसे लिखने वाले का नाम और अगर आगे-पीछे छपे ब्लर्ब पढ़ लिए हों तो उसकी कहानी या विषय के बारे में कुछ अंदाज़ हो ही जाता है. पर अब आप अपनी या मेरी उस स्थिति के बारे में सोचें जब हम किसी किताब से फाड़ा गया, जुदा हुआ, वो पन्ना पढ़ रहे हों जिसके बने लिफ़ाफ़े से हमने अभी-अभी चना ज़ोर गरम या भुनी मूंगफली खाई है. छोटा-सा लिफ़ाफ़ा जिसको खोल कर सीधा करते हुए उसका पेज नंबर और ऊपर या नीचे लिखा किताब का नाम फट गया है – कहानी का वो मोड़, जो उस पन्ने पर छपा है, बहुत रोचक है और आप ये जानने को बेताब हैं कि कहानी के किरदार, उन दो आशिक़ो का इश्क़ परवान चढ़ा कि नहीं— बस अब आप सिर के बाल नोच रहे हैं कि वो ही किताब कैसे ढूँढी जाए, कैसे ख़रीदी जाए और जल्द से जल्द कैसे पढ़ी जाए.

और अब ये दूसरा आलम भी सोचिए, सड़क के पार खड़ा एक पागल इंसान एक-एक कर के किसी किताब के पन्ने फाड़ कर उन पन्नों को तेज़ हवा में ऐसे रसीद कर रहा है जैसे वो हवा का रुख़ देख रहा हो. जब तक ट्रैफ़िक थमे और आप या मैं सड़क पार कर दूसरी तरफ पहुँचें, वो पागल बची हुई किताब को हवा में उछाल कर भाग लेता है. वैसे चाहे आप किताब देख भर कर ही नाक सिकोड़ लेते हों पर उस बिना जिल्द या आगा-पीछा लिए किताब को अब आप दो गुना ज्यादा कशिश से पढ़ना चाहेंगे. उस जर्जर, उधड़ी, बे-जिल्द किताब को आप घर ले जा कर अपने शेल्फ़ पर ख़ास जगह देंगे, अगले पंद्रह दिन तक दोस्तों को किताब बचा लेने के अपने वीरता भरे कारनामे के बारे में बताएंगे, उस वाक़ये के बारे में फ़ेसबुक पर उसकी कहानी लिखेंगे. ये भी हो सकता है कि वो फटेहाल किताब आप को अपनी दसवीं जमात की ट्रिगनोमेट्री की किताब और गणित के उस खड़ूस मास्साब की भी याद दिला दे और अब उस फटी किताब की दर्दनाक हालत को देखकर आपके दिल को बहुत सुकून मिले, ‘ये ले ट्रिगनोमेट्री, मेरा बदला पूरा हुआ’.

नीचे बयान किया क़िस्सा ऐसी ही बिना जिल्द की किताब का क़िस्सा है. वो बिना जिल्द की किताब जो मुझे मेरे ही घर में मिली.

लेख, निबंध और दूसरी हिन्दी रचनाओं की इस किताब की जिल्द नहीं है, या यूं कहिए कि खो गई है. वैसे तो खोई जैकिट कोई ज़्यादा बड़ा मसला नहीं बनती पर यहाँ पेच कुछ गहरा है. ताज्जुब की बात ये है कि इस किताब के नाम वाला अन्दरूनी पेज भी ग़ायब है. इस किताब का पहला सफ़ा 21 नम्बर से शुरू होता है वो भी अधूरे वाक्य “प्रभाव पड़ने लगा था” से. पहले 20 पेज किताब में हैं ही नहीं. न कोई टाइटल पेज है, न कोई विषय सूची. किताब की जिल्द तो ठीक-ठाक ही है जिसे देख ये तो नहीं लगता कि किसी ने पहले 20 पन्ने फाड़ लिए हैं या वो खुल कर गिर गए हैं. इस बेचारी किताब के साथ क्या हुआ होगा ये कहना मुश्किल है पर ले-दे कर मामला अजीब-ओ-ग़रीब है.

अमूमन किताब के अंदर वाले पन्नों पर, नीचे या ऊपर की तरफ, पेज नंबर के साथ भी किताब का नाम होता है, इस किताब मे वो भी नहीं है. अलबत्ता हर चैप्टर का नाम ज़रूर दिया गया है पर उस से भी मैं ये नहीँ पता चला पाया कि इस किताब का नाम या इसके लेखक का नाम क्या है. इसमें कोई कॉपीराइट पेज भी नहीं है जो इसके प्रकाशक का नाम, छपने का साल आदि के बारे में बता सके. कुछ लेख पढ़ने के बाद भी ऐसा कुछ नहीं मिलता जिसकी मदद से चचा गूगल से ही पता लगाया जा सके. बहुत सी किताबों की तरह इसके आख़िरी पन्ने पर “लेखक के बारे में” या “इस लेखक की दूसरी किताबें” भी नहीं बताई गईं. चूंकि किताब पुरानी है सो न कोई आईएसबीएन है, न कोई बार कोड.

