लाहौर की स्मृति में लिपटा संस्मरण ‘यार मेरा हज करा दे’ — हंस राज
राजिन्दर अरोरा की संस्मरणात्मक पुस्तक ‘यार मेरा हज करा दे’ कोई साधारण यात्रा-वृत्त नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और स्मृति की एक भावनात्मक तीर्थयात्रा है, जो पाठक को विभाजन की पगडंडियों से होते हुए लाहौर की तंग गलियों तक ले जाती है। यह कृति न केवल एक विस्थापित की वापसी है, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्स्मृति की चुप और गहरी आवाज़ भी है—जिसमें घर खोया नहीं, बस नक़्शे से गायब हो गया है।
यह पुस्तक एक बेटे और उसके वृद्ध पिता की साझी यात्रा है—एक ऐसे शहर की ओर जो उनका अतीत था, पर फिर भी, उनके भीतर प्रतिदिन धड़कता है। लाहौर यहाँ एक भौगोलिक इकाई नहीं, एक जीवंत स्मृति है, एक धड़कता हुआ शहर, जो मिट्टी, गंध, ध्वनि, और दृश्य के माध्यम से पाठक को अपनी जड़ों से जोड़ता है।
स्मृति और मिट्टी का भूगोल- पुस्तक की शुरुआत ही एक अत्यंत मार्मिक दृश्य से होती है—जहाज़ से उतरते वक्त लेखक के पिता का लाहौर की ज़मीन छूना, और फिर कांपते हाथों से अपनी जेब से कलम गिराकर उसे उठाना। इस वाक्य का यह क्षण दृश्य मात्र नहीं है, बल्कि विस्थापन की पीड़ा, वापसी की आकांक्षा और अपनी जड़ों को दोबारा महसूस करने की एक सघन अनुभूति है। यह दृश्य स्मृति और पहचान के उस संबंध को दर्शाता है जो केवल विस्थापितों की चेतना में जीवित रह जाता है।
राजिन्दर अरोरा का लाहौर केवल एक शहर नहीं, एक साझा इतिहास और विरासत है। पुस्तक में लाहौर की गलियाँ, मोहल्ले, ताँगे, गायें, हुक्के, गलियों की गंध, दुकानों की आवाजाही—सबकुछ इतनी बारीकी से वर्णित है कि पाठक मानो स्वयं वहाँ की धूल फाँकता हुआ, गुज़रते समय को जी रहा हो। लेखक की भाषा में वर्णन की ऐसी संवेदी शक्ति है कि ‘भीगे पत्तों की ख़ुशबू’ से लेकर ‘सत्तर के दशक की दिल्ली’ तक का अनुभव आँखों के आगे चलचित्र की तरह तैर जाता है।
लाहौर को लेखक एक ‘सांस्कृतिक तीर्थ’ के रूप में देखते हैं। भगत सिंह की समाधि, शाह हुसैन और बुल्ले शाह की कव्वालियाँ, गंधार कला की बुद्ध प्रतिमाएँ—सब कुछ एक टूटे हुए नक़्शे के सांस्कृतिक धागों को फिर से जोड़ने का प्रयास है। यहाँ नॉस्टैल्जिया केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति की सामूहिकता में तब्दील हो जाता है।
विभाजन की पीड़ा और सांस्कृतिक बिखराव- लेखक राजिन्दर अरोरा की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उन्होंने विभाजन को केवल राजनीतिक घटना के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे एक मानसिक भूगोल के रूप में चित्रित किया है—जहाँ स्मृति, पीड़ा और सांस्कृतिक बिखराव एक साथ उपस्थित होते हैं। किताब में ऐसे अनेक स्थल आते हैं जो इस पीड़ा को जीते-जागते अनुभव में बदल देते हैं—बोरे में बैठकर लाहौर से दिल्ली की यात्रा, कटे अंगूठे में काटता हुआ जूता, स्टेशन पर पड़ी लाशें—यह सब इतिहास नहीं, आत्मा के घाव हैं।
लाहौर म्यूज़ियम में ‘फास्टिंग बुद्धा’ की मूर्ति को देख लेखक जिस दार्शनिक संवेदना से प्रतिक्रिया करते हैं, वह किसी कला प्रेमी की नहीं, बल्कि अपनी खोई हुई जड़ों को फिर से पाने वाले व्यक्ति की अनुभूति है। यह देखना कि एक इस्लामिक देश ने बौद्ध धरोहरों को सहेजा है—लेखक के भीतर एक गहरी मानवतावादी विचारधारा को पुष्ट करता है। वह याद दिलाते हैं कि मज़हब की दीवारें संस्कृतियों की साझी धरोहरों को मिटा नहीं सकतीं।
