By the time I reached home he was dead. Traces of white still there on the right side of his face – under the jaw and on his neck. He had finished shaving half his face, the other half still with the stubble of the day before shining in dried shaving cream. He was lying on the warm cement floor with nothing under his head; must have been put there by the neighbours who were standing around him. I didn’t like it and wanted to put him on the settee where he would snooze in the afternoons. That July was much warmer, no rains that year. Sitting in a corner, mother was delirious and wailing. Grief is a river, it must run, I didn’t console her. The neighbourhood doctor, still by his side, got up and held my hand offering condolences. That morning of July 29th I had driven like a maniac only with the hope I would be able to say, ‘Bye Dad’. But no, like always he was in a hurry.
Photo: Daddy (in black jacket) posing for a photo from the jharokha of his house in Lahore. Don’t miss the beautiful cinquefoil arch at the entrance to the house (bottom left) and the lotus on it. The lakhori brick structure has stayed in tact for over 85 years since its construction.
कुछ किताबों को एक ख़ास माहौल में पढ़ने से उनमे छिपे कई पहलुओं को एक साथ समझा और जाना जा सकता है। पर ये भी याद रहे कि वो किताब वो मज़मून उस ख़ास माहौल में आपको दुगना-चोगुना परेशान और बेहाल भी कर सकता है। ये मैंने तब महसूस किया जब पिछले हफ्ते मुझे माँ के नज़दीक बैठ लम्बा वक्फ़ा उनके साथ बिताना पड़ा जिस दौरान एक ऐसी क़िताब मेरे हाथ लगी जिसका माँ के बचपन और भयानक त्रासदी वाले दौर से गहरा ताल्लुक था ।
पिछले दस बारह रोज़ से माँ की तबियत फिर से ख़राब है। शरीर में फिर से वो ही केमिकल्स का खेल – कभी सोडियम नीचे है तो कभी पोटैशियम। कभी अम्ल ऊपर है तो कभी क्षार या नमक। वो रात-रात भर सो नहीं पाती, सर चकराता रहता है, रक्त चाप बहुत ऊपर, हर दो मिनट में वो बाथरूम जाना चाहती हैं, खाना खाने का मन नहीं करता। चिढ़चिढ़ी और सूख कर काँटा होती जा रही हैं। डॉक्टर कहते हैं सिवा ग्लूकोस ड्रिप लगाने के और कुछ कर नहीं सकते जो वो लगवाना नहीं चाहतीं।
दिन रात बस बिस्तर पे लेटी रहती हैं, पीठ के बल, बिना हिले-डुल्ले। कन्धा भी नहीं मोड़तीं, बस एक जग़ह बेसुध से पड़ी रहती हैं। आँख खोलती हैं तो मेरा नाम लेती हैं, मुझे पूछती हैं और मुझे देख फिर से आंखें मूँद लेती हैं। उन्हें दिलासा देने और उनकी तसल्ली के लिए मैं उनके साथ ही रहता हूँ, उनके बाईं ओर, बस एक हाथ दूर ।
चूँकि मेरे लिए कुछ और करने को है नही सो एक किताब मेरे हाथ में ही रहती है और उस किताब के ज़रिये साथ रहते हैं किताब में चल रहे बर्बर तबाही के दिन, उस वक़्त के कुछ नामगिरामि शायर और उस किताब का लेखक जो चार महीने तक ये नहीं तय कर पा रहा को उसे नई खींची गई सरहद के इस पार रहना है या उस पार। उसके शहर में चारो तरफ मौत का मंज़र है, बारूद और आदम खून की मिली जुली गंध है, मौत की गंध है।
यहाँ माँ के कमरे में भी एक गंध लटकी है, यकीनन वो माँ की गंध है। वो एक खास गंध है जो मेरे कमरे में नही है, बाहर लॉबी या रसोई में नहीं है, ड्राइंग रूम में नहीं है ऊपर वाले कमरों में नहीं है । वो सिर्फ़ माँ के कमरे तक ही है। वो गंध सिर्फ इस कमरे में रहती है, तैरती है, उड़ती है, कभी सोफे पर बैठी मिलती है तो कभी गाव तकिये या पर्दों से लिपटी। दवाओं के डिब्बे का ढ़क्कन खोल के मैं उसे सूंघता हूँ, वो गंध वहां नहीं थी, उसमे दवाओं वाली गंध थी। हम सब जानते हैं दवाओं वाली गंध कैसी होती है। और तो और खिड़की और दरवाज़ों में भी वो ही गंध है।
उनके कमरे में पहले कभी हरसिंगार, गेंदे, चांदनी या गुलाब के फूलों की महक होती थी। आजकल उनके बिस्तर के सिरहाने मैं मोतिये और रात की रानी के फूलों की एक टहनी गुलदान में लगा कर रख देता हूँ।
जिन दिनों वो पिताजी की तस्वीर के सामने धूप या अगर बत्ती जलाती थी, उन दिनों दूसरे तरह की महक कमरे में तैरती थी जिसे महसूस किये हुए लम्बा अरसा हो गया। माँ अब धूप या अगर नहीं जलाती। पिता की तस्वीर भी अब मायूस सी कोने में पड़ी है, माँ शायद उन्हें पहचानती भी नहीं है माँ का हाथ पकड़ मैं उनकी कमीज का कोना सूंघता हूं, वो गंध वहां नहीं हैं। ये क्या, मैं असमंजस में पड़ जाता हूँ।
