Frida came calling

Goddess appears in God’s own country

Yes, I met Frida. My dear Frida Kahlo. This time not in a dream but on a street. A vibrant street, as colourful as Frida’s works and her life. It wasn’t strange, I knew I will bump into her, she had mentioned it to me. Yes, you guys must believe me when I tell you something. She comes in my dreams. Yes, comes as in visits me, sits with me (sometime even lies down next to me), talks to me and often, even cuts a joke. Seriously, there is no need for you to doubt it. We do chat. Of her works, her poetry, her random thoughts, her bandaged body, the broken bones under her bodice and her unbreakable spirit. 

This time we were face to face. I was a bit taken aback. Normally she informs me. Like the week before, she told me she would be visiting me, physically, in my day-dream, and you bet she did. She came while we were having lunch. Came and pulled a chair next to me, almost touching my left elbow, sipped from my glass, had half of the gobhi paratha with a chunk of white butter. Wishing me Merry Christmas, she turned and left without even saying a Hi to anyone else. Before she left she stopped by the alcove and spent time admiring the Kalighat painting I recently acquired. It is a work by Kalam Patua. In the artwork a man is holding his beloved in his arms, her right leg on his left thigh. Turning around Frida gave a questioning glance. ‘When?’ She asked, raising her left eyebrow. Oh Jesus, how much I love her eyes, her lashes, her eyebrows and the tiny pearly stud she pins on her brow, God knows how!

Never mind the eyes and the stud – she is hypnotic all over. Finding her here, of all the places in the world, that late at night I was a bit scared. At times she scares me, specially when I am with someone, you see she is very possessive, (of me, of course). To see her here in Kochi, where I am on a holiday with my dear wife was a bit surprising. For the Goddess herself, to appear in God’s own country without notice was a little uneasy. 

Both of us drunk, and well-fed on beef curry, walking the dark street past the graffiti wall announcing Kochi Art Biennale. Under a lamp-post, a cigarrillo clutched in her fingers, Frida looked straight in my eyes, unblinking. Yes, thats where she stood, under a lamp-post, a sentinel tracking me. The flowers in her hair, I concluded, she must have picked up from the local woman selling toddy at the other end of the street. I am sure she also had a glass or two of toddy, the glaze still there in her eyes. The chandeliers dangling in her ears reminded me of the silver market of Jaipur where we met last. Her gaze and her silence sending shockwaves of love through the inebriated town where the ocean doesn’t let anyone sleep. Glad that I had opened my arms and that elusive smile had come back on my saline-puffed cheeks. Without another second of delay I gave her a big warm hug. ‘I need one too’, I told her. We stood there like pillars of unrequited love, fulfilled.

I don’t think she kissed me for when I looked at her face, her lips were wet but closed, maybe it was her gloss. My partner was nowhere near. Caressing her left cheek as I unlocked the hug I felt she tapped my right shoulder. A fleeting glimpse of something red felt it to be her Mexican silk stole. Looking at my moist eyes Frida was about to repeat vows of our eternal love when a red fez, the Turkish cap, came in view. A liveried young man stood there pointing his left arm to something behind me, “Madam Sir over there. Huggies and kissies, there sir, the bar closed sir.” He pleaded, “Please move, Sir. We to shut the gate, move from pillar, Sir.”

Next to me, Rajni smiled at Frida but didn’t say hello. Looking at me both of them smiled and whispered, ‘the world is watching love’. 

‘Another time, Frida.’

Frida Kahlo portrait on a gate pillar in Kochi, Kerala. December 2023

Sun God and Mother Earth

A new artwork that we recently acquired is titled “Sun God and Mother Earth”. It is done by eminent Gond tribal artist Mr Veerendra Kumar Dhurvey, based in Bhopal, Madhya Pradesh. The story behind the artwork is mentioned below as given by the artist. The details are: Acrylic paints on canvas, 2024. Size 36 x 48 inch.

There was only water in this world, there was no earth, at that time Mother of the world is sitting on a lotus, on her the form of a deer has been given, Mother Earth is Mother Earth, on which Gond farmers are plowing and tribal villages are celebrating the festival of greenery. Women and men are dancing and celebrating festivals.
And there is a man on the tail of a deer, he is plowing, he is sowing seeds there and there is the Sun God who is coming on his chariot with seven horses and the trees are the whole world. Just as the whole world looks beautiful in the light of the Sun God, I have given the form of the world on my body on the basis of that.

​​पृथ्वी नहीं इस संसार में जल ही जल था वह समय जगत जननी मा कमल पे बैठी है उसके ऊपर हिरण का रूप जो दिया है माता पृथ्वी धरती मां है जिसके ऊपर गोंड किसान हल चल रहा है और हरियाली के त्यौहार मनाते हुए आदिवासी गांव ​की महिलाएं और पुरुष नाचते और त्यौहार मना रहे हैं। और जो ये हिरण की पूंछ पर एक आदमी है ​वह हल चल रहा है वहां पर वे बीज डालते जा रहे हैं और सूर्य देवता हैं जो अपने सात घोड़ों वाले रथ पर चले आ रहे हैं और पेड़ जो हैं वो सारा संसार ​हैं। ​जैसे सारा संसार सुंदर लगता है सूर्य देवता के प्रकाश में उसके आधार पर ही संसार का रूप ही मैं देह पर दिया हूं।

​Prithvi nahin is sansar mein jal hi jal tha use samay Ma Jagat-Janani hai jo Kamal per baithi Hain uske upar Hiran ka roop Jo Diya hun Mata Prithvi Dharti Ma hai jiske upar Gond Kisan hal chala raha hai aur hariyali ke tyohar manate hue aadivasi gond mahilayen aur purush naachte aur tyohar Mana rahe hain aur jo yah Hiran ke Poonch per ek aadami hai Kisan hal chala raha hai vahan per vah bij dalte ja raha hai aur Surya Devta Hain Jo Apne sath ghode Wale Rath per chal rahe hain aur ped jo hai vah sansar hai Jaise Sara sansar Sundar lagta hai Surya ke Prakash mein uske Aadhar per hi sansar ka roop main is ped per Diya hun

Prithvi Nahi Jal hi Jal Tha. Veerendra Kumar Dhurvey

विरासत में मिले दुःख

दुःख हमे विरासत में मिलते हैं और सुख कभी विरली लाटरी लगने पर ज़िन्दगी के तिराहे पे। या फिर सुख के पल फिल्मों में देखे और किताबों में पढ़े जाते हैं। सुख एक फ़लसफ़ा है जिसके बारे में बात की जा सकती है जबकि दुख और दर्द सचाई है जो महसूस की जाती है, झेली जाती है।