राजनीतिक आलोचना और सांस्कृतिक पुनर्संरचना- पुस्तक विभाजन के राजनीतिक पक्ष पर भी प्रखर दृष्टि डालती है। सिरिल रैडक्लिफ़ द्वारा खींची गई रेखाओं की मनमानी हो या दोनों सरकारों की साज़िशें—लेखक इन सभी पर तीखी टिप्पणी करते हैं। परंतु यह आलोचना गुस्से में नहीं, सांस्कृतिक करुणा में पगी हुई है। लेखक का कहना कि बँटवारा केवल सत्ता की जल्दबाज़ी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संहार था—वर्तमान को इतिहास से जोड़ने वाला एक गहरा सत्य है।
‘यार मेरा हज करा दे’ में बुल्ले शाह, बाबा फरीद, वारिस शाह, भगत सिंह, हीर-रांझा, नूरजहाँ जैसी सांस्कृतिक हस्तियों का स्मरण केवल श्रद्धा नहीं है, यह उस साझा सांस्कृतिक चेतना का पुनर्पाठ है जो अब दोनों देशों के बीच बँट चुकी है। यह किताब बार-बार बताती है कि ज़मीनें बाँट देना आसान है, पर तहज़ीबें बाँटना नहीं।
राजिन्दर अरोरा की भाषा गद्य में कविता की तरह बहती है। उसमें अनुभव की गरमाहट, स्मृति की ताज़गी और दृश्यांकन की शक्ति है। ‘शहर छोड़ना कोई खेल है?’—जैसे प्रश्न पाठक को झकझोरते हैं। लेखक की शैली आत्मीय है, और वह अपने पाठक को अपनी यात्रा में हमसफर बना लेते हैं।
यह कृति विभाजन-साहित्य की उस परंपरा में आती है जिसमें भीष्म साहनी का ‘तमस’, यशपाल का ‘झूठा सच’, और राही मासूम रज़ा का ‘आधा गाँव’ शामिल हैं। परंतु ‘यार मेरा हज करा दे’ इनमें सबसे अधिक व्यक्तिगत और आत्मिक है। यह कृति न केवल ऐतिहासिक साक्ष्य है, बल्कि एक साहित्यिक सांस्कृतिक आत्म-गाथा है।
एक तीर्थ जो स्मृति में बसता है- इस संस्मरण का शीर्षक ही इसे विशिष्ट बनाता है—‘यार मेरा हज करा दे’—यह हज किसी मज़हबी यात्रा के लिए नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा के लिए थी। यह तीर्थ किसी मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे का नहीं, बल्कि स्मृति, मोहल्ला, माँ और मिट्टी की दीवार पर टँगे उस लाहौर का है, जिसे अब केवल दिल में ढूँढ़ा जा सकता है। यह यात्रा वापसी की नहीं, पुनःपहचान की है—जहाँ लाहौर फिर मिलता है, अलग नक़्शे के साथ।
दुःख हमे विरासत में मिलते हैं और सुख कभी विरली लाटरी लगने पर ज़िन्दगी के तिराहे पे। या फिर सुख के पल फिल्मों में देखे और किताबों में पढ़े जाते हैं। सुख एक फ़लसफ़ा है जिसके बारे में बात की जा सकती है जबकि दुख और दर्द सचाई है जो महसूस की जाती है, झेली जाती है।
आजकल मेरी मेज़ पे दर्द और दुखों का एक पुलंदा पसरा है जिसे हाथ में उठा सुबह शाम मैं सुबक लेता हूँ, रो लेता हूँ और हज़ारों लाखों परिवारों के साथ हुए शर्मनाक और दर्दनाक हादसों, क़त्लेआम, लूट-पाट, आगज़नी, फ़साद और तशद्दुद के बारे में सोच के भी काँप उठता हूँ। दो मुल्कों के जिन करोड़ों लोगों पे ये सब बीती उनमे से लाखों तो कुछ महीनों चली इस दरिंदगी और वहशत में मारे गए, कुछ जो मरे नहीं और जिन्होंने ये सब देखा वो सालों ज़िंदा रह कर भी रोज़ मरते रहे। जाने कितने सौ गुमनाम पागलख़ानों और अस्पतालों में सड़ते रहे और हज़ारों लोग उस ग़म के बोझ को ढ़ोते हुए बाकि बची ज़िन्दगी को ज़िंदा लाश सा काटते भर रहे।
दुखों के ये पुलंदा एक क़िताब है जिसका नाम है – “10,000 दुःखद यादें: बटवांरे की ज़िंदा तारीख़”
मैं नहीं कहूंगा कि आप ये किताब पढ़ें। रहने दें, मत पढ़ें। इसे पढ़ने पर आपको अपने उस वक़्त के समाज और सोहबत पे, अपने मुल्क पे, अपने बुज़ुर्गों पे, अपने आप के इंसान होने पर भी शर्म आएगी। पर अगर आप समाज के लिए तिनका भर भी अच्छा करना चाहते हैं तो अपने बच्चों को ये पढ़ कर सुनाएँ, सिर्फ इसलिए की वो हैवान ना बने।
इन दस हजार दर्दनक यादों के जहन्नुम में एक दुखद किस्सा मेरी माँ और उनके परिवार की यादों का भी है। इनमे कुछ तो ऐसे वाक़िये हैं जो वहशत की हद के भी पार जाते हैं जिन्हे पढ़ या सुन कर आपका दिल दहल जायेगा।