कल से माँ के साथ उनके पलंग पे अधलेटा, अधबैठा मैं एक ऐसी किताब पढ़ रहा हूँ जो पहली बार सन 1948 में छपी थी। असल क़िताब उर्दू में थीं मैं उसका अंग्रेजी तर्जुमा पढ़ रह हूँ। (शर्म आती है – उर्दू सीख ली होती तो असल ज़बान की बारीकियां भी समझ में आ जातीं) । क़िताब क्या इसे डायरी ही समझिये – रोज़-बा-रोज़ एक-एक दिन में बंधा इस मुल्क की तारिख का खाका है उस साल का, उस दौर का जो माँ ने भी देखा, सहा और जिया और किताब लिखने वाले ने भी। तारीख़ तो बहुत से लोग जीते हैं पर एक खास तस्सवुर में अपने आसपास घाट रहे हर पल को बयान करने का हुनर सिर्फ़ इसी इंसान को ही था। लाइव रनिंग कमेंट्री ऑफ़ ए कार्नेज।
ये डायरी लिखी गई थी सन 1947 की 9 अगस्त से 8 नवंबर तक। मुल्क़ आज़ाद होने के सात दिन पहले से आज़ादी मिलने के ढ़ाई महीने बाद तक। लिखने वाला अदीब पैदाइश ही से लाहौर में रहता है जिसके यार बेलियों में कुछ कुछ नाम ये भी थे – साहिर लुधियानवी, क़तील शिफ़ई, मुमताज़ मुफ़्ती, आरिफ अली मुहम्मद, राही और फैज़ अहमद फैज़ – सब शायर और इन सब का ज़िक्र क़िताब में आता है।
ये दूर के दोस्त नहीं थे, सब क़रीबी थे, सब वहीँ लाहौर में थे, लेखक के साथ उठते-बैठते, चाय और सिगरेट पीते, सोचते, मायूस होते, गुस्साते, रोते और अपनी अपनी ख़ैरियत और जान की फिक्र में ये ना तय कर पाते कि उन्हें अब करना क्या है। उनकी आइडेंटिटी अब क्या है? क्या वो बस सिख, हिन्दू या मुस्लमान हैं ? उनका उस शहर से रिश्ता क्या है जहाँ वो पैदा हुए, बड़े हुए और जिस शहर को ही उन्होंने अपना मादरे-वतन कहा? क्या कोई और वतन है जहाँ वो इस हिन्दू-मुस्लमान के झगडे से बाहर निकल कर रह सकते हैं? उन्हें कहाँ रहना है, कहाँ जाना है और सबसे बड़ा सवाल था लाहौर छोड़ कर “क्यों जाना है”? उन्हीं दिनों बिलकुल यही सवाल माँ और पिता जी के सामने भी रहा था।
आजकल माँ भी ज़्यादा समय लाहौर में ही बिताती है। बीते, पुराने वक़्तों में। अपने घर और वहां की गलियों में, अपनों के बीच, अपने स्कूल और घर के बीच के मैदान में खेलती, खो जाती और फिर अपने अपने आप को ढूंढ लेती बिलकुल वैसे जैसे ये लेखक जो अपने शहर की गलियों में ही रास्ता भूल जाता है। उसे कुछ गलियों में जाने से ख़ौफ़ है, कुछ में जाने को वो मजबूर है।
ये डायरी उन वक्तों का आँखों देखा और आप बीता कच्चा चिठ्ठा है जिसके बारे में लेखक ने पहले पन्ने पर ‘बाद’ में दर्ज़ किया “अँधेरे के रेले में”। ये वो दिन थे जब इन सब दोस्तों ने अपने प्यारे शहर लाहौर में कत्ले-आम, आगज़नी, लूट-पाट, मार-काट, अपहरण, अगवाई, बलात्कार और दुनिया का हर वहशियाना गुनाह होते देखा जिसके बारे में सिर्फ सुन कर भी आपको शर्म आ जाये।
ये डायरी है अपने वक्त के मशहूर ओ मारूफ़ अफसाना निगार फ़िक्र तौंसवीं साहब की, जो जब छपी थी तो उसे नाम दिया गया “छठा दरया”; जिसका अंग्रेजी नाम है ‘द सिक्स्थ रिवर’। पंजाब की पांच नदियों के बाद नफरत की एक और गहरी नदी। इस नदी का नाम क्या है या क्या था – वो था तक़सीम, बटवारा, पार्टीशन, वंड।
9 अगस्त 1947. तारीख़ दोहराते ही मेरे ज़ेहन में तेज बिजली कौंधती है और मैं सहम जाता हूं।
माँ आँखें मूंदे सो रही है, मैं चाहता हूँ कि उसे उठा कर कहूं एक बार फिर वो वाकिया सुनाओ और अपने दर्द ताज़ा कर लो, ये लेखक भी तुम्हारे साथ का ही है।
एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म की रील मेरी आँखों के पीछे चलने लगती है साउंड ट्रैक में कई जगह बहुत खड़-खड़ है पर आदम शोर नहीं है। टप-टप, टप-टप सी एक आवाज है, जानी पहचानी – 9 अगस्त वो ही दिन जिस सुबह माँ और उनके परिवार, मेरे नानके ने लाहौर छोड़ा था। आज़ादी अभी छः रोज़ बाद थी पर वो कूच करने को तैयार थे, आज़ाद होने को आतुर, उस मुल्क में जो पहले से ही उनका था बस इस ओर नहीं था। उस रोज उन्हें स्टेशन छोड़ने के लिए तांगा आया था। याद आया, ये टप-टप टप-टप उसी तांगे की आवाज है जो बार बार माँ दोहराती थी। अब तो तांगे भी नहीं दिखते। माँ टप-टप भी भूल रही है।
फ़िक्र तौंसवी के लिखे तीन महीने के बयान में तांगा सिर्फ एक बार आता है, लाहौर स्टेशन के बाहर, बस एक बार। लाहौर स्टेशन की इमारत उस रोज़ रेल स्टेशन कम और मुर्दघाट से ज्यादा मिलती थी। वो लिखते हैं वहां इतनी लाशें थीं की जिसकी सड़ांध से घोड़ा भी आगे जाने से मुनकर हो गया।
मेरे पिता जी और उनके परिवार ने 10 अगस्त को लाहौर छोड़ा था। फ़िक्र तौंसवी की डायरी में 10 तारीख़ का कोई ज़िक्र नहीं है। 9 से वो सीधे 11 अगस्त पे आ जाते हैं। 10 तारिख को कहाँ थे आप तौंसवी साहेब? जो आपने देखा क्या वो इतना नाक़ाबिले बर्दाश्त था कि उस बारे में लिख भी न सके। आदमी का वहशीपन शायद अपने उरूज़ पे रहा होगा 10 अगस्त 1947 को ।
माँ हिलती हैं, गर्दन मेरी तरफ झुका के मुझे देखती हैं और फिर आँखें बंद कर लेती हैं।