आजकल मेरी मेज़ पे दर्द और दुखों का एक पुलंदा पसरा है जिसे हाथ में उठा सुबह शाम मैं सुबक लेता हूँ, रो लेता हूँ और हज़ारों लाखों परिवारों के साथ हुए शर्मनाक और दर्दनाक हादसों, क़त्लेआम, लूट-पाट, आगज़नी, फ़साद और तशद्दुद के बारे में सोच के भी काँप उठता हूँ। दो मुल्कों के जिन करोड़ों लोगों पे ये सब बीती उनमे से लाखों तो कुछ महीनों चली इस दरिंदगी और वहशत में मारे गए, कुछ जो मरे नहीं और जिन्होंने ये सब देखा वो सालों ज़िंदा रह कर भी रोज़ मरते रहे। जाने कितने सौ गुमनाम पागलख़ानों और अस्पतालों में सड़ते रहे और हज़ारों लोग उस ग़म के बोझ को ढ़ोते हुए बाकि बची ज़िन्दगी को ज़िंदा लाश सा काटते भर रहे।

दुखों के ये  पुलंदा एक क़िताब है जिसका नाम है – “10,000 दुःखद यादें: बटवांरे की ज़िंदा तारीख़”

मैं नहीं कहूंगा कि आप ये किताब पढ़ें। रहने दें, मत पढ़ें। इसे पढ़ने पर आपको अपने उस वक़्त के समाज और सोहबत पे, अपने मुल्क पे, अपने बुज़ुर्गों पे, अपने आप के इंसान होने पर भी शर्म आएगी। पर अगर आप समाज के लिए तिनका भर भी अच्छा करना चाहते हैं तो अपने बच्चों को ये पढ़ कर सुनाएँ, सिर्फ इसलिए की वो हैवान ना बने।

इन दस हजार दर्दनक यादों के जहन्नुम में एक दुखद किस्सा मेरी माँ और उनके परिवार की यादों का भी है। इनमे कुछ तो ऐसे वाक़िये हैं जो वहशत की हद के भी पार जाते हैं जिन्हे पढ़ या सुन कर आपका दिल दहल जायेगा।

​मैंने मंटो और इस्मत के सारे अफसाने पढ़े हैं, उनको पढ़ कर भी मैं रोया हूं, वो भी उसी वहशत और उसी वक्त को बयान करते हैं पर उनके किरदारों को मैंने सिर्फ समझा और महसूस किया था – पर इस किताब में मैंने उनके जैसा कई किरदारों की तसवीरें भी देखी हैं जो सचाई को और भी भयानक बना देती है​ ।

तारीख़ के इसी हिस्से को बयां करते कई पंजाबी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी अदीबों को मैंने पढ़ा है उनके किरदारों के दर्द से मैं वाकिफ हूं पर यहां इस क़िताब में उन लोगो को चेहरे मिल गया है, तसवीरों वाले ये लोग उस वक्त की गवाही देते हैं, मुझ से बात करते हैं, सामने आ खड़े होते हैं, जवाब मांगते हैं, जिरह करते हैं और मैं उनसे आंखें नहीं मिला पाता, बिलकुल वैसे ही जैसे मेरे वालिद बतलाते थे और मैं सुन्न पड़ जाता था।

क्यों संजोते हैं हम दुखों को, किसके लिए? क्यों इक्कठा करते हैं, क्यों लिखते हैं, क्यों कुरेदते हैं उन्हें सालों साल?

मैं नहीं समझता कि दुख बांटने से कम होते हैं या मन हल्का होता है। लिखे हुए दुख तो फैलते ही जाते हैं एक पीढ़ी से दूसरी से तीसरी, ख़त्म ही नहीं होते, भूलने ही नहीं देते आगे आने वाली नस्लों को भी। और फिर इन किताबों को इन यादों को पढ़ कर, समझ कर कौन सीखा है आज तक? इन से मिली सीख या शिक्षा से कहाँ कम होती हैं त्रासदियां। आज का समय ही देख लीजिये – कौन रोक पाया है ग़ाज़ा में हो रहा नरसंहार। और क्या सबूत चाहिए हमे – अकेली  20वीं शताब्दी में ही जंग से करीब 11 करोड़ लोग मारे जा चुके हैं। 

दुखों और दर्दों का ये पुलंदा  बहुत भारी है।

10,000 Memories: A Lived History of Partition
(Independence and World War II in South Asia – Book 1 – West Side)
Published 2023 by: The 1947 Partition Archive, Berkeley, California. Rs. 4100, pp 724

ये क़िताब अगस्त 1947 में हुए एक मुल्क के बटवारें के बारे में है, अपने घरों, अपनों और अपनी ज़मीन से बेदखल हुए लोगों की है जिन पर ख़ुद एक दूसरे ने ही ज़ुल्म किये। हिन्दुस्तान और पकिस्तान से मेरी पीढ़ी के कई लोगों ने अपने माँ-बाप, दादा-दादी, दोस्तों और करीबी रिश्तेदारों को उम्र भर भयानक यादों से जूझते देखा है। मैंने तो देखा है। ये क़िताब उन दर्दनाक यादों की है और उस बोझ की है जो विरासत में ये लोग हमारे लिए छोड़ गए हैं।

ऐसा माना जाता है कि अपने पूरे जीवन में आदमी दुःख अधिक झेलता है और उसकी खुशियों के दिन कम ही होते हैं।  गूगल बाबा को खंगालने से भी ये नतीजा ही निकलता है। वो तो यहाँ तक बताते हैं कि पिछले दो हज़ार साल में लिखे गए साहित्य में दुखद कहानियां की तादाद कहीं ज़्यादा है। ट्रेजेडी या दुखद अंत तलाशना अधिक सम्मोहक होता है। फिल्मों में भी ख़ुशी की तुलना में अभी तक ट्रेजेडी ही ज़्यादा बिकती है। याद कीजिये दिलीप कुमार और मीणा कुमारी को।

हमारे धर्म ग्रंथों में भी तो ​कितने सारे दुख दर्शाए गए हैं। रामचरितमानस को ही ले लीजिये – श्रवण कुमार के माता पिता का दुःख, राजा दशरथ का दुःख, बनवास को जाते हुए राम की माता का दुःख, भाई भरत का दुःख, अयोध्या वासियों के दुःख, वनवास में राम, लक्ष्मण और सीता के कितने ही दुःख, स्वरूप नख का दुःख, सुग्रीव का दुःख, सीता हरण का दुख, लंका नरेश रावण और उसके भाईयों और बेटे के वध का दुख और फिर अंत में सीता को घर से निकाले जाने का दुख। ईसा मसीह के सूली पर चढ़ाये जाने का दुख, कर्बला की जंग में अली हसन की शहादत का दुख। कितने गिनोगे ?