मैंने मंटो और इस्मत के सारे अफसाने पढ़े हैं, उनको पढ़ कर भी मैं रोया हूं, वो भी उसी वहशत और उसी वक्त को बयान करते हैं पर उनके किरदारों को मैंने सिर्फ समझा और महसूस किया था – पर इस किताब में मैंने उनके जैसा कई किरदारों की तसवीरें भी देखी हैं जो सचाई को और भी भयानक बना देती है ।
तारीख़ के इसी हिस्से को बयां करते कई पंजाबी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी अदीबों को मैंने पढ़ा है उनके किरदारों के दर्द से मैं वाकिफ हूं पर यहां इस क़िताब में उन लोगो को चेहरे मिल गया है, तसवीरों वाले ये लोग उस वक्त की गवाही देते हैं, मुझ से बात करते हैं, सामने आ खड़े होते हैं, जवाब मांगते हैं, जिरह करते हैं और मैं उनसे आंखें नहीं मिला पाता, बिलकुल वैसे ही जैसे मेरे वालिद बतलाते थे और मैं सुन्न पड़ जाता था।
क्यों संजोते हैं हम दुखों को, किसके लिए? क्यों इक्कठा करते हैं, क्यों लिखते हैं, क्यों कुरेदते हैं उन्हें सालों साल?
मैं नहीं समझता कि दुख बांटने से कम होते हैं या मन हल्का होता है। लिखे हुए दुख तो फैलते ही जाते हैं एक पीढ़ी से दूसरी से तीसरी, ख़त्म ही नहीं होते, भूलने ही नहीं देते आगे आने वाली नस्लों को भी। और फिर इन किताबों को इन यादों को पढ़ कर, समझ कर कौन सीखा है आज तक? इन से मिली सीख या शिक्षा से कहाँ कम होती हैं त्रासदियां। आज का समय ही देख लीजिये – कौन रोक पाया है ग़ाज़ा में हो रहा नरसंहार। और क्या सबूत चाहिए हमे – अकेली 20वीं शताब्दी में ही जंग से करीब 11 करोड़ लोग मारे जा चुके हैं।
दुखों और दर्दों का ये पुलंदा बहुत भारी है।
10,000 Memories: A Lived History of Partition (Independence and World War II in South Asia – Book 1 – West Side) Published 2023 by: The 1947 Partition Archive, Berkeley, California. Rs. 4100, pp 724
ये क़िताब अगस्त 1947 में हुए एक मुल्क के बटवारें के बारे में है, अपने घरों, अपनों और अपनी ज़मीन से बेदखल हुए लोगों की है जिन पर ख़ुद एक दूसरे ने ही ज़ुल्म किये। हिन्दुस्तान और पकिस्तान से मेरी पीढ़ी के कई लोगों ने अपने माँ-बाप, दादा-दादी, दोस्तों और करीबी रिश्तेदारों को उम्र भर भयानक यादों से जूझते देखा है। मैंने तो देखा है। ये क़िताब उन दर्दनाक यादों की है और उस बोझ की है जो विरासत में ये लोग हमारे लिए छोड़ गए हैं।
ऐसा माना जाता है कि अपने पूरे जीवन में आदमी दुःख अधिक झेलता है और उसकी खुशियों के दिन कम ही होते हैं। गूगल बाबा को खंगालने से भी ये नतीजा ही निकलता है। वो तो यहाँ तक बताते हैं कि पिछले दो हज़ार साल में लिखे गए साहित्य में दुखद कहानियां की तादाद कहीं ज़्यादा है। ट्रेजेडी या दुखद अंत तलाशना अधिक सम्मोहक होता है। फिल्मों में भी ख़ुशी की तुलना में अभी तक ट्रेजेडी ही ज़्यादा बिकती है। याद कीजिये दिलीप कुमार और मीणा कुमारी को।
हमारे धर्म ग्रंथों में भी तो कितने सारे दुख दर्शाए गए हैं। रामचरितमानस को ही ले लीजिये – श्रवण कुमार के माता पिता का दुःख, राजा दशरथ का दुःख, बनवास को जाते हुए राम की माता का दुःख, भाई भरत का दुःख, अयोध्या वासियों के दुःख, वनवास में राम, लक्ष्मण और सीता के कितने ही दुःख, स्वरूप नख का दुःख, सुग्रीव का दुःख, सीता हरण का दुख, लंका नरेश रावण और उसके भाईयों और बेटे के वध का दुख और फिर अंत में सीता को घर से निकाले जाने का दुख। ईसा मसीह के सूली पर चढ़ाये जाने का दुख, कर्बला की जंग में अली हसन की शहादत का दुख। कितने गिनोगे ?