किताब के पहले 50 पन्ने पढ़ने तक मुझे ऐसे लगता है जैसे मैंने ये किताब पढ़ रखी हैं, हाँ ये किस्से, ये वाकये मैंने कई बार सुन रखे हैं, मुझे ये सब याद है, कण्डस्थ। यकीन कीजिये इसके आगे आने वाले पन्नो पे जो लिखा है मैं आपको वो सब सुना सकता हूँ। शायद हर्फ़-ब-हर्फ़ न कह सकूँ पर तफ्सील से सब कुछ बता सकता हूँ । हो सकता है तुम्हारे किरदार का नाम सरदार सिंह हो और मेरे का असलम – बस फ़र्क़ इतना ही होगा या फिर गोपी चंद।
पर मैं उस चाकू को, उस ख़ंजर को हू-ब-हू बयान कर सकता हूँ। उसका रंग, उसकी तेज़ धार, उस पे लगा गर्म ख़ून जिसे क़ातिल ने अभी दो मिनट पहले ही तो वाण वाली चारपाई से पोंछा है मैं उस सब को जानता हूँ । मैं क़ातिलों को भी जानता हूँ मैंने उनके नाम पहले भी सुन रखे हैं। याद आ गया – माँ ने कितनी बार दोहराया था उस किस्से को और उसके साथ कितने और किस्सों को। उन दिनों लोग नहीं मज़हब मर रहे थे, हर रोज़, सारे मज़हब।
माँ की अपनी डायरी में भी तो लिखा है “आइए सभ्य समाज की मौत पर शोकगीत लिखें”। बिलकुल वैसे ही जैसा फिक्र तौंसवीं ने लिखा है। फिक्र तौंसवीं, माँ और पिता जी से कुल 12 साल ही तो बड़े थे और फिर उसी शहर लाहौर के। लाहौर ज़िले के तौंसा शरीफ पिंड में पैदा हुए फिक्र तौंसवीं का पैदाईशी नाम राम लाल भाटिआ था। फ़िक्र अपने अफ़सानो में लिखे तंज़ के लिए जाने गए। ‘छठा दरया’ कोई तंज़ नहीं था।
माँ अभी आँखें मूंदे सो रही है नहीं तो अभी फ़िक्र तौंसवीं के कई रेडियो ड्रामे गिनवा देती। अपने बचपन में मैंने भी उनके लिखे कई अफ़साने हवामहल और उर्दू सर्विस पे सुने थे। ड्रामे छोड़िये मज़मून पे आईये।
पतझड़ अभी सड़कों पे बिखरी पड़ी है, पेड़ नंगे हो चले हैं जबकि गर्मी कब से ही दरवाजे पीट रही है। गुडगाँव में पड़ रही शदीद 40 डिग्री गर्मी में सब जल सा रहा है बिलकुल वैसे जैसे 9 अगस्त 1947 को लाहौर में जल रहा था। वहां बिजली तब तक काटी नहीं गई थी पर लोग आगज़नी से बेहाल और डर के अँधेरे कमरों में छुपे बैठे थे किसी ने बत्ती नहीं जलाई थी – आज यहाँ ऐरकण्डीशनर के बावजूद माँ असहज है, पैर पटक रही है। मैं उसे उठा देना चाहता हूँ – उठो – दो एक पन्ने पढ़ के सुनाना चाहता हूँ – उसके घाव फिर से ताज़े करना चाहता हूँ सिर्फ ये देखने के लिए की क्या उन वक्तों का दर्द अभी भी बचा है। आज के माहौल में भी तो कुछ कम तो नहीं हो रहा। पार्टीशन ना सही गले तो आज भी कट ही रहे हैं।
माँ उठ गई हैं। पलट के मुझे गौर से देख रही हैं। वो शायद टॉयलेट जाना चाहती हैं। मैं उनकी अटेंडेंट सानिया को बुलाता हूँ जो अभी कुछ दिन पहले ही आई है। दस जमात तक पढ़ी हसमुख सानिया देवरिया की रहने वाली है। उठते ही माँ मुझसे सवाल करती हैं :
“हम कहाँ है? और कितने दिन चलते रहेंगे, मैं बहुत थक गई हूं। हमारे साथ वाले भी सब खो गए हैं कोई लॉरी भी नहीं आ रही। नीचे वाले कमरों में कौन रहता है? हमें कौन रखेगा – तू मैंनू ले जाएगा ना? मेरे पास चाय के भी पैसे नहीं हैं। कोई कपडे भी नहीं है मेरे पास। अब चलो यहाँ से। ऐसा अच्छा नहीं लगता किसी के घर ठहरना। अपने लोगों को भी तो ढूंढना है।”
ये वही सवाल हैं जो एक मुल्क से दूसरी तरफ जाने वाले लोग उन दिनों कर रहे थे। क़िताब को बंद कर मैं एक तरफ़ रख देता हूँ। अपनी आँख के कोने से माँ अंग्रेज़ी में लिखा छोटे अक्षरों वाला शब्द पार्टीशन (तक़सीम) पढ़ लेती हैं। फिर गौर से कवर पे छपी उस ट्रैन की तस्वीर को देखती हैं जिसमे खौफ के मारे लोग जाने कहाँ पहुँचने का इंतज़ार कर रहे हैं । एक नज़र मेरी तरफ देख माँ मुँह मोड़ लेती हैं। ज़ाहिर है वो मुझ से या किताब से खुश नहीं हैं। मैं जब उनके कमरे से उठ कर बाहर आता हूँ तो महसूस करता हूँ कि बाहर की हवा और अंदर की हवा में कुछ फर्क है, अंदर हवा में भारीपन है, एक गंध है जैसा पहले भी लगा था।
मैं याद करता हूँ पंजाब में तो सिर्फ पाँच दरया थे तो फिर ये छठा कौन सा है। ये गंध उसी छठा दरया की है जो सड़ते खून का, मौत का, विछोड़े का, चीखों का दरया है जो पंजाब के लोगों ने आपसी नरसंहार से बनाया। ये वो बू है जिसके बारे में माँ अक्सर बताती थी “ये बू जाती ही नहीं है”।
फ़िक्र तौंसवीं की क़िताब द सिक्स्थ रिवर (छठा दरिया) से कुछ अंश
11 अगस्त 1947
चौबीस घंटे के घिनौने और शरीर को थका देने वाले कर्फ्यू के बाद, आज सुबह मैं आखिरकार अपने घर से बाहर निकला। चारों तरफ सुस्ती और नीरसता की हलचल शुरू हो गई थी। सड़कों पर आतंक और भय की परतें जम गई थीं। लोग इन परतों को सावधानी से पार कर रहे थे। संदेह और भय – भय और संदेह! ऐसा लग रहा था मानो सड़क पर हर कोई बम या चाकू लेकर चल रहा हो और पलक झपकते ही दुश्मन की पीठ में उसे घोंप देगा। सभी लोग पीछे मुड़ रहे थे। उस सड़क पर आदमी नहीं बल्कि दुश्मन चल रहे थे। सैकड़ों डरे और झिझकते दुश्मन अपने घरों से बाहर निकल आए थे।