इस क़िताब में सच्ची दास्तानें हैं, आप बीते और झेले ज़ुल्म और ग़म हैं। इतने दर्द हैं कि एक को पढ़ने के बाद लगता है दूसरा किसी और जनम, किसी और साल में पढ़ेंगे। आपने कभी कहीं सुना है कि एक माँ अपने नए जन्मे बेटे को अस्पताल में इस लिए छोड़ आयी क्यूंकि उसे पैदा करने वाली दाई दूसरे मज़हब की थी। अपने जीते जी कितने किस्से आपने सुने हैं जहाँ घर के एक बड़े ने अपने हाथों से अपने दो मंज़िला घर को आग लगा दी हो जिसमे उस वक़्त उसकी तीन बेटियों और माँ अंदर रही हों । लोहे की आँखें, पत्थर दिल और बेग़ैरत जिगरा हो तो आगे पढ़िए वार्ना यहाँ से वापिस लौट जाइये ।

नीचे लिखे कुछ हिस्से इस अंग्रेज़ी की किताब से हिंदी में अनुवादित किये गए हैं। इन सब को आप से साँझा करते अच्छा तो नहीं लग रहा पर ये सच्चाई मैं छुपा भी नहीं सकता। बहुत ही भयावह और दर्दनाक घटनायें,  वारदातें, प्रसंग और वृत्तांत नहीं दे रहा हूँ।  बस वो जिन से आपको इन दुःखद यादों और  ट्रेजेडी का अंदाजा हो जायेगा।

किताब शरू होते ही पहले कुछ पन्नो में पाठक को ये सलाह दी गई है

पाठक को समझ और विवेक से सोचने की सलाह दी जाती है। इस पुस्तक की सामग्री कुछ पाठकों के लिए भावनात्मक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है। गवाहों की यादों में सांप्रदायिक हिंसा, आत्महत्या, अपहरण, ऑनर किलिंग, युद्ध, लैंगिक हिंसा, क़त्ल, मौत, माली नुकसान, दंगे, चोरी, धार्मिक समूहों के प्रति अपमानजनक भावनाएं और हिंसक घटनाओं के मनोवैज्ञानिक प्रभावों से निपटने पर संभावित रूप से परेशान करने वाली यादें शामिल हो सकती हैं। पाठक को विवेक से काम लेने की सलाह दी जाती है और 18 वर्ष से कम आयु के युवाओं के लिए माता-पिता के मार्गदर्शन का अनुरोध किया जाता है।

नीचे दिए गए लोगों के नाम, उनके घर गावँ या शहर के नाम सब सच्चे और असली हैं 

बेअंत सिंह रावलपिंडी से मेरठ आए
मेरा जन्म पुंछ कश्मीर में हुआ था। जब मेरा जन्म हुआ, तो कश्मीर में बहुत बर्फबारी हुई थी। इस वजह से, मेरे जन्म देने के बाद हम 15 दिनों तक अस्पताल में फंसे रहे। वहां मेरी देखभाल करने वाली महिला और मुझे खाना खिलाने वाली महिला मुस्लिम थीं। जब मेरी मां को उनके धर्म के बारे में पता चला, तो उन्होंने मुझे घर ले जाने से इनकार कर दिया और मुझे मुस्लिम महिला को सौंप दिया कि वह मुझे अपनी औलाद की तरह पालें। पहले पाँच सालों तक मैं अपने परिवार को नहीं जानता था। जब मेरे पिता की मौत हुई तो मेरी माँ ने रावलपिंडी वापस जाने का फैसला किया। इस समय मेरी देखभाल करने वाली और गोद ली हुई माँ ने मेरी असली माँ से मुझे वापस ले जाने के लिए कहा क्योंकि वो मेरी ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकती थी। ये पहली बार था जब मैं अपनी मां और भाई-बहनों से मिला था। हालाँकि मेरी माँ मुझे वापस ले जाने के लिए राज़ी हो गई थीं, लेकिन उसने कभी भी मेरे साथ मेरे दो भाइयों जैसा सलूक नहीं किया इसलिए 14 साल की उम्र में मैं हिन्दुस्तान चला आया।

न. क., (पूरा नाम नहीं बताया), ये शहीद भगत सिंह नगर जिले में रहती थीं   
जब हमारी माँ हमारे लिए दूध लाती थी, तो हमें डर होता था कि दूध में जहर है और हम ये सोचते थे कि इससे पहले कि भीड़ हमारा अपहरण और बलात्कार कर सके, हमारे पिता ने हमें मारने का फैसला किया था। जब मेरे पिता ने आस-पास के गाँवों से मुसलमानों को बाहर निकाल भगाया, तो हमारा सामूहिक भय समाप्त हो गया।

रोशन लाल, भरमौर, चम्बा से
बटवारे की अफ़वाहों के चलते हिन्दू बिरादरी के लोगों ने दर फैलाया और इसे  मौका बना कर मुस्लमान लोगों को इस इलाके से निकाल दिया।

खान हुसैन ज़िआ, जालंधर से लाहौर गए
क़त्ले आम, रिफ़्यूजी लोगों की परेशानियों और बटंवारे के बीच लाहौर में तेज़ बाढ़ आ गई। वहां दो लोगों की ड्यूटी ये लगाई गई की लुटे हुए सामान को कैसे बाटना है।

​देवराज सिक्का, जमपुर पाकिस्तान से लुधिअना आये
अक्टूबर के महीने में, महात्मा गांधी ने पाकिस्तान से आये हुए शरणार्थियों से शहर के मुस्लिम निवासियों को बेदखल ना करने का आग्रह करने के लिए पतिपन का दौरा किया। फिर भी कुछ दिनों बाद शरणार्थियों ने मुसलमानों को जबरन बाहर ​निकाल दिया। मुझे खेद है कि हमें खाना पकाने के ईंधन के लिए कई घरेलू पुस्तकालयों में कुछ ऐतिहासिक पांडुलिपियों को जलाने के लिए मजबूर होना पड़ा।​

कृष्ण
दोनों तरफ अपने ही लोग थे, दोनों क़ौमों मिल जुल के रहती थीं, दोनों मज़हब के लोगों भी मुहल्लों में इकठा ही रहते थे, हैरत है फिर भी ये सब हुआ। आख़िरकार जब हम पटियाला आ गए, तो बच्चा होते हुए भी मैंने मज़दूरी की था और एक साल तक स्कूल नहीं गया। मैं अलग-अलग गांवों से अंडे इकट्ठा करता और लोगों को घर घर जा के बेचेता था।

अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला के पिता बनारसी लाल चावला शेखपुरा, लाहौर से करनाल आये
लोग अपना सामान ट्रेन में चढ़ाने लगे। पर उनके चढ़ने से पहले ही ट्रेन उनका सामान लेकर रवाना हो गई।  वहाँ एक खाली मस्जिद थी जहाँ हम लगभग नौ साल तक रहे। मैंने टॉफियाँ बेचकर कुछ पैसे कमाए उस से ज़्यादा कमाई नहीं होती थी। आख़िरकार मैंने मस्जिद में रहते हुए शादी कर ली और मेरी पत्नी की तीन बेटियाँ और एक बेटा था। हमारी सबसे छोटी कल्पना थी।

मिल्खा सिंह, (नामवर धावक)  बस्ती बुखारी, कोट अड्डू मुज़फ़्फ़रगढ़ से दिल्ली आये
मैंने अपने पिता को बहादुरी से लड़ते हुए देखा और मुझे उन पर तलवार से हमला होते देखना याद है। जब वह घायल हो कर गिर गए, तो वह चिल्लाये, “भाग मिल्खा, भाग”, ये कहते हुए हुए कि मैं अपनी हिफाज़त के लिए भाग जाऊं।

1947 का विभाजन अधिक जटिल था क्योंकि दोनों पक्ष पीड़ित भी थे और अपराधी भी। वर्ल्ड वॉर 2 वाले यहूदियों के प्रलय में एक तरफ के लोग, जर्मन, अपराधी थे और दुसरे शिकार ग्रस्त या पीड़ित थे। उसे हिंसा को समझना आसान था क्योंकि आघात को एक तरफ और अपराध को दूसरी तरफ जिम्मेदार ठहराया जा सकता था।  – अनिरुद्ध काला ,1947 में पैदा हुए

शेर सिंह कुक्कल (सिख), बफ़ा, खैबर पख्तूनख्वा से गोरखपुर आये
सन 1947 में कई लोगों ने धर्म और पहचान बदलना शुरू कर दिया था । 10 अगस्त से पहले, एक रात धमकी देने वाली मुनादी हुई और हमारे मुस्लिम दोस्तों ने हमें अचानक होने वाले हमले की चेतावनी दी। उन्होंने एक ट्रक मंगवा कर हमें महफूज़ जगह पर ले जाने का इंतज़ाम किया।

इकबाल बीबी, क्वेटा, बलूचिस्तान से होशियारपुर, पंजाब  आयीं
मुझे अपनी इज़्ज़त और अपनी जान का डर था। मैंने खुद को कीचड़ और गंदगी में छिपा लिया ताकि मैं उन के लिए बदसूरत दिखूं और वो मुझ पर ध्यान ही न दें। दंगाई  ख़ासतौर पे रिफ़्यूजी कैम्पों में रहने वाली और अच्छी दिखने वाली औरतों को अगुवा कर उनका बलात्कार कर रहे थे।

अवतार कौर ढिल्लों मुज़फ्फराबाद कश्मीर से जम्मू आयीं
मुझे सब साफ़ साफ़ याद है।  हमारा परिवार भागने के दौरान अपना कोई भी सामान नहीं ले जा सका, इसके बजाय बुजुर्गों ने हमारे घर में आग लगा दी और हमारे पास जो कुछ भी था उसे जला दिया। मुझे याद है कि बड़ी उम्र के लोगों ने अपने बच्चों की प्यास बुझाने के लिए गीली मिट्टी को कपड़े की थैलियों में रख उसमे से निचोड़कर पानी निकाला । हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं था।  मेरी दो बहनों की पुंछ में मौत हो गई।  कई लोग भूख से मर गए और बच्चे दूध की कमी से मर गए।

सुचवंत सिंह, कोटली मुज़फ़्फ़रबस्द कश्मीर से श्रीनगर कश्मीर
अपने घर से निकल जब हम अगले गाँव पहुँचे, तो हमने फिर से अपनी माँ और भाई-बहनों के बारे में पूछा। वहां के लोगों ने मेरी दादी को बताया कि उनके परिवार के एक सदस्य ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए मेरी मां और बहन को मार डाला है। मेरी चचेरी बहनें जिनका अपहरण कर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया था, वे सीमा के दूसरी ओर आज तक रहती हैं।

मोहम्मद इक़बाल, भारेवाल, सियालकोट से (बचपन का नाम – मदन )
हिंसा के दौरान मेरे दादाजी को उनके गन्ने के खेत में घात लगाकर मार दिया गया । उनकी हत्या के बाद, मेरे परिवार ने इस्लाम धर्म अपना लिया और हमने मेरे दादाजी को गांव में ही दफना दिया। मेरी आखिरी इच्छा है कि समय के खिलाफ दौड़ हारने से पहले मैं अपनी बहन महिंदर जी से आखिरी बार मिलूं। बटवारें के दौरान मुझे बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा – सबसे बड़ी कठिनाई मेरे माता-पिता और भाइयों से अलग होना थी। जब मैं अकेला होता था तो रोता था।

नूर दीन के पुत्र लालदीन सिंह, जिनका परिवार तंगोरी, चंडीगढ़ से पस्सु पाकिस्तान गया
जब परिवारों को छुपते हुए या दुश्मन से बचते हुए रिफ़्यूजी कैंप में जाना पड़ता था, या सरहद को पार करना होता था, तो कुछ डरपोक लोग अपने बच्चों को पीछे छोड़ देते थे, क्योंकि बच्चे अक्सर शोर मचाते थे, जिससे भागने वाले पकडे जा सकते थे या उस से पूरे परिवार मारा जा सकता था।

विलायत खान, (गायक) गोस्लान पिंड, लुधियाना से पाकिस्तान में सर्गे चले गए
सदमा इतना था कि वहां पहुँचने के बाद मैं गाना भूल गया, इनमे वो गीतों और कविता भी शामिल थे जो मैं बटवांरे से पहले बचपन से गाता था। वहां मेरी कला की सराहना करने वाला भी कोई नहीं था।  रोटी कमाने और ज़िंदा रहने के लिए, मैंने भेस बदल कर लकड़ी काटने जैसे छोटे-मोटे काम किए। हिन्दुस्तान में गोस्लान वापिस लौटने के बाद मेरा संगीत मेरे पास वापस आ गया। तब से, मैंने गाना जारी रखा है और मैंने ढद्दी संगीत के लिए यहाँ पहचान बनाई । संगीत नाटक अकादमी ने मुझे 2009 में पुरस्कार से सम्मानित भी किया।