इस क़िताब में सच्ची दास्तानें हैं, आप बीते और झेले ज़ुल्म और ग़म हैं। इतने दर्द हैं कि एक को पढ़ने के बाद लगता है दूसरा किसी और जनम, किसी और साल में पढ़ेंगे। आपने कभी कहीं सुना है कि एक माँ अपने नए जन्मे बेटे को अस्पताल में इस लिए छोड़ आयी क्यूंकि उसे पैदा करने वाली दाई दूसरे मज़हब की थी। अपने जीते जी कितने किस्से आपने सुने हैं जहाँ घर के एक बड़े ने अपने हाथों से अपने दो मंज़िला घर को आग लगा दी हो जिसमे उस वक़्त उसकी तीन बेटियों और माँ अंदर रही हों । लोहे की आँखें, पत्थर दिल और बेग़ैरत जिगरा हो तो आगे पढ़िए वार्ना यहाँ से वापिस लौट जाइये ।
नीचे लिखे कुछ हिस्से इस अंग्रेज़ी की किताब से हिंदी में अनुवादित किये गए हैं। इन सब को आप से साँझा करते अच्छा तो नहीं लग रहा पर ये सच्चाई मैं छुपा भी नहीं सकता। बहुत ही भयावह और दर्दनाक घटनायें, वारदातें, प्रसंग और वृत्तांत नहीं दे रहा हूँ। बस वो जिन से आपको इन दुःखद यादों और ट्रेजेडी का अंदाजा हो जायेगा।
किताब शरू होते ही पहले कुछ पन्नो में पाठक को ये सलाह दी गई है
पाठक को समझ और विवेक से सोचने की सलाह दी जाती है। इस पुस्तक की सामग्री कुछ पाठकों के लिए भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है। गवाहों की यादों में सांप्रदायिक हिंसा, आत्महत्या, अपहरण, ऑनर किलिंग, युद्ध, लैंगिक हिंसा, क़त्ल, मौत, माली नुकसान, दंगे, चोरी, धार्मिक समूहों के प्रति अपमानजनक भावनाएं और हिंसक घटनाओं के मनोवैज्ञानिक प्रभावों से निपटने पर संभावित रूप से परेशान करने वाली यादें शामिल हो सकती हैं। पाठक को विवेक से काम लेने की सलाह दी जाती है और 18 वर्ष से कम आयु के युवाओं के लिए माता-पिता के मार्गदर्शन का अनुरोध किया जाता है।
नीचे दिए गए लोगों के नाम, उनके घर गावँ या शहर के नाम सब सच्चे और असली हैं
बेअंत सिंह रावलपिंडी से मेरठ आए मेरा जन्म पुंछ कश्मीर में हुआ था। जब मेरा जन्म हुआ, तो कश्मीर में बहुत बर्फबारी हुई थी। इस वजह से, मेरे जन्म देने के बाद हम 15 दिनों तक अस्पताल में फंसे रहे। वहां मेरी देखभाल करने वाली महिला और मुझे खाना खिलाने वाली महिला मुस्लिम थीं। जब मेरी मां को उनके धर्म के बारे में पता चला, तो उन्होंने मुझे घर ले जाने से इनकार कर दिया और मुझे मुस्लिम महिला को सौंप दिया कि वह मुझे अपनी औलाद की तरह पालें। पहले पाँच सालों तक मैं अपने परिवार को नहीं जानता था। जब मेरे पिता की मौत हुई तो मेरी माँ ने रावलपिंडी वापस जाने का फैसला किया। इस समय मेरी देखभाल करने वाली और गोद ली हुई माँ ने मेरी असली माँ से मुझे वापस ले जाने के लिए कहा क्योंकि वो मेरी ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकती थी। ये पहली बार था जब मैं अपनी मां और भाई-बहनों से मिला था। हालाँकि मेरी माँ मुझे वापस ले जाने के लिए राज़ी हो गई थीं, लेकिन उसने कभी भी मेरे साथ मेरे दो भाइयों जैसा सलूक नहीं किया इसलिए 14 साल की उम्र में मैं हिन्दुस्तान चला आया।
न. क., (पूरा नाम नहीं बताया), ये शहीद भगत सिंह नगर जिले में रहती थीं जब हमारी माँ हमारे लिए दूध लाती थी, तो हमें डर होता था कि दूध में जहर है और हम ये सोचते थे कि इससे पहले कि भीड़ हमारा अपहरण और बलात्कार कर सके, हमारे पिता ने हमें मारने का फैसला किया था। जब मेरे पिता ने आस-पास के गाँवों से मुसलमानों को बाहर निकाल भगाया, तो हमारा सामूहिक भय समाप्त हो गया।
रोशन लाल, भरमौर, चम्बा से बटवारे की अफ़वाहों के चलते हिन्दू बिरादरी के लोगों ने दर फैलाया और इसे मौका बना कर मुस्लमान लोगों को इस इलाके से निकाल दिया।