उनमें कोई मेरा दोस्त नहीं था। इधर-उधर घूमते हुए, मैं आखिरकार अपने दफ्तर की ओर जाने वाली सड़क पर आ गया।
यह सड़क मुस्लिम बहुल इलाके से होकर गुजरती थी, जहां तीन दिन पहले बम धमाका हुआ था। इन इलाकों से गुजरना मेरी आदत बन गई थी। यह मेरी मानसिक बनावट का हिस्सा था। मैं और क्या कर सकता था? सुरक्षित इलाकों से गुजरने में मानसिक खतरा था। जब तक मैं अपने दफ़्तर पहुँचा, धुआँ और लपटें मुझे घेर चुकी थीं। दफ़्तर के ठीक बगल में एक भव्य इमारत आग में धू-धू कर जल रही थी। वहाँ एक बहुत बड़ी भीड़ थी। यह एक अजीबोगरीब भीड़ थी – हिंदू और मुसलमान दोनों मिलकर आग बुझाने की कोशिश कर रहे थे।
इस आग ने दो संस्कृतियों, दो धर्मों को एक कर दिया था। मैं ऐसी आग का स्वागत करता हूँ, उसे सलाम करता हूँ। मैं ऐसी आग पर लाखों दार्शनिक, विद्वान और साहित्यिक राय और विचार कुर्बान करने के लिए तैयार हूँ, जिसने 11 अगस्त को मुसलमानों और हिंदुओं को एक समान यातना दी।
इमारत की पहली मंजिल पर बिशन दास बिल्डिंग लिखा था। इमारत की निचली मंजिल पर एक बुक-बाइंडर की दुकान थी, जहाँ दर्जनों कर्मचारी रोज़ाना कुरान की प्रतियाँ बाँधते थे। दोनों जल रहे थे – हिंदू इमारत और मुस्लिम कुरान। कुछ लोग पहली मंजिल पर एक गर्डर के नीचे दबे सात-आठ साल के लड़के की लाश निकालने की कोशिश कर रहे थे। बिशन दास का बेटा ऊपर जल रहा था और मुहम्मद की कुरान नीचे जल रही थी। ईश्वर का संविधान जल रहा था और हिंदू और मुसलमान मिलकर आग बुझा रहे थे। एक ही म्यान में दो तलवारें म्यान में थीं।
मुझे यह नज़ारा देखकर बहुत मज़ा आया। इतिहास में मुझे कहीं और इतनी अच्छी रुचि का प्रतिबिंब नहीं मिला था। हम एक नए इतिहास को जन्म दे रहे थे। मैं आगे चला गया। दस कदम दूर, सड़क के बीचो-बीच एक कमज़ोर, साठ साल का बूढ़ा मुँह खोले बैठा था। उसके मुँह और धड़ के किनारे से खून बह रहा था। उसकी खुली बेजान आँखें आसमान की ओर देख रही थीं। एक सिपाही लाठी लेकर उसकी जान की हिफ़ाज़त कर रहा था। सामने वाले चौराहे पर पाँच-छह सिपाही और एक सब-इंस्पेक्टर की सुरक्षा में तीस साल के एक नौजवान की लाश पड़ी थी। उसके पास एक छोटी थैली में थोड़ा आटा रखा था, जिसमें से कुछ अब ज़मीन पर गिर चुका था। हत्यारा भाग गया था, क्योंकि उसे जल्दी थी। वह भी शायद तीन-चार काफ़िरों को खत्म करके आराम करना चाहता था। उसने पुलिस का इंतज़ार भी नहीं किया, बल्कि चला गया। और एक सिपाही कह रहा था: ‘हमने इन लोगों से कितनी बार कहा है कि ख़तरनाक इलाकों से न गुज़रें, लेकिन क्या वे सुनते हैं?’
यह जोशीला और चमत्कारिक तूफ़ान अविश्वसनीय रूप से भयावह था। पता चला कि सैकड़ों अन्यायी सैनिकों और चीखते-चिल्लाते मुसलमानों से भरी कई ट्रकें आज लाहौर पहुँची थीं। अमृतसर के अधिकारियों ने मुस्लिम सैनिकों को रिहा कर दिया था क्योंकि अब उन्हें पाकिस्तान मिल गया था, और अधिकारियों के अनुसार सैनिक अब हिंदुओं की सेवा की गुलामी में नहीं रह सकते थे। उनके हथियार छीन लिए गए थे। और वे अपनी जान बचाकर लाहौर भाग गए थे। वे हर गली-मोहल्ले में फैल गए थे। और लाहौर की सड़कें अब बाढ़ से भर गई थीं। रक्त की बाढ़, आग का भण्डार।
अंधेरे भी भीड़ से डरावने होते हैं
काली-सफ़ेद दाढ़ी वाले मौलवी साहब ने कहा: ‘हे भगवान! क्या तुमने सुना? लाहौर में आज करीब एक सौ बीस हत्याएँ हुई हैं। यह शहर आज अपने विनाश की ओर बढ़ रहा है।’
आरिफ घबरा रहा था। उसे अब मेरी सुरक्षा की चिंता होने लगी थी। अचानक होटल बंद होने लगा। लोग उठकर भागने लगे। नारे लगाते हुए भीड़ सड़क से गुजर रही थी। एक ट्रक भी चीखता हुआ आ रहा था: ‘लाहौर में 12 बजे से फिर से कर्फ्यू लगा दिया गया है। नब्बे घंटे का कर्फ्यू।’ मैंने आरिफ से कहा: ‘इस बार कर्फ्यू के घंटों की संख्या बढ़ा दी गई है क्योंकि अपराधों की संख्या भी बढ़ गई है। अपराध और कर्फ्यू का कोई संबंध नहीं है। वह आटे की बोरी बेवजह मामले को उलझाने के लिए बीच में आ जाती है।’
रात होने को थी, मैं अनारकली की ओर चला गया। घर वापस जाकर फिर से कैद होने का ख़याल ही भारी पड़ गया। जब मैं मॉल स्क्वायर कॉफ़ी हाउस पहुँचा, तो कई महान भारतीय कवि और लेखक वहाँ से निकल रहे थे। उनका साहित्य या कला कर्फ़्यू से ज़्यादा शानदार नहीं था। इसीलिए वे बेचैन और परेशान हालत में अपने घरों की ओर भाग रहे थे: बारी, सलाहुद्दीन, यूसुफ़, मित्तल। अपने ख़ास अंदाज़ में मित्तल ने मुझसे कहा: ‘फ़िक्र, मेरे दोस्त, बताओ तुम भारत आओगे? मैं जा रहा हूँ।’
मैंने उसके सवाल का जवाब न देते हुए कहा “आओ फिर सुबह को ढूंढे” .