एम. के. (पूरा नाम नहीं बताया), जिला नारनौल
हमने गांव के लंबरदार की बंदूक चुरा ली और अपने गांव में कीकर के पेड़ पर चढ़ गए। पहले दो लोग जो हमारे पास से गुजरे हमने उन्हें गोली मार दी । यह कोई जंग नहीं थी – यह नारोवाल में कर्बला था

रोमिला थापर जो बटवारे के समय पूना में रहती थीं
आज़ादी की लड़ाई ने प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रति जुनून पैदा कर दिया था क्योंकि कई लोग इस सवाल से जूझ रहे थे कि हम कहां से आए हैं और भारतीय होने का क्या मतलब है। जबकि हमें यह पूछना चाहिए था कि एक स्वतंत्र राष्ट्र होने का क्या मतलब है।

10,000 मेमोरीज़: इस पहली किताब में 1,000 से ज़्यादा तस्वीरें हैं और हर पन्ने पर लोगों से हुई मार्मिक बातों के कुछ हिस्से हैं जो पढ़ने वालों के लिए उस समय के इतिहास को सामने लाती हैं। प्रकाशक इस श्रृंखला में 50 और किताबें निकालेंगे।

प्रकाशक ने अपने नोट में लिखा है कि “10,000 मेमोरीज़ कई वर्षों की कड़ी मेहनत का परिणाम है जिसमें अखिल-दक्षिण एशिया स्तर पर भारतीय उपमहाद्वीप में सैकड़ों मौखिक इतिहासकारों द्वारा लिए गए साक्षात्कार शामिल हैं। सरकारी रिकॉर्ड और अन्य समकालीन स्रोतों के आधार पर विभाजन के विशिष्ट इतिहास के विपरीत, यह उपन्यास अध्ययन उन जीवित मानव अभिनेताओं के जीवित इतिहास के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है, जो व्यापक सामाजिक संदर्भ में भू-राजनीतिक महत्व की उस अविस्मरणीय घटना के कारण पीड़ित हुए थे। द्वितीय विश्व युद्ध के भूले हुए चीन-बर्मा-भारत रंगमंच का आर्थिक परिदृश्य। सिंह भल्ला और उनकी टीम ने एक उत्कृष्ट दृश्य इतिहास प्रदान करके अत्यंत कठिन काम किया है… इसे पढ़ना आनंददायक है, और यह निश्चित है कि यह विभाजन का एक उत्कृष्ट अध्ययन बन जाएगा।”

