एवेरेस्ट से वापसी पर नामचे से फकडिंग को नीचे उतरते हुए जब आखरी बार एमा डबलम को देखा था तो पहेली आठ लाइन लिखी थी। तब से एक बरस तक इसे पूरा नहीं कर पाया। शायद तारिख 4 या 5 मई 2016 थी। आज फिर से वही कुछ याद आ गया सो पूरी कर दी।
This, that, and all between.
Whatever I thought was a verse
एवेरेस्ट से वापसी पर नामचे से फकडिंग को नीचे उतरते हुए जब आखरी बार एमा डबलम को देखा था तो पहेली आठ लाइन लिखी थी। तब से एक बरस तक इसे पूरा नहीं कर पाया। शायद तारिख 4 या 5 मई 2016 थी। आज फिर से वही कुछ याद आ गया सो पूरी कर दी।
नानी के घर जाना है कल
नानी के घर जाना है
दिन भर कल मस्ती करनी है
और फुलटू मज़ा उड़ाना है।
नानी के घर जाना है कल
नानी के घर जाना है।
क्यूँ ना ख़्वाब अपने उधेड़ दूँ
क्यूँ ना ज़ख्म फिर से हरे करुँ
क्यूँ ना दर्दे दिल को याद कर
भरी आँख से मैं वज़्ज़ू करुँ।
क्यूँ ना आग से करुँ दोस्ती
क्यूँ ना बन के परवाना जलूं
क्यूँ ना फिर चिरागों को चूमता
उसे शम्मा से मैं ख़ुदा करुँ।
क्यूँ ना क़ौल सारे तोड़ दूँ
क्यूँ ना पीले धागे खोल दूँ
क्यूँ ना मन्नतों के बोझ से
मेरे पीर, तुझको रिहा करुँ।
क्यूँ ना बिखरूं इक ख्याल सा
क्यूँ ना रिस के इक मलाल सा
क्यूँ ना टूटे इक करार सा
तेरी हिचकियों में जिया करुँ।
क्यूँ ना टूट जाऊँ शाख़ सा
क्यूँ बिखर ना जाऊँ राख सा
क्यूँ ना रेत के सेहरा में मैं
शबे नम को भी तरसा करुँ।
क्यूँ ना रात को लपेट कर
क्यूँ ना तारों को समेटे कर
क्यूँ ना चाँद को बुझा के अब
तेरी लौ की मैं दुआ करुँ।
क्यूँ रहूँ ना इक सवाल सा
क्यूँ ना चुप रहूँ जवाब सा
क्यूँ ना भूले एक लफ्ज़ सा
यूँ ज़ुबाँ पे आ के रुका करुँ।
क्यूँ ना ख़्वाब अपने उधेड़ दूँ
क्यूँ ना ज़ख्म फिर से हरे करुँ।