The Sixth River: A Journal from the Partition of India, translated in English by Maaz Bin Bilal from the original Chhatha Darya written in Urdu by Fikr Taunsvi. The English translation is published by Speaking Tiger Books.
There is something unreasonably seductive about the sound of an aircraft whizzing overhead. A distant hum becomes an unmusical reminder from the past followed by a roar and a streak of white piercing the blue sky which makes me leave everything and run to the terrace or the nearest balcony. By the time my eyes focus, the neck cranes at the object chasing its silvery reflective surface. Not voluntarily, but dictated by muscle memory the arm goes up waving at the machine and the gaze pierces through grayish-blue windows looking for the friend who was lucky enough to have taken a ride. Frantically, I wave and shout, hoping against hope, he will wave back (was it he or she?). I even fold my hands in reverence to the flying bird-machine. Me, the lesser mortal, waiting for that friend to wave back from the blind window. A pair of eyes glare at me from behind the door, a disappointed head shakes, banging the door, I hear her say – बचपना नहीं गया अभी तक Both, my hand and head go limp and I wonder कहाँ गया वो बचपन when I would run in the street chasing the aircraft till it disappeared in the horizon. My fingers twitch for some inexplicable reason and rush to seek something in the trouser pocket. The pocket is empty, the fingers retreat to form a V in the air and trigger an imaginary pebble in the air. Indeed I miss the बचपन and remember the Gulel (a slingshot) with which I would try and aim at the craft. Stop, wait and take me along.
दुःख हमे विरासत में मिलते हैं और सुख कभी विरली लाटरी लगने पर ज़िन्दगी के तिराहे पे। या फिर सुख के पल फिल्मों में देखे और किताबों में पढ़े जाते हैं। सुख एक फ़लसफ़ा है जिसके बारे में बात की जा सकती है जबकि दुख और दर्द सचाई है जो महसूस की जाती है, झेली जाती है।
आजकल मेरी मेज़ पे दर्द और दुखों का एक पुलंदा पसरा है जिसे हाथ में उठा सुबह शाम मैं सुबक लेता हूँ, रो लेता हूँ और हज़ारों लाखों परिवारों के साथ हुए शर्मनाक और दर्दनाक हादसों, क़त्लेआम, लूट-पाट, आगज़नी, फ़साद और तशद्दुद के बारे में सोच के भी काँप उठता हूँ। दो मुल्कों के जिन करोड़ों लोगों पे ये सब बीती उनमे से लाखों तो कुछ महीनों चली इस दरिंदगी और वहशत में मारे गए, कुछ जो मरे नहीं और जिन्होंने ये सब देखा वो सालों ज़िंदा रह कर भी रोज़ मरते रहे। जाने कितने सौ गुमनाम पागलख़ानों और अस्पतालों में सड़ते रहे और हज़ारों लोग उस ग़म के बोझ को ढ़ोते हुए बाकि बची ज़िन्दगी को ज़िंदा लाश सा काटते भर रहे।
दुखों के ये पुलंदा एक क़िताब है जिसका नाम है – “10,000 दुःखद यादें: बटवांरे की ज़िंदा तारीख़”
मैं नहीं कहूंगा कि आप ये किताब पढ़ें। रहने दें, मत पढ़ें। इसे पढ़ने पर आपको अपने उस वक़्त के समाज और सोहबत पे, अपने मुल्क पे, अपने बुज़ुर्गों पे, अपने आप के इंसान होने पर भी शर्म आएगी। पर अगर आप समाज के लिए तिनका भर भी अच्छा करना चाहते हैं तो अपने बच्चों को ये पढ़ कर सुनाएँ, सिर्फ इसलिए की वो हैवान ना बने।
इन दस हजार दर्दनक यादों के जहन्नुम में एक दुखद किस्सा मेरी माँ और उनके परिवार की यादों का भी है। इनमे कुछ तो ऐसे वाक़िये हैं जो वहशत की हद के भी पार जाते हैं जिन्हे पढ़ या सुन कर आपका दिल दहल जायेगा।
मैंने मंटो और इस्मत के सारे अफसाने पढ़े हैं, उनको पढ़ कर भी मैं रोया हूं, वो भी उसी वहशत और उसी वक्त को बयान करते हैं पर उनके किरदारों को मैंने सिर्फ समझा और महसूस किया था – पर इस किताब में मैंने उनके जैसा कई किरदारों की तसवीरें भी देखी हैं जो सचाई को और भी भयानक बना देती है ।
तारीख़ के इसी हिस्से को बयां करते कई पंजाबी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी अदीबों को मैंने पढ़ा है उनके किरदारों के दर्द से मैं वाकिफ हूं पर यहां इस क़िताब में उन लोगो को चेहरे मिल गया है, तसवीरों वाले ये लोग उस वक्त की गवाही देते हैं, मुझ से बात करते हैं, सामने आ खड़े होते हैं, जवाब मांगते हैं, जिरह करते हैं और मैं उनसे आंखें नहीं मिला पाता, बिलकुल वैसे ही जैसे मेरे वालिद बतलाते थे और मैं सुन्न पड़ जाता था।
क्यों संजोते हैं हम दुखों को, किसके लिए? क्यों इक्कठा करते हैं, क्यों लिखते हैं, क्यों कुरेदते हैं उन्हें सालों साल?