राजिंदर अरोरा, 20 दिसंबर 2024

The Book
A map showing location of displaced families

निंदिया के उड़न खटोले में

​नींद भी क्या नेमत है जिसके लिए दुनिया में करोड़ों लोग तरसते हैं, लाखों लोग इलाज करवा दवाइयाँ खाते हैं और जाने कितने हज़ारों रात रात भर बिस्तर पर सर पटकते थक जाते हैं पर सो नहीं पाते। और फिर मिथकों में कुम्भकरण जैसे भी हैं जो ब्रह्मा के श्राप से छह महीनों तक गहरी नीदं में रहते थे। या फिर यूरोपीय मिथक में सम्राट स्टेफेन और रानी लिआ: की बेटी अरोरा, जो स्लीपिंग ब्यूटी नामक कहानी से जानी जाती है, उन्हें भी श्राप था की वो सौ बरस तक सोती ही रहेंगी। ऐसा क्यों है के जहाँ कुछ लोग बिलकुल सो नहीं पाते वहाँ कुछ लोग लम्बी तान के दिनों-दिन सो सकते हैं। कौन हैं ऐसे नसीबवर जिन्हे निंदिया के उड़न खटोले का अपार आनंद मिलता है।
माँ को ये उड़न खटोला और निंदिया का ख़जाना मिल गया है। माँ अब ज्यादा समय सोती है, दिन हो या रात। कोई ख़ुमारी नहीं, ना ही तबियत में कोई बदलाव है पर फिर भी नींद उन्हें घेरे रहती है। आँखें भारी, गला रुँधा, आवाज़ दबी, बीच बीच में उबासी और निद्राग्रस्त आलस । वज़ह शायद मौसम हो सकता है, जो बदल रहा है। बाहर हवा ठंडी हो चली है, दिन छोटे हो गए हैं, अँधेरा जल्दी हो जाता है पर इस सब का माँ की नींद से क्या रिश्ता है मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। पहले तो दिन के वक़्त कभी किताब पढ़ लेती थीं, कभी भजन गुनगुना लेती थीं या फिर अपने भाई या बहनों से फ़ोन पे बात कर लेती थीं पर अब वो भी नहीं होता। यहां तक ​​कि जब शाम के वक़्त टीवी चालू भी होता है तब भी वो ऊँघ रही होती हैं, जब कि हम एक ही कमरे में बैठे होते हैं तब भी वह आंखें बंद कर लेती है और सो जाती है। डॉक्टर बताते हैं कि इसका कारण कोई बिमारी या दवाइयाँ तो नहीं है क्यूंकि उनकी सेहत अब पहले से कहीं बेहतर है।
क्यूंकि माँ बिना मदद के चल नहीं पाती और सीढ़ियां नहीं चढ़-उतर पाती तो उनका घर के बाहर आना जाना भी काफी आरसे से मुमकिन नहीं हुआ। बीच बीच में हम लोगो उन्हें जबरदस्ती से बाहर आँगन में ला कर धूप में बिठला देते हैं पर जैसे ही सूर्य महाशय जगह बदलते हैं और गर्माहट कम होती है तो माँ भी वहां से खिसक लेती हैं। पिछले बरस तक धूप में बैठ कर मूली, मूंगफली, बेर और गुड़ मज़े से खाती थीं अब उस सब का शौक़ भी नहीं रहा। दोपहर को बस खाना खाने के लिए उठती भर हैं और फिर से बिस्तर। वो दुबला शरीर रज़ाई का वज़न भी कैसे सहता होगा ?
सर्दियाँ शुरू हो गई हैं इसलिए वह सुबह देर तक बिस्तर पर रहती है, देर से उठती है और 9.30 बजे तक ही चाय पीने को कमरे से बाहर आती हैं। जिसके बाद वह फिर से बिस्तर पर लेट, रज़ाई लपेट और आंखें बंद करके सो जाती है। मैं सोचता हूँ इतनी देर कोई कैसे सो सकता है पर शायद इस उम्र में ऐसे ही होता होगा। दो-एक घंटे बाद नहाने के लिए तभी जाती है अगर उनका मन होता है। ज्यादातर वो अलसाई सी रहती हैं। पिछले हफ्ते वह पांच दिन बाद नहाई थी। इसके बाद स्वेटर पहना कर उन्हें शॉल ओढ़ा दी जाती है। अभी टोपी नहीं निकली है तो शाल से ही सर को ढक लेती हैं। नहाने के बाद चाय का एक दौर ऐसा चलता है जिसमे चाय पीते पीते वो झपकी ले रही होती हैं और हमे डर लगता है कि चाय की कटोरी समेत झुक कर वो मेज़ से ना टकरा जाएँ।
​मां की बिगड़ती सेहत के चलते एक अरसे से घर की हर छोटी बड़ी बात उनके चारों ओर घूमती है, वो धुर्री हैं हम सब फ़िरकी। मसलन सुबह की चाय तब बनेगी जब माँ उठेंगी, नाश्ता तब बनेगा या परोस जाएगा जब माँ हाथ-मुंह धो कर ताजा तैयार हो जाएँगी, दोपहर का खाना तब टेबल पर लगेगा जब उनका मन होगा, जो कि कभी-कभी शाम चार बजे तक टल जाता है। शाम की चाय, टीवी का चैनल, दरवाज़ा बंद रहेगा या खुला, पंखा धीमे या तेज़, परदे खुले रहेंगे या ढके, कब कोई बाहर जा सकता है और कहाँ, वग़ैरह वग़ैरह सब माँ के हिसाब से चलता है। अगर वो सो रही हों तो आजकल उनके कमरे के अंदर और बाहर डाइनिंग रूम में साफ सफाई नहीं की जाती, रसोई में बर्तन धोने के लिए दरवाजा बंद कर दिए जाते हैं – मिक्सर ग्राइंडर नहीं चलाया जाता, किसी भी तरह से कोई शोर नहीं हो सकता या तेज आवाज में बोला नहीं जाता, सिर्फ इसलिए कि कहीं माँ की नींद में ख़लल ना पड़े।
हम उनके कमरे का दरवाजा बंद नहीं कर सकते, इससे वो नाराज़ हो जाती हैं। अगर दरवाज़ा सरका कर आप अंदर झाँक लें और वो जाग रही हों तो पूछ लेती हैं, “क्या चाहिए?” उनके कमरे के बाहर कुछ हलचल हो तो वो पूछती हैं, “कौन है?”। आजकल ये दो हर्फ़ उनका तकिया कलाम हैं। ‘कौन है’ का उन्हें पूरा और साफ जवाब चाहिए होता है, कुछ भी कह कर आप उन्हें टाल नहीं सकते। वो शख़्स कौन है, उसका नाम क्या है वो बाहर क्या कर रहा है, घर में क्यों आया है – ये सब उन्हें तफ़सील से जानना होता है। फ़िर उसके बाद वो ही, उनकी प्यारी निंदिया का उड़न खटोला निकल पड़ता है।
कुछ दिन पहले देर रात अपने बिस्तर के दूसरी तरफ इशारा करते हुए माँ ने पूछा, “यहां किस ने सोना है?” रजनी ने जवाब में पूछ लिया “पर क्यों?” अब उनका जवाब सुनिए, “पता होना चाहिए ना कि यहां कौन सो रहा है, ताकि उस हिसाब से हम अपना मूड बनाएं।” इसका क्या जवाब देगा कोई। कल उनकी बड़ी बहन सरला का फ़ोन आया सो मैंने मासी को बताया कि माँ सो रही हैं, फिर भी मैंने माँ को उठा दिया और कहा कि वो बात कर लें । अब अपनी बड़ी बहन से उनका जो वार्तालाप हुआ आप ही सुन लीजिये।
“अगर सोऊँ नहीं तो और मैं क्या करूं?
क्यूँ दिन भर बैठूं?
मैंने किसी का कोई कर्ज देना है क्या?
क्यूँ राम-राम बोलूं, वो राम क्या देगा मुझे?
उसके बिना भी अच्छी मौत आएगी मुझे, हाँ ।
नहीं, मुझे नहीं पढ़ना कुछ, होर की। रामायण, भागवत सब पढ़ लिया है, कई बार, कुझ खास नहीं मिला मुझे उनमे ।”