खान हुसैन ज़िआ, जालंधर से लाहौर गए क़त्ले आम, रिफ़्यूजी लोगों की परेशानियों और बटंवारे के बीच लाहौर में तेज़ बाढ़ आ गई। वहां दो लोगों की ड्यूटी ये लगाई गई की लुटे हुए सामान को कैसे बाटना है।
देवराज सिक्का, जमपुर पाकिस्तान से लुधिअना आये अक्टूबर के महीने में, महात्मा गांधी ने पाकिस्तान से आये हुए शरणार्थियों से शहर के मुस्लिम निवासियों को बेदखल ना करने का आग्रह करने के लिए पतिपन का दौरा किया। फिर भी कुछ दिनों बाद शरणार्थियों ने मुसलमानों को जबरन बाहर निकाल दिया। मुझे खेद है कि हमें खाना पकाने के ईंधन के लिए कई घरेलू पुस्तकालयों में कुछ ऐतिहासिक पांडुलिपियों को जलाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
कृष्ण दोनों तरफ अपने ही लोग थे, दोनों क़ौमों मिल जुल के रहती थीं, दोनों मज़हब के लोगों भी मुहल्लों में इकठा ही रहते थे, हैरत है फिर भी ये सब हुआ। आख़िरकार जब हम पटियाला आ गए, तो बच्चा होते हुए भी मैंने मज़दूरी की था और एक साल तक स्कूल नहीं गया। मैं अलग-अलग गांवों से अंडे इकट्ठा करता और लोगों को घर घर जा के बेचेता था।
अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला के पिता बनारसी लाल चावला शेखपुरा, लाहौर से करनाल आये लोग अपना सामान ट्रेन में चढ़ाने लगे। पर उनके चढ़ने से पहले ही ट्रेन उनका सामान लेकर रवाना हो गई। वहाँ एक खाली मस्जिद थी जहाँ हम लगभग नौ साल तक रहे। मैंने टॉफियाँ बेचकर कुछ पैसे कमाए उस से ज़्यादा कमाई नहीं होती थी। आख़िरकार मैंने मस्जिद में रहते हुए शादी कर ली और मेरी पत्नी की तीन बेटियाँ और एक बेटा था। हमारी सबसे छोटी कल्पना थी।
मिल्खा सिंह, (नामवर धावक) बस्ती बुखारी, कोट अड्डू मुज़फ़्फ़रगढ़ से दिल्ली आये मैंने अपने पिता को बहादुरी से लड़ते हुए देखा और मुझे उन पर तलवार से हमला होते देखना याद है। जब वह घायल हो कर गिर गए, तो वह चिल्लाये, “भाग मिल्खा, भाग”, ये कहते हुए हुए कि मैं अपनी हिफाज़त के लिए भाग जाऊं।
1947 का विभाजन अधिक जटिल था क्योंकि दोनों पक्ष पीड़ित भी थे और अपराधी भी। वर्ल्ड वॉर 2 वाले यहूदियों के प्रलय में एक तरफ के लोग, जर्मन, अपराधी थे और दुसरे शिकार ग्रस्त या पीड़ित थे। उसे हिंसा को समझना आसान था क्योंकि आघात को एक तरफ और अपराध को दूसरी तरफ जिम्मेदार ठहराया जा सकता था। – अनिरुद्ध काला ,1947 में पैदा हुए
शेर सिंह कुक्कल (सिख), बफ़ा, खैबर पख्तूनख्वा से गोरखपुर आये सन 1947 में कई लोगों ने धर्म और पहचान बदलना शुरू कर दिया था । 10 अगस्त से पहले, एक रात धमकी देने वाली मुनादी हुई और हमारे मुस्लिम दोस्तों ने हमें अचानक होने वाले हमले की चेतावनी दी। उन्होंने एक ट्रक मंगवा कर हमें महफूज़ जगह पर ले जाने का इंतज़ाम किया।
इकबाल बीबी, क्वेटा, बलूचिस्तान से होशियारपुर, पंजाब आयीं मुझे अपनी इज़्ज़त और अपनी जान का डर था। मैंने खुद को कीचड़ और गंदगी में छिपा लिया ताकि मैं उन के लिए बदसूरत दिखूं और वो मुझ पर ध्यान ही न दें। दंगाई ख़ासतौर पे रिफ़्यूजी कैम्पों में रहने वाली और अच्छी दिखने वाली औरतों को अगुवा कर उनका बलात्कार कर रहे थे।
अवतार कौर ढिल्लों मुज़फ्फराबाद कश्मीर से जम्मू आयीं मुझे सब साफ़ साफ़ याद है। हमारा परिवार भागने के दौरान अपना कोई भी सामान नहीं ले जा सका, इसके बजाय बुजुर्गों ने हमारे घर में आग लगा दी और हमारे पास जो कुछ भी था उसे जला दिया। मुझे याद है कि बड़ी उम्र के लोगों ने अपने बच्चों की प्यास बुझाने के लिए गीली मिट्टी को कपड़े की थैलियों में रख उसमे से निचोड़कर पानी निकाला । हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं था। मेरी दो बहनों की पुंछ में मौत हो गई। कई लोग भूख से मर गए और बच्चे दूध की कमी से मर गए।