मैं नहीं समझता कि दुख बांटने से कम होते हैं या मन हल्का होता है। लिखे हुए दुख तो फैलते ही जाते हैं एक पीढ़ी से दूसरी से तीसरी, ख़त्म ही नहीं होते, भूलने ही नहीं देते आगे आने वाली नस्लों को भी। और फिर इन किताबों को इन यादों को पढ़ कर, समझ कर कौन सीखा है आज तक? इन से मिली सीख या शिक्षा से कहाँ कम होती हैं त्रासदियां। आज का समय ही देख लीजिये – कौन रोक पाया है ग़ाज़ा में हो रहा नरसंहार। और क्या सबूत चाहिए हमे – अकेली 20वीं शताब्दी में ही जंग से करीब 11 करोड़ लोग मारे जा चुके हैं।
दुखों और दर्दों का ये पुलंदा बहुत भारी है।
10,000 Memories: A Lived History of Partition (Independence and World War II in South Asia – Book 1 – West Side) Published 2023 by: The 1947 Partition Archive, Berkeley, California. Rs. 4100, pp 724
ये क़िताब अगस्त 1947 में हुए एक मुल्क के बटवारें के बारे में है, अपने घरों, अपनों और अपनी ज़मीन से बेदखल हुए लोगों की है जिन पर ख़ुद एक दूसरे ने ही ज़ुल्म किये। हिन्दुस्तान और पकिस्तान से मेरी पीढ़ी के कई लोगों ने अपने माँ-बाप, दादा-दादी, दोस्तों और करीबी रिश्तेदारों को उम्र भर भयानक यादों से जूझते देखा है। मैंने तो देखा है। ये क़िताब उन दर्दनाक यादों की है और उस बोझ की है जो विरासत में ये लोग हमारे लिए छोड़ गए हैं।
ऐसा माना जाता है कि अपने पूरे जीवन में आदमी दुःख अधिक झेलता है और उसकी खुशियों के दिन कम ही होते हैं। गूगल बाबा को खंगालने से भी ये नतीजा ही निकलता है। वो तो यहाँ तक बताते हैं कि पिछले दो हज़ार साल में लिखे गए साहित्य में दुखद कहानियां की तादाद कहीं ज़्यादा है। ट्रेजेडी या दुखद अंत तलाशना अधिक सम्मोहक होता है। फिल्मों में भी ख़ुशी की तुलना में अभी तक ट्रेजेडी ही ज़्यादा बिकती है। याद कीजिये दिलीप कुमार और मीणा कुमारी को।
हमारे धर्म ग्रंथों में भी तो कितने सारे दुख दर्शाए गए हैं। रामचरितमानस को ही ले लीजिये – श्रवण कुमार के माता पिता का दुःख, राजा दशरथ का दुःख, बनवास को जाते हुए राम की माता का दुःख, भाई भरत का दुःख, अयोध्या वासियों के दुःख, वनवास में राम, लक्ष्मण और सीता के कितने ही दुःख, स्वरूप नख का दुःख, सुग्रीव का दुःख, सीता हरण का दुख, लंका नरेश रावण और उसके भाईयों और बेटे के वध का दुख और फिर अंत में सीता को घर से निकाले जाने का दुख। ईसा मसीह के सूली पर चढ़ाये जाने का दुख, कर्बला की जंग में अली हसन की शहादत का दुख। कितने गिनोगे ?
इस क़िताब में सच्ची दास्तानें हैं, आप बीते और झेले ज़ुल्म और ग़म हैं। इतने दर्द हैं कि एक को पढ़ने के बाद लगता है दूसरा किसी और जनम, किसी और साल में पढ़ेंगे। आपने कभी कहीं सुना है कि एक माँ अपने नए जन्मे बेटे को अस्पताल में इस लिए छोड़ आयी क्यूंकि उसे पैदा करने वाली दाई दूसरे मज़हब की थी। अपने जीते जी कितने किस्से आपने सुने हैं जहाँ घर के एक बड़े ने अपने हाथों से अपने दो मंज़िला घर को आग लगा दी हो जिसमे उस वक़्त उसकी तीन बेटियों और माँ अंदर रही हों । लोहे की आँखें, पत्थर दिल और बेग़ैरत जिगरा हो तो आगे पढ़िए वार्ना यहाँ से वापिस लौट जाइये ।
नीचे लिखे कुछ हिस्से इस अंग्रेज़ी की किताब से हिंदी में अनुवादित किये गए हैं। इन सब को आप से साँझा करते अच्छा तो नहीं लग रहा पर ये सच्चाई मैं छुपा भी नहीं सकता। बहुत ही भयावह और दर्दनाक घटनायें, वारदातें, प्रसंग और वृत्तांत नहीं दे रहा हूँ। बस वो जिन से आपको इन दुःखद यादों और ट्रेजेडी का अंदाजा हो जायेगा।
किताब शरू होते ही पहले कुछ पन्नो में पाठक को ये सलाह दी गई है
पाठक को समझ और विवेक से सोचने की सलाह दी जाती है। इस पुस्तक की सामग्री कुछ पाठकों के लिए भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है। गवाहों की यादों में सांप्रदायिक हिंसा, आत्महत्या, अपहरण, ऑनर किलिंग, युद्ध, लैंगिक हिंसा, क़त्ल, मौत, माली नुकसान, दंगे, चोरी, धार्मिक समूहों के प्रति अपमानजनक भावनाएं और हिंसक घटनाओं के मनोवैज्ञानिक प्रभावों से निपटने पर संभावित रूप से परेशान करने वाली यादें शामिल हो सकती हैं। पाठक को विवेक से काम लेने की सलाह दी जाती है और 18 वर्ष से कम आयु के युवाओं के लिए माता-पिता के मार्गदर्शन का अनुरोध किया जाता है।
नीचे दिए गए लोगों के नाम, उनके घर गावँ या शहर के नाम सब सच्चे और असली हैं
बेअंत सिंह रावलपिंडी से मेरठ आए मेरा जन्म पुंछ कश्मीर में हुआ था। जब मेरा जन्म हुआ, तो कश्मीर में बहुत बर्फबारी हुई थी। इस वजह से, मेरे जन्म देने के बाद हम 15 दिनों तक अस्पताल में फंसे रहे। वहां मेरी देखभाल करने वाली महिला और मुझे खाना खिलाने वाली महिला मुस्लिम थीं। जब मेरी मां को उनके धर्म के बारे में पता चला, तो उन्होंने मुझे घर ले जाने से इनकार कर दिया और मुझे मुस्लिम महिला को सौंप दिया कि वह मुझे अपनी औलाद की तरह पालें। पहले पाँच सालों तक मैं अपने परिवार को नहीं जानता था। जब मेरे पिता की मौत हुई तो मेरी माँ ने रावलपिंडी वापस जाने का फैसला किया। इस समय मेरी देखभाल करने वाली और गोद ली हुई माँ ने मेरी असली माँ से मुझे वापस ले जाने के लिए कहा क्योंकि वो मेरी ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकती थी। ये पहली बार था जब मैं अपनी मां और भाई-बहनों से मिला था। हालाँकि मेरी माँ मुझे वापस ले जाने के लिए राज़ी हो गई थीं, लेकिन उसने कभी भी मेरे साथ मेरे दो भाइयों जैसा सलूक नहीं किया इसलिए 14 साल की उम्र में मैं हिन्दुस्तान चला आया।