किरोसीन में मिली स्याही की बची-खुची महक, कागज के पीलेपन से और उस पर चढ़े कपड़े की रंगाई से किताब करीब 50 साल पुरानी लगती है. छपाई लेटर प्रेस की घिसे हुए कांसे के टाइप की है. बाइन्डिंग ख़ासी पक्की है, सिलाई का धागा मोटा है, पुरानी चढ़ी लेई के सूख चुके दाने भी मोटे हैं. इसके अलावा किताब की उम्र बताने वाला और कुछ नहीं है. मेरा अंदाज़ है कि ये सत्तर की दहाई की है.

ताज्जुब की बात ये भी है कि यह किताब मेरे पास आई कैसे. मुझे तो याद नहीं कि मैंने इसे ख़रीदा हो या किसी ने मुझे ये भेंट दी हो. और फिर मैंने इसे आज तक खोल कर देखा क्यूँ नहीं, पढ़ा क्यूँ नहीं. क्यूँ ये छिपती रही और अलमारी में जगह घेर कर बैठी रही. कुछ तो राज़ है. पिछले पचास बरस में ख़रीदी तक़रीबन हर किताब का हिसाब है मेरे पास, ये कैसे छूट गई. ऐसा तो नहीं कि कोई इसके ज़रिए मुझे कोई खुफ़िया संदेश भेजा जा रहा है या फिर इसके पन्नों में हिंद महासागर के किसी टापू पर गड़े खजाने का कोई नक्शा छिपा है.

बड़ी दुविधा है, कैसे पता लगाया जाए, कोई तरीका सुझाएं? कोशिश करने पर भी इस किताब का नाम अगर न पता चला तो क्या इस किताब को मैं कोई और नाम दे सकता हूँ? अब सोचिए, कितनी देर आदमी एक ही मसले से उलझ सकता है.

इंसानी जिल्द यानि आदमी की चमड़ी पर गुदे टैटू और किताब की जिल्द पर छपा टाइटल दोनों को गुमनाम होने से बचा लेते हैं. आमिर ख़ान की फ़िल्म ‘गज़नी’ याद है जिसमें वो अपनी याददाश्त खो देते हैं और कुछ भी याद रखने के लिए उसे अपने शरीर पर चीजें लिखते हैं. .

मैं ये सोच रहा था कि क्या ये मुमकिन है कि किताब की तरह अगर आदमी की जिल्द, यानि शख़्सियत, कभी खो जाए तो उसका वजूद क्या रहेगा ? यहाँ जिल्द से ताल्लुक आदम-चमड़ी का नहीं उसके किरदार से है, स्वभाव से है, उसका रुतबा, हस्ती, मिज़ाज और रूह से है. जैसे किताब जिल्द से पहचानी जाती जी, वैसे ही आदमी भी तो अपने मिज़ाज से ही जाना जाता है.

वैसे सोचा जाए तो एक बात जो अक्सर देखी जाती है वो ये है कि किसी आदमी और किताब—दोनों को उनकी बाहरी दिखावट के बजाय उनके अपने स्वभाव के ज़रिए गहराई से आंका और समझा जा सकता है. इसके अलावा भी इंसान और किताब में और भी बहुत कुछ एक जैसा है.

किताब और ज़िंदगी दोनों एक कहानी ही तो हैं. हर इंसान की ज़िंदगी की अपनी एक कहानी होती है, जो उसके तजुर्बों, उम्मीदों और बीती जद्दोजहद से बनती है. इसी तरह हर किताब में एक अफ़साना, लेख या कहानी होती है, जिसे हर पढ़ने वाला अपने अनूठे नज़रिये से समझता है.

जिस तरह हमारे द्वारा चुनी गई किताबें हमारे स्वभाव, किरदार और शख़्सियत का आईना होती हैं, उसी तरह किसी किताब का मज़मून या विषय और प्रसंग उसके लेखक के स्वभाव और लिखने के इरादे को ज़ाहिर करते हैं.

दोस्तों की तरह का मामला है ये. एक अच्छी किताब और एक अच्छा दोस्त दोनों ही उम्र भर साथ निभा सकते हैं. दोनों ही दोस्ती और साथ का हासिल हो सकते हैं. एक तरफ़ आदमी के दोस्त होते हैं तो दूसरी तरफ़ एक अच्छी किताब को अच्छे और ख़ुश मिज़ाज साथी की तरह जाना जाता है जो मुश्किल में भी अपने पाठक का साथ नहीं छोड़ती.