सुचवंत सिंह, कोटली मुज़फ़्फ़रबस्द कश्मीर से श्रीनगर कश्मीर अपने घर से निकल जब हम अगले गाँव पहुँचे, तो हमने फिर से अपनी माँ और भाई-बहनों के बारे में पूछा। वहां के लोगों ने मेरी दादी को बताया कि उनके परिवार के एक सदस्य ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए मेरी मां और बहन को मार डाला है। मेरी चचेरी बहनें जिनका अपहरण कर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया था, वे सीमा के दूसरी ओर आज तक रहती हैं।
मोहम्मद इक़बाल, भारेवाल, सियालकोट से (बचपन का नाम – मदन ) हिंसा के दौरान मेरे दादाजी को उनके गन्ने के खेत में घात लगाकर मार दिया गया । उनकी हत्या के बाद, मेरे परिवार ने इस्लाम धर्म अपना लिया और हमने मेरे दादाजी को गांव में ही दफना दिया। मेरी आखिरी इच्छा है कि समय के खिलाफ दौड़ हारने से पहले मैं अपनी बहन महिंदर जी से आखिरी बार मिलूं। बटवारें के दौरान मुझे बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा – सबसे बड़ी कठिनाई मेरे माता-पिता और भाइयों से अलग होना थी। जब मैं अकेला होता था तो रोता था।
नूर दीन के पुत्र लालदीन सिंह, जिनका परिवार तंगोरी, चंडीगढ़ से पस्सु पाकिस्तान गया जब परिवारों को छुपते हुए या दुश्मन से बचते हुए रिफ़्यूजी कैंप में जाना पड़ता था, या सरहद को पार करना होता था, तो कुछ डरपोक लोग अपने बच्चों को पीछे छोड़ देते थे, क्योंकि बच्चे अक्सर शोर मचाते थे, जिससे भागने वाले पकडे जा सकते थे या उस से पूरे परिवार मारा जा सकता था।
विलायत खान, (गायक) गोस्लान पिंड, लुधियाना से पाकिस्तान में सर्गे चले गए सदमा इतना था कि वहां पहुँचने के बाद मैं गाना भूल गया, इनमे वो गीतों और कविता भी शामिल थे जो मैं बटवांरे से पहले बचपन से गाता था। वहां मेरी कला की सराहना करने वाला भी कोई नहीं था। रोटी कमाने और ज़िंदा रहने के लिए, मैंने भेस बदल कर लकड़ी काटने जैसे छोटे-मोटे काम किए। हिन्दुस्तान में गोस्लान वापिस लौटने के बाद मेरा संगीत मेरे पास वापस आ गया। तब से, मैंने गाना जारी रखा है और मैंने ढद्दी संगीत के लिए यहाँ पहचान बनाई । संगीत नाटक अकादमी ने मुझे 2009 में पुरस्कार से सम्मानित भी किया।
एम. के. (पूरा नाम नहीं बताया), जिला नारनौल हमने गांव के लंबरदार की बंदूक चुरा ली और अपने गांव में कीकर के पेड़ पर चढ़ गए। पहले दो लोग जो हमारे पास से गुजरे हमने उन्हें गोली मार दी । यह कोई जंग नहीं थी – यह नारोवाल में कर्बला था
रोमिला थापर जो बटवारे के समय पूना में रहती थीं आज़ादी की लड़ाई ने प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रति जुनून पैदा कर दिया था क्योंकि कई लोग इस सवाल से जूझ रहे थे कि हम कहां से आए हैं और भारतीय होने का क्या मतलब है। जबकि हमें यह पूछना चाहिए था कि एक स्वतंत्र राष्ट्र होने का क्या मतलब है।
10,000 मेमोरीज़: इस पहली किताब में 1,000 से ज़्यादा तस्वीरें हैं और हर पन्ने पर लोगों से हुई मार्मिक बातों के कुछ हिस्से हैं जो पढ़ने वालों के लिए उस समय के इतिहास को सामने लाती हैं। प्रकाशक इस श्रृंखला में 50 और किताबें निकालेंगे।