न. क., (पूरा नाम नहीं बताया), ये शहीद भगत सिंह नगर जिले में रहती थीं जब हमारी माँ हमारे लिए दूध लाती थी, तो हमें डर होता था कि दूध में जहर है और हम ये सोचते थे कि इससे पहले कि भीड़ हमारा अपहरण और बलात्कार कर सके, हमारे पिता ने हमें मारने का फैसला किया था। जब मेरे पिता ने आस-पास के गाँवों से मुसलमानों को बाहर निकाल भगाया, तो हमारा सामूहिक भय समाप्त हो गया।
रोशन लाल, भरमौर, चम्बा से बटवारे की अफ़वाहों के चलते हिन्दू बिरादरी के लोगों ने दर फैलाया और इसे मौका बना कर मुस्लमान लोगों को इस इलाके से निकाल दिया।
खान हुसैन ज़िआ, जालंधर से लाहौर गए क़त्ले आम, रिफ़्यूजी लोगों की परेशानियों और बटंवारे के बीच लाहौर में तेज़ बाढ़ आ गई। वहां दो लोगों की ड्यूटी ये लगाई गई की लुटे हुए सामान को कैसे बाटना है।
देवराज सिक्का, जमपुर पाकिस्तान से लुधिअना आये अक्टूबर के महीने में, महात्मा गांधी ने पाकिस्तान से आये हुए शरणार्थियों से शहर के मुस्लिम निवासियों को बेदखल ना करने का आग्रह करने के लिए पतिपन का दौरा किया। फिर भी कुछ दिनों बाद शरणार्थियों ने मुसलमानों को जबरन बाहर निकाल दिया। मुझे खेद है कि हमें खाना पकाने के ईंधन के लिए कई घरेलू पुस्तकालयों में कुछ ऐतिहासिक पांडुलिपियों को जलाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
कृष्ण दोनों तरफ अपने ही लोग थे, दोनों क़ौमों मिल जुल के रहती थीं, दोनों मज़हब के लोगों भी मुहल्लों में इकठा ही रहते थे, हैरत है फिर भी ये सब हुआ। आख़िरकार जब हम पटियाला आ गए, तो बच्चा होते हुए भी मैंने मज़दूरी की था और एक साल तक स्कूल नहीं गया। मैं अलग-अलग गांवों से अंडे इकट्ठा करता और लोगों को घर घर जा के बेचेता था।
अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला के पिता बनारसी लाल चावला शेखपुरा, लाहौर से करनाल आये लोग अपना सामान ट्रेन में चढ़ाने लगे। पर उनके चढ़ने से पहले ही ट्रेन उनका सामान लेकर रवाना हो गई। वहाँ एक खाली मस्जिद थी जहाँ हम लगभग नौ साल तक रहे। मैंने टॉफियाँ बेचकर कुछ पैसे कमाए उस से ज़्यादा कमाई नहीं होती थी। आख़िरकार मैंने मस्जिद में रहते हुए शादी कर ली और मेरी पत्नी की तीन बेटियाँ और एक बेटा था। हमारी सबसे छोटी कल्पना थी।
मिल्खा सिंह, (नामवर धावक) बस्ती बुखारी, कोट अड्डू मुज़फ़्फ़रगढ़ से दिल्ली आये मैंने अपने पिता को बहादुरी से लड़ते हुए देखा और मुझे उन पर तलवार से हमला होते देखना याद है। जब वह घायल हो कर गिर गए, तो वह चिल्लाये, “भाग मिल्खा, भाग”, ये कहते हुए हुए कि मैं अपनी हिफाज़त के लिए भाग जाऊं।
1947 का विभाजन अधिक जटिल था क्योंकि दोनों पक्ष पीड़ित भी थे और अपराधी भी। वर्ल्ड वॉर 2 वाले यहूदियों के प्रलय में एक तरफ के लोग, जर्मन, अपराधी थे और दुसरे शिकार ग्रस्त या पीड़ित थे। उसे हिंसा को समझना आसान था क्योंकि आघात को एक तरफ और अपराध को दूसरी तरफ जिम्मेदार ठहराया जा सकता था। – अनिरुद्ध काला ,1947 में पैदा हुए
शेर सिंह कुक्कल (सिख), बफ़ा, खैबर पख्तूनख्वा से गोरखपुर आये सन 1947 में कई लोगों ने धर्म और पहचान बदलना शुरू कर दिया था । 10 अगस्त से पहले, एक रात धमकी देने वाली मुनादी हुई और हमारे मुस्लिम दोस्तों ने हमें अचानक होने वाले हमले की चेतावनी दी। उन्होंने एक ट्रक मंगवा कर हमें महफूज़ जगह पर ले जाने का इंतज़ाम किया।
इकबाल बीबी, क्वेटा, बलूचिस्तान से होशियारपुर, पंजाब आयीं मुझे अपनी इज़्ज़त और अपनी जान का डर था। मैंने खुद को कीचड़ और गंदगी में छिपा लिया ताकि मैं उन के लिए बदसूरत दिखूं और वो मुझ पर ध्यान ही न दें। दंगाई ख़ासतौर पे रिफ़्यूजी कैम्पों में रहने वाली और अच्छी दिखने वाली औरतों को अगुवा कर उनका बलात्कार कर रहे थे।
अवतार कौर ढिल्लों मुज़फ्फराबाद कश्मीर से जम्मू आयीं मुझे सब साफ़ साफ़ याद है। हमारा परिवार भागने के दौरान अपना कोई भी सामान नहीं ले जा सका, इसके बजाय बुजुर्गों ने हमारे घर में आग लगा दी और हमारे पास जो कुछ भी था उसे जला दिया। मुझे याद है कि बड़ी उम्र के लोगों ने अपने बच्चों की प्यास बुझाने के लिए गीली मिट्टी को कपड़े की थैलियों में रख उसमे से निचोड़कर पानी निकाला । हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं था। मेरी दो बहनों की पुंछ में मौत हो गई। कई लोग भूख से मर गए और बच्चे दूध की कमी से मर गए।
सुचवंत सिंह, कोटली मुज़फ़्फ़रबस्द कश्मीर से श्रीनगर कश्मीर अपने घर से निकल जब हम अगले गाँव पहुँचे, तो हमने फिर से अपनी माँ और भाई-बहनों के बारे में पूछा। वहां के लोगों ने मेरी दादी को बताया कि उनके परिवार के एक सदस्य ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए मेरी मां और बहन को मार डाला है। मेरी चचेरी बहनें जिनका अपहरण कर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया था, वे सीमा के दूसरी ओर आज तक रहती हैं।
मोहम्मद इक़बाल, भारेवाल, सियालकोट से (बचपन का नाम – मदन ) हिंसा के दौरान मेरे दादाजी को उनके गन्ने के खेत में घात लगाकर मार दिया गया । उनकी हत्या के बाद, मेरे परिवार ने इस्लाम धर्म अपना लिया और हमने मेरे दादाजी को गांव में ही दफना दिया। मेरी आखिरी इच्छा है कि समय के खिलाफ दौड़ हारने से पहले मैं अपनी बहन महिंदर जी से आखिरी बार मिलूं। बटवारें के दौरान मुझे बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा – सबसे बड़ी कठिनाई मेरे माता-पिता और भाइयों से अलग होना थी। जब मैं अकेला होता था तो रोता था।
नूर दीन के पुत्र लालदीन सिंह, जिनका परिवार तंगोरी, चंडीगढ़ से पस्सु पाकिस्तान गया जब परिवारों को छुपते हुए या दुश्मन से बचते हुए रिफ़्यूजी कैंप में जाना पड़ता था, या सरहद को पार करना होता था, तो कुछ डरपोक लोग अपने बच्चों को पीछे छोड़ देते थे, क्योंकि बच्चे अक्सर शोर मचाते थे, जिससे भागने वाले पकडे जा सकते थे या उस से पूरे परिवार मारा जा सकता था।