इंसान और किताब दोनों ही तरक़्क़ी और इल्म और सूझ बूझ के बाइस हैं. इंसान अपने निजी अनुभवों से समाज और विरसे को आगे बढ़ता है, जबकि एक किताब हमें इल्म और ज्ञान देती है, अलग-अलग विषयों पर हमारी जानकारी बढ़ा कर हमारी सोच और कल्पनाशीलता को बढ़ाती है.

अक्सर लोग किसी इंसान की शख़्सियत को जानने से पहले उसके चेहरे, हाव-भाव और बाहरी रंग-रूप को देखकर उसके किरदार का अंदाज़ लगाते हैं, जो कि बहुत बार सही नहीं उतरता. ऐसे ही बहुत से लोग किसी किताब के कवर पर लिखे कुछ शब्दों या उसके लेखक के नाम से ही उसके बारे में अपनी राय बना लेते हैं, वह भी ग़लत है. “किसी किताब को उसकी जिल्द से मत आँकिए”, यह कहावत भी इंसान की फ़ितरत बताती है.

पर ‘मेरे दुख की दवा करे कोई’, इस बिना जिल्द की किताब का नाम कैसे पता लगेगा.

एक प्यारे दोस्त जिन से मैंने इस व्यथा के बारे में बताया वो बोले, ‘अरे भाई उसे मुझे दे दो, मैं उसके आगे और पीछे की कहानी को पूरा कर उस पर अपने नाम की जिल्द चढ़ा लूँगा. वो मेरी रानी है है न, जिस से अपना टांका फिट है, उसकी बड़ी चाहत है कि मैं कोई किताब लिखूँ. अपनी तो बात बन जाएगी यार, “बस, ये किताब मुझे दे दे ठाकुर.”’

Book without a name

Nagin Dance


कल रात (29 दिसम्बर) का नागिन डांस । कोहरे के बीच आस पास से गुजरती गाड़ियों की बतियों का तांडव और पेड़ के पीछे छिपी गली की स्ट्रीटलाइट से आँख मिचौली खेलता धुआँ । 

Blues. Paeans to an Art

In these difficult times of constant anxiety – stress & worry are deceitful mistresses. While our environment seeks to fill us with dread, the ‘Colour Blue’ serves to create a sense of calm, peace, tranquillity and has a soothing effect on our mind, body and ‘soul’. Blue is a ‘peacemaker’. Blue, as a hue, has no time for baseless fears. Blue inspires us to live in the present and bid farewell to our stress. By creating an air of serenity, the colour does just that. On a particularly challenging day, consider looking up at the sky and feel the stress melt away.

 Stretching across the wide spectrum of blue, Dr Kausik Ghosh’s photos drape us with tones that soak away the blues. Precisely, their blue tempts us, soothes us and balms our eyes with that such heavenly tints that dispel the distress. His pictures goad us not only to look up to the sky but also nudge us to pick finer details of blue in nature and objects all around us. The peace and stillness of the blue in his pictures brush aside the sadness and adds stability to our thoughts – precisely what music does. Indeed, there is music in each of his frames. The angelic note of a harp going there, a violin’s note ringing there and a flute blown so close to our earlobes that even the heart tingles. I could see the golden caterpillar ‘glide’ on the painted blue cable, the ice flakes rappelled down the branches of the tree set against the cerulean blue. Whether it was the colour blue in ceramic motifs outside a house or the unending blue tiles running from columns to the domes of Central Mosque in Bishkek, Kyrgyzstan. Each shade of blue brings us closer to the divine touch moving us towards serenity, as if holding our hands and offering the much-needed trust.  

In his pictures you’ll find an oasis of calm gazing up at the clouds. ​Known for its composed demeanour, blue has a tranquil presence. It doesn’t intrude or pester. Instead, it merely makes itself known. In terms of the psyche, the colour blue is known to impact the mind positively. Blue represents patience and understanding, which is why we feel so comfortable around it. When overwhelming emotions consume us, we’re encouraged to decompress with the colour blue. It’s also commonly associated with the ocean, which further highlights its soothing essence.

Creating pictures for larger comfort is a yearly ritual with him; this being Dr Ghosh’s 15th exhibition. He heals not just with his expertise in orthopaedics but also with his sensitive eye. Fifteen years of commitment to humanity with his blessed hands. The hands that for some set a bone and the same hands when holding a camera – for some set the mood.

 As a peacemaker, the colour blue doesn’t intend to stir the pot. In fact, it loathes the idea of creating conflict. Blue doesn’t like being in the spotlight, so it keeps to itself. Regarded as one of the more reserved hues, blue is tight-lipped. Though it doesn’t have a strong personality, blue does have a unique spirit.

 Cool, calm, and collected that’s how I have always found Dr Kausik Ghosh – and that’s what – his latest creation is – ‘Presence and Perception of Blues’. Now, the blues here are not the pangs of Heart but paeans to an Art. 

Rajinder Arora, 29 December 2025, Delhi