दूसरी तरफ से क्या सवाल हो रहे होंगे इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं। आराम-तलबी हो तो ऐसी हो जो सब से बेपरवाह हो, भाई, बहन, बेटा, बहु या फिर किताबों के भगवान ही क्यों न हों । मुझे याद आ रहा है: किस किस को याद कीजिये किस किस को रोइये, आराम बड़ी चीज़ है मुँह ढक के सोईये
वैसे आराम-तलबी से बढ़िया हो भी क्या सकता है। तनाव को ख़ारिज करने की सबसे बढ़िया दवा है आराम। बीच बीच में उनकी नींद के बारे में सोच मुझे रश्क़ भी होता है, क़ाश मैं भी इतनी मस्ती में सो सकता, दिन भर नहीं तो दो चार घंटे ही सही। ये कमबख़्त काम कोई और कर ले, मुझे छुटी मिले, में भी पहाड़ पे जा किसी बुगियाल की नरम घास पे वो गुलज़ार साहेब वाली “पीली धूप” में सो सकूँ, शायद मुझे भी उसके छपाक से गिरने की आवाज़ सुनाई दे जाए।
माँ अध-सोइ अध-जगी आँखों से बातें भी कर लेती हैं, सपने भी देख लेती हैं और बवक़्त लाहौर में अपने बचपन के घर भी घूम आती हैं। दोस्तों से मिल आती हैं, “कोकिला छपाकि जुम्मे रात आई जे” खेल आती हैं, अपनी नानी से झंग जा कर मिल भी आती हैं। पिछले दिनों अपनी छोटी बहन रानी से नींद में बाते करतें कह रहीं थी “आजकल मैं लाहौर आयी हुई हूँ।” ये सुनकर मैं तो कुर्सी से गिरने वाला था। लेटे हुए अगर उनकी गर्दन दाईं तरफ़ घूमी हो तो अपने कमरे के बाहर आने-जाने वाले दो बाशिंदो पे नज़र रखे होती हैं और अगर वो ही गर्दन बायीं तरफ़ हो तो सामने लगी सुब्रोतो मंडल की पेंटिंग से सीक्रेट गुफ्तगू कर रही होती हैं।
सुब्रोतो मंडल की वो पेंटिंग एक जवां शख्स का पोर्ट्रेट है, कुछ कुछ चरवाहा, भैंस चराने वाला, ग्वाला, घुमक्कड़ सा, साँवला, गबरू। उसके बायें हाथ में लम्बी सी बांसुरी है और उसी हाथ की कलाई में ताम्बे का कंगन झूल रहा है। रंगीन सा दिखने वाले जंगल में वो एक पेड़ के साथ सटा खड़ा है, उसके सर पे सावे रंग का साफ़ा बंधा है जिस से काले, घुंघराले बालों की दो लटें सांप सी बल खा रही हैं, कन्धों से लटका हल्दी से पीले रंग का अंगोछा उसके सामने झूल रहा है। डिबिया नुमा एक तावीज़ उसके गले में लटका है और दूसरा उसके दाहिने बाजू पे बंधा है। उसके माथे पे छोटा सा काला टीका है लगता है उसकी माँ ने सुबह ही उसकी नज़र उतारी होगी। उसका बदन नीला है और गज़ब नशीली आँखें हैं। आर्टिस्ट ने उस पेंटिंग का टाइटल “कृष्ण” दिया था। मैंने जब उसे पहली बार देखा था तो मुझे उसमे सिर्फ और सिर्फ राँझा दिखा था। वारिस शाह का राँझा, तख़्त हज़ारे का राँझा। पेंटिंग के उस नज़ारे को देख कुछ ऐसा महसूस हुआ था की वहीँ कहीं पेड़ों के झुरमट के परे चनाब दरया का किनारा होगा जिसके परे रांझे की हीर मिट्टी का घड़ा पकडे उसे मिलने का इंतज़ार कर रही होगी।
ख़रीदने के बाद मेरे लिए वो पेंटिंग रांझा हो गयी थी और मैं उसे देख वारिस शाह को याद करता, उस प्रेम कहानी को दोहरा भैरवी में हीर के कुछ टुकड़े गुनगुना लेता था। इस बात पर माँ और मैं कई बार बहस कर चुके हैं पर उन्हें उसमे अपना बांसुरी वाला कृष्ण-कन्हैया ही दिखता है चाहे उसके सर पे मोर पंख हो या न हो । शायद नींद में माँ अपने कृष्ण की बांसुरी भी सुन लेती हों तभी मंत्र मुग्ध हो सोती रहती हैं।
माँ के कृष्ण माखन चोर बाल गोपाल से ले कर वृन्दावन के कुंज विहारी और गोपियों के रास रचैया तक आ कर रुक जाते हैं। इसके बाद के कृष्ण से माँ का कोई वास्ता नहीं है। महाभारत के कृष्ण जो ‘यदा यदा ही धर्मस्या’ का उपदेश देते हैं वो माँ के लिए कभी नहीं थे, वो युद्ध, वो मार काट और कृष्ण का पक्षपात माँ के मिथक का हिस्सा नहीं हैं। माँ ने धर्म की बहुत सी लड़ाइयां देखी हैं, धर्म को उन्मादियों के हाथ जीतते और धर्म को इंसान के हाथ हारते हुए भी देखा है। धर्म के नाम पर दंगे, आगज़नी, हिंसा, मार-काट और बटवारें उनके बचपन से माँ के साथ रहे हैं। तक़सीम की उन यादों और भयावय तस्वीरों से निजात पा लेना उनके लिए नामुमकिन था। इसी कारण हँसते-खेलते, रास करते, बांसुरी बजाते कृष्ण ही उनके इष्ट रहे।
पहले माँ मुँह ढक के सोती थीं, रज़ाई या चादर पूरे चेहरे को अंदर समेटे, जाने सांस कैसे लेती थीं। पर अब, अब ऐसा नहीं करती सर्दी में भी रज़ाई ठुड्डी से नीचे ही रहती है। बाजु अंदर, होंठ हल्के से खुले, पीछे को खींचे सिमटे बाल, कंधे समतल और वो बिलकुल सीधी लेटती। मेरी तरह दायें, बाएं, या पेट के बल नहीं। रात भर हिलती भी नहीं हैं। हर रोज़ नहीं पर कभी कभी खर्राटे भी लेती हैं, ज़ोर से । उनके कमरे में लगा कैमरा बताता है की रात में एक दो बार उठती हैं और अपनी नन्हीं सी प्लास्टिक की बोतल से पानी पी कर फिर सो जाती हैं।
पहले उनकी नींद बहुत कच्ची थी ‘ज़रा से आहट’ वाली, चौकन्नी। मैंने कई बार सोचा ऐसे कैसे पूरी होती होगी इनकी नींद। सुबह भी छह बजे उठ खड़ी होती थीं, हाँ पिछले दस बारह सालों में दोपहर को झपकी ले लेती थीं, “खाना-खाने के बाद मुझे अक़्सर नींद आ जाती है”, ऐसा कह वो अपनी झेंप छुपा लेती हैं।
कच्ची रही हो या पक्की दिन की हो या रात की, माँ को नींद तो प्यारी थी, हमेशा। हमारी तरह वो देर रात तक जाग नहीं सकती थीं, ना अब ना पहले। हमारे बचपन में भी सोये बिना उनका गुज़र नहीं था। घर भर का सार काम, बच्चों की देख भाल और उनके लफड़े, बिरादरी और रिश्तेदारों से निपटना और तंगहाली में घर चलाने आदि से माँ थक तो जाती ही होंगी।और फिर वो ज़िन्दगी ही क्या कि इंसान चैन से सो भी ना सके। साइंसदाँ बताते हैं कि जब हम सो रहे होते हैं और गहरी नींद में होते हैं तब हॉर्मोन हमारे शरीर को दुरुस्त करते हैं और हमारे जिस्म में नई ऊर्जा भर देते हैं जिसके बाद उठने पर हमे ताज़गी और ख़ुशी महसूस होती है। दिमाग़ी कश-मक़श से परे नींद तनाव को सोख लेती है।
इस खोज का लुब्ब-ए-लुबाब ये है कि एक रात की नींद पूरी कर लेने पर इंसान सुबह खा पी कर फिर से सोने की तैयारी कर सकता है। “मैं सोती हूँ तो इसमें हर्ज़ा क्या है, हैं?” माँ पूछती है।
“तुम लोग परेशान क्यूँ होते हो?” कहते कहते फिर से वो निंदिया के उड़न खटोले में परवाज़ ले लेती है। मुझे कुंदन लाल सहगल की गाई लोरी याद आती है ‘सो जा राजकुमारी सो……जा’