प्रकाशक ने अपने नोट में लिखा है कि “10,000 मेमोरीज़ कई वर्षों की कड़ी मेहनत का परिणाम है जिसमें अखिल-दक्षिण एशिया स्तर पर भारतीय उपमहाद्वीप में सैकड़ों मौखिक इतिहासकारों द्वारा लिए गए साक्षात्कार शामिल हैं। सरकारी रिकॉर्ड और अन्य समकालीन स्रोतों के आधार पर विभाजन के विशिष्ट इतिहास के विपरीत, यह उपन्यास अध्ययन उन जीवित मानव अभिनेताओं के जीवित इतिहास के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो व्यापक सामाजिक संदर्भ में भू-राजनीतिक महत्व की उस अविस्मरणीय घटना के कारण पीड़ित हुए थे। द्वितीय विश्व युद्ध के भूले हुए चीन-बर्मा-भारत रंगमंच का आर्थिक परिदृश्य। सिंह भल्ला और उनकी टीम ने एक उत्कृष्ट दृश्य इतिहास प्रदान करके अत्यंत कठिन काम किया है… इसे पढ़ना आनंददायक है, और यह निश्चित है कि यह विभाजन का एक उत्कृष्ट अध्ययन बन जाएगा।”
राजिंदर अरोरा, 20 दिसंबर 2024
The BookAn interview with one of the displaced personThe renowned Olympian athlete Mr Milkha Singh having his interview recorded A map showing location of displaced families
Having picked up eight titles for Ma from a Hindi publishers’ stall I realised it would not be possible for me to carry them in my two hands or lug them on the shoulders as all three were overbooked. I had already bought 23 books. (This is one event and place where I splurge and don’t feel guilty.) As the latest lot of books had been paid for, I didn’t want to disappoint the publisher by returning them. The lady, the publisher that is, was standing right next to me and had figured out my dilemma. She had not only helped me select some titles but was gracious to introduce me to an author and ask her to sign a copy for Ma. Looking at me she said, ‘you could leave the books here for now and pick them up as you are leaving’.
Was Jesus talking about a visit to the book fair when he said, “To carry one’s own cross”!
The lady’s offer was some relief but not the solution to my problem. This was an unplanned and unscheduled visit to the Book Fair as I happened to be in Mandi House for some work. Our driver was absent yesterday who normally doubles up as an enthusiastic visitor to the Mela with me. This time around I had to find a way to offer a sacrifice for the obsession.
At subsequent stalls I enquired if they would dispatch the books to my address if I paid them upfront. The answer was an emphatic No with the head bent down unable to face the reader. At many other stalls too my request was turned down. Brozo and Ola services wanted the books to be brought outside to the gate. Desperate, I was cursing the Mela and the uncouth publishers; a few of them claiming to be anti e-commerce platforms.
I sighed, the good old times were great, publishers were eager to book orders and dispatch later; 30% discount and no postage was the done thing. During the 80s Jhalli Waalas and Collies roamed around the Fair with their cane baskets ready to transfer the booty to any available transport outside the Maidan. Tea and snacks stalls lined up next to Hansdhwani Theatre and the Lake were always helpful in storing the bulging bags of books. Alas, so much is lost with time including the humble cup of regular kadak chai. There is not a stall around the halls which sells strong desi chai.