विलायत खान, (गायक) गोस्लान पिंड, लुधियाना से पाकिस्तान में सर्गे चले गए सदमा इतना था कि वहां पहुँचने के बाद मैं गाना भूल गया, इनमे वो गीतों और कविता भी शामिल थे जो मैं बटवांरे से पहले बचपन से गाता था। वहां मेरी कला की सराहना करने वाला भी कोई नहीं था। रोटी कमाने और ज़िंदा रहने के लिए, मैंने भेस बदल कर लकड़ी काटने जैसे छोटे-मोटे काम किए। हिन्दुस्तान में गोस्लान वापिस लौटने के बाद मेरा संगीत मेरे पास वापस आ गया। तब से, मैंने गाना जारी रखा है और मैंने ढद्दी संगीत के लिए यहाँ पहचान बनाई । संगीत नाटक अकादमी ने मुझे 2009 में पुरस्कार से सम्मानित भी किया।
एम. के. (पूरा नाम नहीं बताया), जिला नारनौल हमने गांव के लंबरदार की बंदूक चुरा ली और अपने गांव में कीकर के पेड़ पर चढ़ गए। पहले दो लोग जो हमारे पास से गुजरे हमने उन्हें गोली मार दी । यह कोई जंग नहीं थी – यह नारोवाल में कर्बला था
रोमिला थापर जो बटवारे के समय पूना में रहती थीं आज़ादी की लड़ाई ने प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रति जुनून पैदा कर दिया था क्योंकि कई लोग इस सवाल से जूझ रहे थे कि हम कहां से आए हैं और भारतीय होने का क्या मतलब है। जबकि हमें यह पूछना चाहिए था कि एक स्वतंत्र राष्ट्र होने का क्या मतलब है।
10,000 मेमोरीज़: इस पहली किताब में 1,000 से ज़्यादा तस्वीरें हैं और हर पन्ने पर लोगों से हुई मार्मिक बातों के कुछ हिस्से हैं जो पढ़ने वालों के लिए उस समय के इतिहास को सामने लाती हैं। प्रकाशक इस श्रृंखला में 50 और किताबें निकालेंगे।
प्रकाशक ने अपने नोट में लिखा है कि “10,000 मेमोरीज़ कई वर्षों की कड़ी मेहनत का परिणाम है जिसमें अखिल-दक्षिण एशिया स्तर पर भारतीय उपमहाद्वीप में सैकड़ों मौखिक इतिहासकारों द्वारा लिए गए साक्षात्कार शामिल हैं। सरकारी रिकॉर्ड और अन्य समकालीन स्रोतों के आधार पर विभाजन के विशिष्ट इतिहास के विपरीत, यह उपन्यास अध्ययन उन जीवित मानव अभिनेताओं के जीवित इतिहास के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो व्यापक सामाजिक संदर्भ में भू-राजनीतिक महत्व की उस अविस्मरणीय घटना के कारण पीड़ित हुए थे। द्वितीय विश्व युद्ध के भूले हुए चीन-बर्मा-भारत रंगमंच का आर्थिक परिदृश्य। सिंह भल्ला और उनकी टीम ने एक उत्कृष्ट दृश्य इतिहास प्रदान करके अत्यंत कठिन काम किया है… इसे पढ़ना आनंददायक है, और यह निश्चित है कि यह विभाजन का एक उत्कृष्ट अध्ययन बन जाएगा।”
राजिंदर अरोरा, 20 दिसंबर 2024
The BookAn interview with one of the displaced personThe renowned Olympian athlete Mr Milkha Singh having his interview recorded A map showing location of displaced families
Father died at home, in his house looking himself in the mirror; guiding the razor upside-down on his thin face, pulling wrinkled skin over shrunken cheekbones, making faces while shaving; grinning, upsetting, teasing, and taunting the mirror, Just then a heart-attack took him in minutes; And the Mirror captured his soul.
The Mirror was fixed on the wall facing the kitchen, where mother worked. She kept her distance from the mirror, feeling sad and scared of looking in it – finally, covering it with a towel that father used.
Father owned the house where he died. ‘Krishna Kutir’, the house was named after my mother, who sold it ten years later and passed the money to his heirs.
No Father, No House. No Mirror. All gone. A lot more went with it, my innocence, my youth. We all grew up in it – a sister, two brothers, mother, father – and the house itself, which had come by chance, really. Father had no money to buy it. He would say. ‘I was lucky’. Yes, he was. Indeed, lucky for an orphan and a refugee to own a house in the capital.
For sure, those days he was lucky, and happy too, having got a raise in salary. He also won two lotteries in six months. First, a ‘lucky draw’ where his name was picked and a small flat allotted to him for small money. Second, a ‘cash prize’ for writing a slogan for a cigarette brand of the working class. He used the money to part-pay the flat. Would you believe, there was a time when one was rewarded to smoke! Very Lucky!
Like his income, the house too was low income. LIG Flat they called it. Dad was proud, ‘I made it like a bee,’ he once told me looking into the mirror. He saved for it, every paisa he could like a bee secreting to make a hive – cutting on his smokes, eats, and bus fare; cycling to work eight miles one way.
Mother sold the house as it had her name. The mirror went with the house. Outside the house, there was a name plate faded, nailed to the wall, having survived forty years of elements, envy, and evil-eye.
When Ma moved, father stayed behind in his house. He didn’t move, he couldn’t. His soul had been seized by the Mirror.
Not everything died with father, a lot survived. His dreams, his books, his letters, his diaries and the Mirror on the soiled verandah wall from which his face followed us everywhere.
Ma brought all she could, tears & trauma in tow and the fading nameplate, ‘Krishna Kutir’. I, for one, couldn’t unhook the Mirror Father held it tight.
You must be logged in to post a comment.