12 दिसंबर 2024

Ma in her bed, in her room with attendant Rashmi
Ma, as the winter of 2024 approaches

डाक्टरों के “कुछ रोज़” भी कितने कम होते हैं ना!

“Anoop is gone.”  टेबल के दूसरी तरफ से अपने लैपटॉप की स्क्रीन से उचक कर देखते हुआ रजनी ने मझे बताया। वो दुखी थी, मैं कुछ लिख रहा था। डायरी और पेन को एक तरफ सरका मैं अनूप नायर का चेहरा याद करने लगा। आठ रोज़ पहले ही हम उसे देखने उसके घर गए थे। कल सुबह उनकी पत्नी राजी का मैसेज आया था ‘अनूप ठीक नहीं लग रहे उन्होंने काली उलटी की है और उनकी सांस भी उखड रही है”। कल से आज तक अनूप ने अपनी ज़िन्दगी एक दिन और बढ़ा ली जो और कई  साल लम्बी होनी चाहिए थी। अनूप शायद 70-71 के रहे होंगे वो पिछले एक साल से कैंसर से जूझ रहे थे। 

अनूप मेरे दोस्त नहीं थे। मैं उन्हें बस जानता भर था।  कुल दस बारह बार मिला था। हमारे बच्चे एक ही स्कूल में पढ़े थे। बच्चों ने स्कूल के करीब 10 साल इकट्ठे गुज़ारे जिस नाते बच्चों का काफी मिला जुलना था। स्कूल के बाद अगले 15 साल में उनकी दोस्ती में कई नए जुड़ाव आये – नाटक, संगीत, गाना, लिखना और अभिनय जिस से दोस्त और नज़दीक आ गए। रजनी और राजी की दोस्ती भी बच्चों पर नज़र रखने वाली माओं सी थी। अनूप और राजी एक दो बार हमारे घर भी आये थे। 

अनूप हसमुख थे। आम भाषा में कहा जाए तो अनूप आम आदमी थे, “हैप्पी गो लकी”। मेरे जैसे, हमारे जैसे, दुनिया के आम बाशिंदो जैसे जिनमे कोई लाग-लपेट नहीं होती। मैं जितना भी उन्हें जानता था मेरी समझ से वो अच्छे और सुलझे हुए इंसान थे। कोई नेता, अभिनेता, उद्योगपति, ज़मींदार या भाव खाने वाले रईस नहीं थे। प्यार से और धीमा बोलने वाले प्यारे से इंसान थे। कोई उन्हें मिल कर ये नहीं कह सकता था कि वो केरल से थे मुझे वो आधे पंजाबी लगते थे, उनकी बोली में मलयालम के सुर न थे। पेशे से वो टूर एंड ट्रेवल एजेंट थे। पर वो वैसे टिकट बनाने वाले ट्रेवल एजेंट नहीं थे। 

अनूप घुमक्कड़ किस्म के इंसान थे सो उन्होंने नए देश, पुरानी संस्कृतियां और नए नज़ारे देखने को ही अपना पेशा बना लिया। अनूप की कंपनी के साथ कई विदेशी विश्वविद्यालय जुड़े थे जहाँ के छात्र खास तौर पर शोध या रिसर्च करने वाले छात्र हिंदुस्तान को जानने और समझने के लिए आते थे। उन स्कॉलर्स या छात्रों के लिए ताजमहल और लालकिले से परे वाला हिंदुस्तान भी अहम था इसलिए अनूप उन्हें दूर दराज़ के गांव और छोटे शहरों में रहने वाला हिंदुस्तानी और उनका इतिहास समझने और दिखाने ले जाते थे। हिंदुस्तान आने वाले उन छात्रों को अनूप वहां की संस्कृति, तहज़ीब, पहनावा, खान-पान, सभ्यता, सक़ाफ़त और सच्ची विरासत नज़दीक से दिखाना चाहते थे। अनूप जब बात करते थे तो अपनी दुनिया में चले जाते थे – गुडगाँव, दिल्ली, बम्बई और कोच्ची से परे। उनकी दुनिया बर्फ से ढके सफ़ेद पहाड़ो और हिमालय की वादियों सी शांत और सुन्दर थी। उस दुनिया के पास कहीं अथाह समुन्दर की गहराइयाँ थी और कहीं रेगिस्तान के रेतीले टीलों से दिखने वाले सूरज की लालिमा। उन्हें जंगल भी पसंद थे और ऊँची इमारतों वाले शहर भी। ले दे के अनूप मस्त मौला इंसान थे।   

अनूप और राजी दो बार हमारे दफ्तर भी आये। उन्होंने अपनी एजेंसी का रंगीन कैटेलॉग बनाने का ज़िम्मा मुझ पर सौंपा था। बस उन्हीं दिनों में मैंने अनूप को नज़दीक से देखा और जाना। आखिरी बार 28 अक्टूबर को जब मैं उनसे उनके घर पर मिला तो बहुत ही धीमी आवाज़ में उन्होंने ने मुझ से पूछा “अभी भी पहाड़ पे जाते हो ?” इस सवाल पर हम दोनों की आँखें मिली और जवाब में मैंने हाँ कहते हुए उनका हाथ अपने हाथ से सहलाया । उनके हाथ में अब वो गर्म जोशी नहीं थी। उनका स्याह पड़ता चेहरा मुरझाया हुआ था। शरीर का वजन शायद आधा रह गया था, अपने-आप बिस्तर से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे। दर्द उनके चेहरे पे लिखा था पर फिर भी अपनी भीनी-भीनी मुस्कान से वो मुझे बिस्तर पर पकड़ के बैठे थे। बड़ी व्यथा थी। मैं उनसे बात भी करना चाहता था पर ये नहीं चाहता था की ज़्यादा बोल कर वो थक जाएँ। डॉक्टर लोग हमे पहले ही बता चुके थे कि बात अब कुछ रोज़ की ही है। डाक्टरों के “कुछ रोज़” भी कितने कम होते हैं ना ?

और फिर अनूप चल बसे। जी हाँ गुज़र गए।  इस ‘जाने” को कैसे कैसे शब्दों में कहा जाता है, लिखा जाता है, व्यक्त किया जाता हैं। जाना या गुज़रना दोनों शब्द यात्रा से भी जुड़े हैं – देशाटन से, सफ़र से, दौरे से, भ्रमण से, रास्तों से प्रकृति से, घुमकड़ी से, सैर-सपाटे से   – बाहरी और अंदरूनी ख़ोज से। ‘गुज़र गए’ से ऐसे लगता जैसे कोई अभी सामने वाले रास्ते से गुज़ारा है और घूम कर पीछे वाले रास्ते से आ जायेगा या ऐसे की वो अब नए घर को चला गया है या फिर यूँ कि वो आये थे अपना काम पूरा कर वो दूसरे काम को निकल गए, एक नई यात्रा को एक नए दौरे पर। 

अनूप यात्राओं के बिज़नेस से जुड़े थे। ता उम्र वो खुद भी घूमे और हज़ारो साथियों और यात्रियों को भी घुमाया, मेरा मानना है वो इस बार किसी लम्बी यात्रा में निकल गए हैं। फिर मिलेंगे दोस्त, किसी नए रास्ते पे नए मुकाम पे। तब तक के लिए प्यार भरा सलाम। 

5 November 2024

At the memorial for Anoop Nair On 8th November 2024, Zorba the Buddha, Delhi