Wednesday was an easy day for the mela. Bereft of crowd publishers were sitting and yawning. The English paperback churners were, as usual, busy with wannabes to be seen with a certain author. Other than Hindi, other Indian languages were missing, however, what was selling was the magic of Lord Ram. Illustrated colourful volumes on every conceivable fraction of his life and times were stacked up at every tenth stall. There was one that was selling “Bolti Ramayan“, playing dohas from Charitmanas. Marigold garlands and jamun leaves adorned some stalls – incense was burning in front of a title in one of the stalls and a battalion of salesmen were out to lead you to the “spiritual path” with their books. Strangely, missionaries were conspicuous in their absence though what one found in abundance were authors, particularly of the genre called poetry.
Many a reading sessions and ‘meet the author’ events were happening with little audience paying attention to them. Forget the book, a selfie with the author is more important. The best attraction for the selfie-loving-lot were the Arabs and the Sheikhs at Saudi Arabia pavilion. There was a long queue of young and old Indians lined up at the large SA pavilion waiting to take a selfie with the white abaya-wearing Arabs smiling in their chequered red keffiyeh. Give me one reason why someone should be taking a selfie with a group of unknown Arabs, especially knowing well that they don’t even support the Palestinian cause any more. On the other side of their stall I realised ‘Dates were the Baits’. BTW the Arab nation is the partner country in this year’s fair.
Indian Council of Historical Research (ICHR), the nodal body to document history in the country has put up a large pavilion with the theme ‘Jammu, Kashmir & Ladakh Through the Ages: A Visual Narratives of Communities and Linkages’, which, not surprisingly, has very little space for Islamic or Buddhist heritage of the region. Models of shikaras over a dry lake welcome the visitors. Agar firdaus bar ru-ye zamin ast – where is it I ask?
I wish the NBT had distributed free copies of the Constitution of India to the visitors instead of spending money planting hordes of selfie points with the mahamahim showing a copy of the Constitution. I hope and pray that the people of this great nation preserve and defend the sacrosanct text behind the black cover. There was no avoiding the Orwellian face which was everywhere together with the signs that said, आप निगरानी में हैं .
However tiring and frustrating, so what if book prices are going through the roof, and who cares if quality international publishers are missing; the mela is a mast place to spend a couple of days at the beginning of spring. One ends up bumping into old friends and getting nostalgic about that book fair where we had dreamt of Pushkin, Chekhov, and Nabokov, where we had recited Sylvia Plath, Ezra Pound, Harper Lee and Dostoevsky; where we sang of peace and “Imagine all the people” was our anthem. Ah!
For me, the find of this mela was Promenade Books, an independent publisher of classic literature who have chosen to bring back books that are scarce or out of print. A young Abhay Panwar at its helm is an all-in-one machine doing everything for his nascent publishing house, all by himself. Impressed not only by his choice of titles but also by the cover designs and the production quality I spoke to the charming lad at length. A dropout from St. Stephen’s Delhi, Abhay is almost serving a notice to publishers big and small with his quality and pricing. The enthusiastic and well-read young man explains in detail about each title/author he has produced. Wishing you all the luck Abhay. Best wishes till we meet in the next Fair.
Anas is his name. ‘Anas’ means loving, affectionate, friendly. Look at the size of his collection bag, I call it ‘a cauldron of love‘. It is not his love for cleaning other people’s waste but the love for his family of six who he has to feed. Anyone would be jealous of a warehouse of those proportions. It is only 8 in the morning, for him ‘the day has just begun’ and ours is only the third lane in his ‘ first round’. Anas Mahmood is the garbage collector of our neighbourhood. A permanent smile stays pasted on his face.
Anas has cuts on fingers of his right hand. He says, “people are careless, they leave broken glass and other sharp objects in the bags I empty.” He has a separate place under the cart for ”kabad, gatta, bottles and plastic”, those and “discarded packaging helps me make about 80/100 rupees extra per day.” Since Covid people order a lot of stuff online and as a result I get to collect a lot of discarded packaging.
‘Winter is over’, he says, ‘Bosant is coming and this is the time of the year when I am hit by jukham‘, he sneezes and coughs as I step away. I will be fine by Holi, just a month away.’ A dead beedi is dangling between the two middle fingers of his left hand. Taking it to his lips he lights it. Coughing and laughing in turn he moves in and out of the driveways of the houses where garbage bags are lined up. Aren’t you scared of catching an infection? I ask him. ‘Tell me what else to do?’, he questions. No one pays him for garbage collection – neither the residents nor the developer of Millennium City or the municipal authorities.
“बीमार हो जाओगे – वही हाथ से कूड़ा उठाते हो वो ही मुँह पे लगते हो – छिः” A woman reprimands him from the first floor balcony of her house. Shaking his head and brushing aside the warning, Anas pushes the cart ahead to the next house. Anas, I recall was also the name of a companion of Prophet Muhammad (PBUH). ‘Anas ibn Malik’ was known for his loyalty and service to the Prophet and is considered a role model for humanity.
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